जिस लड़की से मेरी ऑनलाइन शादी हुई, वह तीन साल पहले मर चुकी थी
रात के ठीक बारह बजकर सात मिनट पर अनिरुद्ध के मोबाइल की स्क्रीन चमकी। वीडियो कॉल पर वही चेहरा दिखाई दिया, जिसे देखकर उसकी हर थकान मिट जाती थी—बड़ी काली आंखें, माथे पर छोटी-सी लाल बिंदी और होंठों पर हल्की मुस्कान।
“आज तुम बहुत खूबसूरत लग रही हो,” अनिरुद्ध ने कहा।
स्क्रीन के दूसरी ओर बैठी लड़की शर्माकर बोली, “हर दिन यही कहते हो।”
“हर दिन तुम पहले से ज्यादा खूबसूरत लगती हो, तो मैं क्या करूं?”
लड़की हंस पड़ी। उसका नाम **नैना चौधरी** था। वह उत्तराखंड के पहाड़ों के बीच बसे देवगढ़ नामक गांव में रहती थी। कम से कम उसने अनिरुद्ध को यही बताया था।
अनिरुद्ध दिल्ली में एक वेबसाइट डिजाइनर था। छह महीने पहले दोनों की मुलाकात एक ऑनलाइन पुस्तक चर्चा समूह में हुई थी। दोस्ती धीरे-धीरे प्रेम में बदली और प्रेम इतना गहरा हुआ कि उन्होंने एक रात वीडियो कॉल पर अग्नि की तस्वीर सामने रखकर, एक-दूसरे को वचन देते हुए ऑनलाइन विवाह कर लिया।
उस रात नैना ने लाल साड़ी पहनी थी।
अनिरुद्ध ने उसकी मांग में सिंदूर तो नहीं भरा था, लेकिन स्क्रीन पर अपनी उंगली रखकर कहा था, “आज से तुम मेरी पत्नी हो।”
नैना ने भी स्क्रीन को छूकर उत्तर दिया था, “और तुम मेरे पति।”
लेकिन उस ऑनलाइन विवाह के बाद एक बात बदल गई थी। नैना अब हर रात केवल बारह बजकर सात मिनट पर वीडियो कॉल करती थी। न एक मिनट पहले, न एक मिनट बाद।
अनिरुद्ध ने कई बार दिन में फोन किया, पर उसका मोबाइल हमेशा बंद मिलता।
जब वह कारण पूछता, नैना कहती, “हमारे गांव में नेटवर्क केवल रात को सही आता है।”
उस रात भी बातचीत सामान्य चल रही थी कि अचानक नैना का चेहरा गंभीर हो गया।
“अनिरुद्ध, तुम मुझसे मिलने कब आ रहे हो?”
“अगले सप्ताह। मैंने टिकट बुक कर ली है।”
नैना की आंखों में खुशी के बजाय डर उतर आया।
“तुम सच में यहां आओगे?”
“हमारी शादी हो चुकी है, नैना। अब मैं तुम्हें दिल्ली ले जाऊंगा। हम हमेशा साथ रहेंगे।”
नैना कुछ क्षण उसे देखती रही। फिर धीमे स्वर में बोली, “देवगढ़ आना, लेकिन गांव में किसी से मेरा नाम मत पूछना।”
अनिरुद्ध हंस दिया। “अपनी पत्नी का घर बिना पूछे कैसे खोजूंगा?”
“पुराने शिव मंदिर के पास पहुंच जाना। मैं खुद मिलूंगी।”
“और अगर तुम नहीं आईं?”
नैना ने उत्तर नहीं दिया।
अचानक उसके पीछे कोई छाया गुजरी। स्क्रीन कांपी और दूर से किसी महिला के रोने की आवाज सुनाई दी।
अनिरुद्ध सतर्क हो गया।
“तुम्हारे पीछे कौन है?”
नैना ने घबराकर पीछे देखा।
“कोई नहीं।”
“मैंने किसी को देखा।”
“अनिरुद्ध, मेरी बात ध्यान से सुनो। गांव में सूर्य डूबने के बाद पुराने कुएं के पास मत जाना। किसी के बुलाने पर पीछे मुड़कर मत देखना। और सबसे जरूरी बात—अगर कोई कहे कि मैं मर चुकी हूं, तो उस पर विश्वास मत करना।”
अनिरुद्ध की मुस्कान गायब हो गई।
“यह कैसा मजाक है?”
नैना की आंखों से आंसू बहने लगे।
“मैं तुमसे बहुत प्यार करती हूं।”
स्क्रीन अचानक काली हो गई।
कॉल कट चुकी थी।
अगले कई दिनों तक नैना का फोन बंद रहा।
## देवगढ़ की यात्रा
अनिरुद्ध ने लगातार संदेश भेजे, लेकिन कोई उत्तर नहीं आया। चिंता और बेचैनी ने उसे भीतर से जकड़ लिया। आखिर शुक्रवार की सुबह वह दिल्ली से देवगढ़ के लिए निकल पड़ा।
पहाड़ों की घुमावदार सड़कों से गुजरते हुए उसके मन में नैना की बातें घूमती रहीं। वह स्वयं को समझाता रहा कि शायद उसके परिवार ने फोन छीन लिया होगा। संभव है कि ऑनलाइन विवाह की बात पता चलने पर घरवाले नाराज हो गए हों।
शाम होने से कुछ देर पहले बस उसे मुख्य सड़क पर उतार गई।
ड्राइवर ने दूर पहाड़ी की ओर संकेत करते हुए कहा, “देवगढ़ यहां से चार किलोमीटर है। पैदल रास्ता है।”
अनिरुद्ध ने बैग कंधे पर रखा और चल पड़ा।
आसमान में बादल छाए थे। देवदार के लंबे वृक्ष हवा में झूल रहे थे। रास्ते के एक ओर गहरी खाई और दूसरी ओर घना जंगल था। धीरे-धीरे मोबाइल नेटवर्क गायब हो गया।
कुछ दूरी पर उसे एक वृद्ध आदमी दिखाई दिया, जो लकड़ियों का गट्ठर लेकर गांव की ओर जा रहा था।
“बाबा, देवगढ़ कितनी दूर है?” अनिरुद्ध ने पूछा।
“बस सामने पहाड़ी के उस पार।”
“पुराना शिव मंदिर किस दिशा में है?”
वृद्ध ने तुरंत चलना रोक दिया।
“तुम मंदिर क्यों जाना चाहते हो?”
“वहां कोई मिलने वाला है।”
“कौन?”
अनिरुद्ध को नैना की चेतावनी याद आई कि गांव में उसका नाम न पूछना। उसने बात टालते हुए कहा, “एक परिचित है।”
वृद्ध ने उसकी ओर संदेह से देखा।
“सूरज डूबने से पहले मंदिर पहुंच जाना। अंधेरा होने के बाद वहां कोई नहीं जाता।”
“क्यों?”
“कुछ रास्ते जीवित लोगों के लिए होते हैं और कुछ उन लोगों के लिए, जिनका सफर पूरा नहीं हुआ।”
वृद्ध इतना कहकर तेजी से आगे बढ़ गया।
अनिरुद्ध को उसका व्यवहार अजीब लगा, लेकिन उसने अधिक ध्यान नहीं दिया।
गांव छोटा था। पत्थर और लकड़ी से बने घर ढलान पर फैले हुए थे। छतों से धुआं उठ रहा था, लेकिन गलियों में असामान्य सन्नाटा था। बच्चे भी बाहर खेलते दिखाई नहीं दिए।
एक चाय की दुकान खुली थी। अनिरुद्ध ने वहां रुककर पानी मांगा।
दुकानदार पचास वर्ष का दुबला व्यक्ति था। उसकी नजर बार-बार अनिरुद्ध के बैग और मोबाइल पर जा रही थी।
“कहां से आए हो?” उसने पूछा।
“दिल्ली से।”
“किसके घर जाना है?”
अनिरुद्ध ने सावधानी से कहा, “पहले मंदिर जाऊंगा।”
दुकानदार के हाथ से चाय का गिलास लगभग छूट गया।
“पुराने शिव मंदिर?”
“हां।”
“वह मंदिर तीन साल से बंद है।”
“मुझे बताया गया था कि वहां कोई मेरा इंतजार करेगा।”
दुकानदार का चेहरा पीला पड़ गया। उसने दुकान के बाहर बैठे वृद्ध की ओर देखा और स्थानीय भाषा में कुछ कहा। वृद्ध तुरंत उठकर चला गया।
अनिरुद्ध का धैर्य टूटने लगा।
“यहां हर व्यक्ति मंदिर का नाम सुनकर डर क्यों रहा है?”
दुकानदार ने धीमे स्वर में कहा, “साहब, गांव घूमना है तो घूमिए। रात होने से पहले किसी घर में ठहर जाइए। मंदिर की तरफ मत जाइए।”
“कारण?”
“हर कारण जानना जरूरी नहीं होता।”
अनिरुद्ध ने पैसे मेज पर रखे और बाहर निकल गया।
## बंद मंदिर में दुल्हन
पुराना शिव मंदिर गांव से लगभग आधा किलोमीटर ऊपर था। वहां तक पहुंचने वाला पत्थरीला रास्ता जंगली घास से ढका था। ऐसा लगता था कि लंबे समय से किसी ने उसका उपयोग नहीं किया।
सूर्य पहाड़ियों के पीछे छिपने लगा था। आसपास की हवा अचानक ठंडी हो गई।
मंदिर का मुख्य द्वार बंद था। लोहे की जंजीर पर जंग लगी थी। प्रवेश द्वार के दोनों ओर पत्थर के दीपक थे, जिनमें सूखे पत्ते भरे थे।
अनिरुद्ध ने चारों ओर देखा।
“नैना!”
कोई उत्तर नहीं आया।
उसने मोबाइल निकाला। नेटवर्क नहीं था।
वह मंदिर की सीढ़ियों पर बैठ गया। अंधेरा धीरे-धीरे घिर रहा था। करीब आधे घंटे बाद जंगल की ओर से पायल की हल्की आवाज सुनाई दी।
अनिरुद्ध तुरंत खड़ा हो गया।
पेड़ों के बीच लाल रंग की हल्की झलक दिखाई दी।
“नैना?”
एक युवती लाल साड़ी में धीरे-धीरे उसकी ओर आ रही थी। सिर पर घूंघट था। उसके कदमों के साथ पायल बज रही थी।
अनिरुद्ध का दिल तेजी से धड़कने लगा।
युवती कुछ दूरी पर रुक गई और घूंघट उठाया।
वह नैना थी।
अनिरुद्ध भागकर उसके पास पहुंचा।
“तुम ठीक हो? तुम्हारा फोन क्यों बंद था? मैं कितनी चिंता में था!”
उसने नैना को गले लगाना चाहा, लेकिन नैना एक कदम पीछे हट गई।
“अभी मुझे मत छुओ।”
“क्यों?”
“कुछ नियम हैं, जिन्हें तोड़ने का समय अभी नहीं आया।”
अनिरुद्ध ने उसे ध्यान से देखा। उसका चेहरा पहले से अधिक पीला था। आंखों के नीचे काले निशान थे। लेकिन वह वही लड़की थी, जिसके साथ उसने महीनों वीडियो कॉल पर बात की थी।
“तुमने मुझे गांव में नाम पूछने से क्यों रोका?”
“क्योंकि यहां लोग मुझे तुमसे दूर रखना चाहेंगे।”
“किस कारण?”
“वे हमारी शादी स्वीकार नहीं करते।”
“हम दिल्ली चलेंगे। अभी चलो।”
नैना ने उदास मुस्कान के साथ कहा, “मैं इतनी आसानी से नहीं जा सकती।”
“तुम्हारे परिवार ने तुम्हें बंद करके रखा है?”
“कुछ कैद दरवाजों की नहीं होती, अनिरुद्ध।”
उसने अनिरुद्ध का हाथ पकड़ने के लिए हाथ बढ़ाया, लेकिन छूने से पहले ही रोक लिया।
“तुम गांव के पुराने डाकघर में जाओ। वहां एक आदमी मिलेगा—हरिराम। उससे कहना कि तुम नैना का आखिरी पत्र लेने आए हो।”
“आखिरी पत्र?”
“उस पत्र में कुछ ऐसा है, जिससे तुम्हें मुझ पर विश्वास होगा।”
“तुम स्वयं क्यों नहीं बतातीं?”
“क्योंकि हर सच आवाज से नहीं कहा जा सकता। कुछ सच पढ़ने पड़ते हैं।”
नैना पीछे हटने लगी।
अनिरुद्ध ने कहा, “तुम कहां जा रही हो?”
“आज रात गांव के गेस्ट हाउस में रहना। बारह बजकर सात मिनट पर मैं कॉल करूंगी।”
“यहां नेटवर्क नहीं है।”
नैना की आंखों में अजीब चमक दिखाई दी।
“हमारी कॉल के लिए कभी नेटवर्क की जरूरत नहीं पड़ी।”
वह मुड़ी और जंगल की ओर चल दी।
अनिरुद्ध उसके पीछे जाना चाहता था, लेकिन अचानक मंदिर की टूटी घंटी अपने आप बजने लगी।
उसने कुछ क्षण घंटी की ओर देखा। जब दोबारा सामने देखा तो नैना गायब थी।
## तीन वर्ष पुरानी तस्वीर
गांव का पुराना डाकघर अब लगभग बंद हो चुका था। बाहर लगा बोर्ड आधा टूट गया था। भीतर एक वृद्ध आदमी लालटेन के पास बैठा रजिस्टर देख रहा था।
“आप हरिराम हैं?” अनिरुद्ध ने पूछा।
वृद्ध ने चश्मा ठीक किया।
“हां।”
“मैं नैना का आखिरी पत्र लेने आया हूं।”
हरिराम के चेहरे का रंग उड़ गया।
“किसने भेजा तुम्हें?”
“नैना ने।”
वृद्ध कुछ देर उसे घूरता रहा। फिर कांपते हाथों से दराज खोली और उसमें से कपड़े में लिपटा एक लिफाफा निकाला।
लिफाफे पर धूल जमी थी। ऊपर लिखा था—
**जिस व्यक्ति को मैं अपना पति मानूंगी, उसके लिए।**
अनिरुद्ध की सांस रुक गई।
लिखावट वही थी, जिसमें नैना उसे कभी-कभी तस्वीरों पर संदेश भेजती थी।
“यह पत्र आपके पास कब से है?” उसने पूछा।
हरिराम ने उत्तर दिया, “तीन साल से।”
“असंभव। मैं नैना को केवल छह महीने से जानता हूं।”
हरिराम ने दीवार की ओर संकेत किया।
वहां गांव की कुछ पुरानी तस्वीरें लगी थीं। एक तस्वीर पर फूलों की सूखी माला चढ़ी थी। तस्वीर में वही चेहरा था—नैना का।
नीचे लिखा था—
**नैना चौधरी
जन्म: 12 जून 1997
मृत्यु: 18 अगस्त 2023**
अनिरुद्ध के पैरों तले जमीन खिसक गई।
“यह झूठ है।”
हरिराम ने आंखें बंद कर लीं।
“काश झूठ होता।”
“मैं उससे रोज वीडियो कॉल पर बात करता था। मैंने उसे कुछ देर पहले मंदिर के पास देखा है।”
हरिराम ने भयभीत होकर दरवाजा बंद कर दिया।
“तुम्हें आज ही गांव छोड़ देना चाहिए।”
“पहले सच बताइए।”
वृद्ध ने कांपते हुए कहा, “तीन साल पहले नैना की शादी इसी गांव के जमींदार परिवार के बेटे रणविजय से तय हुई थी। लेकिन वह किसी और से प्रेम करती थी। शादी की रात वह घर से गायब हो गई। अगली सुबह उसकी लाश पुराने कुएं में मिली।”
“उसकी हत्या किसने की?”
“पुलिस ने कहा कि उसने आत्महत्या की।”
“और गांव वाले?”
“गांव वाले सच जानते हैं, लेकिन कोई बोलता नहीं।”
अनिरुद्ध ने माला चढ़ी तस्वीर को देखा। चेहरा, आंखें, मुस्कान—सब वही था।
“उसका प्रेमी कौन था?”
हरिराम ने उत्तर देने के बजाय उसकी ओर पत्र बढ़ा दिया।
“इसे पढ़ लो। शायद तुम्हें अपने प्रश्नों के उत्तर मिल जाएं।”
अनिरुद्ध ने पत्र खोला।
> मेरा नाम नैना है। संभव है कि जब यह पत्र किसी के हाथ में पहुंचे, मैं इस दुनिया में न रहूं। मेरे घरवालों ने मेरी शादी रणविजय से तय कर दी है, लेकिन मैं उससे विवाह नहीं करना चाहती। वह क्रूर है। मैंने उसे जंगल में अवैध जानवरों की खाल और हथियारों का व्यापार करते देखा है। उसके पिता और गांव के कुछ शक्तिशाली लोग भी इसमें शामिल हैं।
>
> मैंने सारे प्रमाण एक मेमोरी कार्ड में सुरक्षित किए हैं। वह कार्ड पुराने शिव मंदिर की नंदी प्रतिमा के नीचे है।
>
> मुझे नहीं पता मेरे साथ क्या होगा। मेरी इच्छा है कि कोई ऐसा व्यक्ति आए, जो मुझसे प्रेम करने का दावा करने से पहले मेरे सच पर विश्वास करे। शायद प्रेम का अर्थ साथ जीना ही नहीं होता। कभी-कभी किसी की अधूरी आवाज को दुनिया तक पहुंचाना भी प्रेम होता है।
पत्र के अंतिम हिस्से पर स्याही फैली हुई थी, जैसे लिखते समय आंसू गिरे हों।
सबसे नीचे लिखा था—
> अगर मैं कभी किसी माध्यम से तुम तक पहुंचूं, तो डरना मत। मैं तुम्हें हानि नहीं पहुंचाऊंगी। मैं केवल अपना सच मांगूंगी।
अनिरुद्ध के हाथ कांपने लगे।
“यह कैसे संभव है?” उसने कहा। “उसने मुझे क्यों चुना?”
हरिराम ने उदास स्वर में कहा, “शायद तुमने उसकी कोई तस्वीर देखी होगी।”
“नहीं। हमारी मुलाकात ऑनलाइन हुई थी।”
“उसका मोबाइल उसकी मृत्यु के बाद नहीं मिला था।”
अनिरुद्ध को अचानक याद आया कि नैना कभी कैमरे को कमरे के बाहर नहीं घुमाती थी। उसका चेहरा साफ दिखाई देता, लेकिन पीछे का स्थान हमेशा अंधेरे में रहता था। उसने कभी दिन में वीडियो कॉल नहीं की थी। उसने कभी अपने परिवार से बात नहीं करवाई थी।
फिर भी उसका प्रेम झूठा नहीं लग रहा था।
कम से कम अनिरुद्ध के लिए वह हर भावना सच्ची थी।
## बारह बजकर सात मिनट
अनिरुद्ध गांव के छोटे गेस्ट हाउस में पहुंचा। मालिक ने उसे ऊपर का कमरा दिया, लेकिन मंदिर से लौटने की बात सुनते ही दरवाजा बाहर से बंद रखने की सलाह दी।
“रात को किसी के कदम सुनाई दें, तो दरवाजा मत खोलना,” उसने कहा।
अनिरुद्ध ने कमरे में पहुंचकर लिफाफा और नैना की तस्वीर मेज पर रख दी।
उसने इंटरनेट जांचा। मोबाइल में कोई नेटवर्क नहीं था।
रात के बारह बजने वाले थे।
उसका मन कह रहा था कि सब एक योजनाबद्ध धोखा है। संभव है किसी ने नैना की पुरानी तस्वीरों और वीडियो का उपयोग करके उससे बात की हो। आधुनिक तकनीक से चेहरा और आवाज बदले जा सकते थे।
लेकिन मंदिर के पास उसने नैना को अपनी आंखों से देखा था।
बारह बजकर सात मिनट हुए।
मोबाइल की स्क्रीन चमक उठी।
**नैना वीडियो कॉलिंग…**
अनिरुद्ध का गला सूख गया। उसने कॉल स्वीकार की।
नैना सामने थी। इस बार वह रो रही थी।
“तुमने तस्वीर देख ली?” उसने पूछा।
“तुम कौन हो?”
“नैना।”
“नैना मर चुकी है।”
उसके होंठ कांपे। “मैंने कहा था, यह सुनकर मुझ पर विश्वास करना।”
“मैंने तुम्हारा मृत्यु प्रमाण देखा। तुम्हारा पत्र पढ़ा। तुम इंसान नहीं हो सकतीं।”
“क्या मेरे इंसान न होने से तुम्हारा प्रेम झूठा हो जाएगा?”
अनिरुद्ध चुप रह गया।
नैना ने कहा, “तुमने मुझसे विवाह का वचन दिया था।”
“तुमने मुझसे अपनी मृत्यु छिपाई।”
“अगर पहले दिन बता देती, तो क्या तुम बात करते?”
अनिरुद्ध उत्तर नहीं दे पाया।
नैना की आवाज धीमी हो गई।
“जब कोई अचानक मरता है, तो उसका शरीर चला जाता है, लेकिन कुछ इच्छाएं वहीं रुक जाती हैं। मैं तीन वर्षों तक मंदिर और कुएं के बीच भटकती रही। मैंने कई लोगों से सहायता मांगी, लेकिन वे डरकर भाग गए। फिर एक रात गांव की सीमा पर लगे मोबाइल टावर के पास मुझे अपनी आवाज भेजने का रास्ता मिला।”
“तुमने मुझे ही क्यों चुना?”
“तुमने पुस्तक समूह में एक कहानी पर लिखा था कि मृत व्यक्ति की अंतिम इच्छा पूरी करना प्रेम का सबसे निस्वार्थ रूप है। तुम्हारी बात मुझे सुनाई दी।”
“तो तुमने प्रेम का नाटक किया?”
नैना की आंखों में पीड़ा दिखाई दी।
“शुरुआत में मुझे केवल मदद चाहिए थी। लेकिन हर रात तुमसे बात करते हुए मैं भूलने लगी कि मैं मर चुकी हूं। तुमने मुझे हंसाया। मेरे पसंदीदा गीत सुने। मेरी बातों को बिना टोके समझा। जब तुमने विवाह का प्रस्ताव रखा, मैंने पहली बार तीन वर्षों में स्वयं को जीवित महसूस किया।”
अनिरुद्ध की आंखें नम हो गईं।
“हमारा विवाह असली नहीं था।”
“कानून के लिए नहीं। मेरे लिए था।”
“तुम मुझसे क्या चाहती हो?”
“मंदिर से मेमोरी कार्ड निकालो। मेरे हत्यारों का सच सामने लाओ।”
“और उसके बाद?”
नैना ने कुछ क्षण आंखें बंद रखीं।
“उसके बाद शायद हमारी कॉल कभी न हो।”
अनिरुद्ध के भीतर कुछ टूट गया।
उसने भय, भ्रम और क्रोध के बावजूद महसूस किया कि वह उसे खोने से डर रहा था।
“तुम्हारी मृत्यु कैसे हुई?”
नैना ने कहा, “मैंने रणविजय और उसके पिता को जंगल में तेंदुओं की खाल छिपाते देखा था। मैंने वीडियो रिकॉर्ड कर लिया। शादी से एक रात पहले मैं प्रमाण लेकर पुलिस के पास जाने वाली थी। रणविजय को पता चल गया।”
“उसने तुम्हें मार दिया?”
“वह और मेरा चचेरा भाई दीपक मुझे पुराने कुएं तक ले गए। उन्होंने कार्ड मांगा। मैंने स्थान नहीं बताया। रणविजय ने मुझे धक्का दे दिया।”
“तुम्हारे परिवार ने कुछ नहीं किया?”
“मेरे पिता को धमकी दी गई। मां सदमा सह नहीं पाईं। कुछ महीनों बाद उनकी भी मृत्यु हो गई।”
अनिरुद्ध ने मुट्ठियां कस लीं।
“मैं पुलिस के पास जाऊंगा।”
“स्थानीय पुलिस पर भरोसा मत करना। पहले प्रमाण निकालो। फिर सीधे जिला मुख्यालय जाना।”
अचानक स्क्रीन पर नैना के पीछे एक पुरुष की आकृति दिखाई दी। उसका चेहरा आधा जला हुआ था।
नैना घबरा गई।
“वह आ गया।”
“कौन?”
“जिसने मुझे मारा था।”
स्क्रीन काली हो गई।
दरवाजे के बाहर किसी के भारी कदम सुनाई देने लगे।
## आधी रात का हमला
कदम अनिरुद्ध के कमरे के बाहर आकर रुक गए।
फिर दरवाजे पर दस्तक हुई।
“दरवाजा खोलो,” बाहर से आवाज आई। “मैं गेस्ट हाउस का मालिक हूं।”
अनिरुद्ध खिड़की से नीचे देखने गया। गेस्ट हाउस का मालिक आंगन में सोया दिखाई दे रहा था।
दरवाजे पर फिर दस्तक हुई।
“अनिरुद्ध, दरवाजा खोलो।”
इस बार आवाज नैना की थी।
उसने मोबाइल देखा। कॉल कट चुकी थी।
“अनिरुद्ध, मैं बाहर हूं।”
वह दरवाजे के पास पहुंचा, लेकिन नैना की चेतावनी याद आई—किसी के बुलाने पर पीछे मत मुड़ना, रात को दरवाजा मत खोलना।
अचानक दरवाजे के नीचे से काला धुआं कमरे में प्रवेश करने लगा। उसमें सड़े हुए मांस जैसी दुर्गंध थी।
अनिरुद्ध पीछे हट गया।
दरवाजा जोर-जोर से हिलने लगा।
“तुम्हें यहां नहीं आना चाहिए था!” बाहर से पुरुष की आवाज गूंजी।
अनिरुद्ध ने कुर्सी दरवाजे के सामने लगा दी। खिड़की खोली और नीचे छत के छोटे हिस्से पर कूद गया। वहां से पाइप पकड़कर आंगन में उतरा।
गेस्ट हाउस का मालिक जाग गया।
“क्या हुआ?”
“कोई मेरे कमरे के बाहर है।”
मालिक ने ऊपर देखा। खिड़की के भीतर कोई काली आकृति खड़ी थी।
वह डरकर बोला, “रणविजय!”
“वह जीवित है?”
मालिक ने कांपते हुए कहा, “रणविजय दो वर्ष पहले जंगल में आग लगने से मर गया था।”
अनिरुद्ध को वीडियो कॉल पर दिखाई दिया आधा जला चेहरा याद आया।
“तो उसकी आत्मा नैना को रोक रही है।”
मालिक कुछ समझ नहीं पाया, लेकिन उसने अनिरुद्ध को अपने घर में छिपा लिया।
सुबह होने तक किसी ने कुछ नहीं कहा।
सूर्य निकलते ही अनिरुद्ध पुराने शिव मंदिर की ओर चल पड़ा।
## नंदी प्रतिमा के नीचे
मंदिर के बाहर गांव के कुछ पुरुष खड़े थे। उनके बीच लगभग चालीस वर्ष का गठीला आदमी था। हरिराम ने उसे दूर से देखकर अनिरुद्ध को संकेत किया कि वह सावधान रहे।
वह आदमी नैना का चचेरा भाई दीपक था।
“सुना है तुम नैना के बारे में पूछ रहे हो,” दीपक ने कहा।
अनिरुद्ध ने सामान्य बनने की कोशिश की। “मैं उसकी पुरानी ऑनलाइन पहचान की जांच कर रहा हूं।”
“वह मर चुकी है। शहर लौट जाओ।”
“मंदिर क्यों बंद है?”
“चट्टानें कमजोर हैं। दुर्घटना हो सकती है।”
दीपक ने दो लोगों को मंदिर के पास खड़ा कर दिया।
अनिरुद्ध समझ गया कि दिन में भीतर जाना संभव नहीं होगा।
वह गांव लौट आया और हरिराम से मिला। हरिराम ने बताया कि मंदिर का एक पिछला मार्ग जंगल की ओर से खुलता था। बरसों पहले पुजारी उसी रास्ते का उपयोग करते थे।
शाम को अनिरुद्ध जंगल के रास्ते मंदिर के पीछे पहुंचा। एक टूटी खिड़की से वह भीतर घुस गया।
अंदर धूल और मकड़ी के जाले थे। शिवलिंग के सामने सूखे फूल पड़े थे। बीच में पत्थर की विशाल नंदी प्रतिमा थी।
अनिरुद्ध ने प्रतिमा के नीचे हाथ लगाया। पत्थर का एक छोटा हिस्सा ढीला था। उसने उसे खींचा तो भीतर एक प्लास्टिक की थैली दिखाई दी।
थैली में पुराना मोबाइल फोन और मेमोरी कार्ड था।
उसी क्षण मंदिर का मुख्य द्वार खुला।
दीपक और दो अन्य आदमी भीतर आए।
“मैंने कहा था गांव छोड़ दो,” दीपक बोला।
अनिरुद्ध ने कार्ड मुट्ठी में छिपा लिया।
“नैना ने तुम्हारा नाम पत्र में लिखा था।”
दीपक का चेहरा बदल गया।
“मरी हुई लड़की पत्र नहीं लिखती।”
“लेकिन मरने से पहले लिख सकती है।”
दीपक ने अपने साथियों को संकेत किया। उन्होंने अनिरुद्ध को पकड़ लिया और उसका बैग छीन लिया।
“कार्ड कहां है?”
“मुझे कुछ नहीं मिला।”
दीपक ने उसके चेहरे पर मुक्का मारा।
“नैना ने भी यही कहा था।”
यह सुनते ही अनिरुद्ध को विश्वास हो गया कि दीपक हत्या में शामिल था।
“तुमने अपनी बहन को मरते देखा और कुछ नहीं किया?”
दीपक की आंखों में भय और क्रोध एक साथ था।
“रणविजय ने उसे केवल डराने की योजना बनाई थी। उसने कार्ड नहीं दिया, इसलिए बात बिगड़ गई।”
“तुम लोगों ने उसे कुएं में फेंक दिया।”
“वह खुद गिरी।”
“झूठ!”
दीपक ने चाकू निकाल लिया।
तभी मंदिर की घंटी अपने आप बज उठी।
द्वार अचानक बंद हो गया। हवा इतनी ठंडी हो गई कि सभी की सांस से धुआं निकलने लगा।
शिवलिंग के पीछे लाल साड़ी में नैना दिखाई दी।
उसका चेहरा शांत था, लेकिन आंखें असामान्य रूप से काली थीं।
दीपक के दोनों साथी चीखकर पीछे हटे।
“नैना!” दीपक की आवाज कांप गई।
नैना धीरे-धीरे उसकी ओर बढ़ी।
“उस रात तुमने कहा था कि तुम मेरे भाई हो।”
दीपक जमीन पर गिर गया।
“मुझे माफ कर दे। मैंने तुझे नहीं धकेला था।”
“लेकिन जब मैं कुएं में जीवित थी और सहायता मांग रही थी, तुमने ऊपर से पत्थर डालकर रास्ता बंद किया था।”
अनिरुद्ध स्तब्ध रह गया। नैना गिरने के बाद भी जीवित थी।
दीपक रोने लगा।
“रणविजय ने कहा था कि अगर तू बाहर आ गई तो हम सब जेल जाएंगे।”
नैना की आंखों से काले आंसू बहने लगे।
“मैं तीन घंटे तक कुएं में सहायता मांगती रही।”
मंदिर की दीवारें कांपने लगीं।
दीपक के साथी बेहोश हो गए।
नैना ने हाथ उठाया। दीपक का शरीर जमीन से कुछ इंच ऊपर उठ गया। उसका गला अदृश्य शक्ति से दबने लगा।
अनिरुद्ध समझ गया कि नैना उसे मार सकती है।
“नैना, रुक जाओ!”
उसने अनिरुद्ध की ओर देखा।
“इसने मुझे मरने दिया।”
“मैं जानता हूं। लेकिन तुमने मुझसे सच दुनिया के सामने लाने को कहा था, बदला लेने को नहीं।”
“उसे जीने का अधिकार क्यों है?”
“क्योंकि अगर तुमने उसे मार दिया, तो तुम्हारी कहानी हत्या से शुरू होकर हत्या पर समाप्त होगी। तुम ऐसी नहीं थीं।”
नैना का चेहरा बदलने लगा। कुछ क्षण के लिए वह कुएं में पड़ी घायल लड़की जैसी दिखाई दी—माथे से खून, फटे होंठ और मिट्टी से सना चेहरा।
“तुम नहीं जानते मैं कितनी पीड़ा में थी।”
अनिरुद्ध की आंखों से आंसू बह निकले।
“मैं तुम्हारी पीड़ा खत्म नहीं कर सकता। लेकिन मैं तुम्हें हत्यारा नहीं बनने दूंगा। क्योंकि मैं तुमसे प्रेम करता हूं।”
नैना का उठा हुआ हाथ धीरे-धीरे नीचे आ गया।
दीपक जमीन पर गिर पड़ा और बेहोश हो गया।
नैना ने अनिरुद्ध को देखा।
“तुम अभी भी मुझसे प्रेम करते हो? यह सब देखने के बाद भी?”
“मैं उस लड़की से प्रेम करता हूं, जिसने मृत्यु के बाद भी अपने गांव, जंगल और सच को बचाने की कोशिश की।”
पहली बार अनिरुद्ध ने आगे बढ़कर उसका हाथ पकड़ने की कोशिश की।
इस बार उसकी उंगलियां नैना की हथेली से टकराईं।
हाथ बर्फ जैसा ठंडा था, लेकिन वास्तविक था।
नैना की आंखों में आश्चर्य भर गया।
“तुम मुझे छू सकते हो।”
अनिरुद्ध ने उसका हाथ मजबूती से पकड़ लिया।
“मैंने वचन दिया था कि तुम्हें अकेला नहीं छोड़ूंगा।”
## हत्या का प्रमाण
मेमोरी कार्ड में कई वीडियो थे। उनमें रणविजय, उसके पिता और कुछ अधिकारियों को अवैध शिकार की खाल, हथियार और नकदी संभालते हुए देखा जा सकता था। एक ऑडियो रिकॉर्डिंग में दीपक और रणविजय नैना को धमका रहे थे।
सबसे महत्वपूर्ण वीडियो नैना की मृत्यु वाली रात का था। उसने मोबाइल को अपने दुपट्टे में छिपाकर रिकॉर्डिंग चालू कर दी थी। वीडियो में रणविजय उसे कुएं के पास ले जाता दिखाई दिया। धक्का देते समय कैमरा घूम गया, लेकिन आवाजें साफ रिकॉर्ड हो गईं।
“कार्ड बता दे, वरना नीचे ही सड़ती रहेगी,” रणविजय की आवाज थी।
फिर नैना की चीख सुनाई दी।
कुछ देर बाद दीपक की आवाज आई—
“वह जिंदा है। नीचे से बुला रही है।”
रणविजय ने उत्तर दिया—
“पत्थर डाल दो। सुबह सबको कहेंगे उसने आत्महत्या कर ली।”
अनिरुद्ध ने कार्ड की कई प्रतियां बनाईं। हरिराम की सहायता से उसने एक प्रति जिला पुलिस अधीक्षक, एक पत्रकार और एक वन्यजीव अपराध जांच संस्था को भेज दी।
दीपक ने हिरासत में अपराध स्वीकार कर लिया। पुराने मामले की जांच दोबारा शुरू हुई। रणविजय के पिता, कुछ पुलिसकर्मी और अवैध व्यापार से जुड़े कई लोग गिरफ्तार हुए।
नैना का शव पुराने कुएं से निकालकर दोबारा सम्मानपूर्वक अंतिम संस्कार किया गया। गांव के लोगों ने पहली बार सार्वजनिक रूप से स्वीकार किया कि उसके साथ अन्याय हुआ था।
लेकिन इन सबके बीच अनिरुद्ध के मन में एक डर बना रहा।
नैना ने कहा था कि सच सामने आने के बाद वह शायद चली जाएगी।
अंतिम संस्कार की रात बारह बजकर सात मिनट पर कॉल नहीं आया।
अनिरुद्ध पूरी रात मोबाइल हाथ में लेकर बैठा रहा।
अगली रात भी स्क्रीन नहीं चमकी।
तीसरी रात वह पुराने शिव मंदिर गया।
वहां एक दीपक जल रहा था।
नैना सीढ़ियों पर लाल साड़ी में बैठी थी।
अनिरुद्ध उसके पास जाकर बोला, “तुमने कॉल क्यों नहीं किया?”
“अब मेरे पास समय बहुत कम है।”
“कितना?”
“सूर्योदय तक।”
अनिरुद्ध का दिल बैठ गया।
“नहीं। कोई रास्ता होगा। तुमने तीन वर्ष मोबाइल और टावर के माध्यम से मुझसे संपर्क किया। हम कुछ और कर सकते हैं।”
नैना मुस्कराई।
“हर कहानी को स्क्रीन पर जारी नहीं रखा जा सकता।”
“हमारी शादी का क्या?”
“वह मेरे जीवन का सबसे सुंदर हिस्सा थी।”
“तुम्हारे जीवन का? तुम उस समय…”
“मरी हुई थी?” नैना ने शांत स्वर में कहा। “तुमसे मिलने के बाद पहली बार मैंने अपनी मृत्यु नहीं, अपना अस्तित्व महसूस किया। उन छह महीनों में मैंने जितना जीवन जिया, उतना शायद पहले कभी नहीं।”
अनिरुद्ध उसके पास बैठ गया।
“मैं तुम्हें जाने नहीं दूंगा।”
“प्रेम किसी को बांधना नहीं होता।”
“मैं तुम्हारे बिना कैसे रहूंगा?”
नैना ने पहली बार अपना सिर उसके कंधे पर रखा।
“जैसे मैं तुम्हारे आने से पहले रही—याद के सहारे। अंतर केवल इतना है कि तुम्हारे पास दुनिया होगी, काम होगा और भविष्य होगा।”
“मुझे भविष्य नहीं चाहिए।”
“मुझे चाहिए।”
अनिरुद्ध ने उसकी ओर देखा।
नैना बोली, “मैंने तुम्हें इसलिए नहीं बुलाया कि तुम भी मेरे साथ अतीत में फंस जाओ। मैंने तुम्हें चुना क्योंकि मुझे लगा तुम मेरा सच दुनिया तक पहुंचाकर आगे बढ़ सकोगे।”
“मैं किसी और से प्रेम नहीं कर सकता।”
“अभी नहीं। लेकिन एक दिन करोगे।”
“क्या तुम्हें बुरा नहीं लगेगा?”
नैना ने आंखें बंद कर लीं।
“बहुत बुरा लगेगा।”
दोनों हंसते-हंसते रो पड़े।
नैना ने अपने बालों से छोटी-सी लाल डोरी निकाली और अनिरुद्ध की कलाई पर बांध दी।
“ऑनलाइन शादी के समय तुम मेरी मांग में सिंदूर नहीं भर सके थे। आज इस डोरी को हमारा अंतिम विवाह-चिह्न मान लो।”
अनिरुद्ध ने जेब से सिंदूर की छोटी डिब्बी निकाली। वह इसे दिल्ली से नैना के लिए लाया था।
“मैं इसे तुम्हारे लिए लाया था।”
नैना ने सिर झुका दिया।
अनिरुद्ध ने कांपते हाथ से उसकी मांग में सिंदूर भरा।
इस बार कोई स्क्रीन उनके बीच नहीं थी।
मंदिर की घंटी धीरे से बज उठी। हवा में चमेली की सुगंध फैल गई।
नैना ने कहा, “अब हमारी शादी पूरी हुई।”
“तो पत्नी अपने पति को छोड़कर नहीं जा सकती।”
“पत्नी नहीं जा रही। केवल उसका दिखाई देने वाला रूप जा रहा है।”
पूर्व दिशा में हल्की रोशनी फैलने लगी थी।
नैना का शरीर धीरे-धीरे पारदर्शी होने लगा।
अनिरुद्ध ने उसका हाथ कसकर पकड़ लिया।
“मुझे एक बात सच-सच बताओ,” उसने कहा। “क्या तुमने शुरुआत से ही मुझसे प्रेम किया था?”
नैना ने सिर हिलाया।
“नहीं। शुरुआत में मुझे केवल तुम्हारी सहायता चाहिए थी।”
अनिरुद्ध की आंखों में दर्द दिखाई दिया।
नैना आगे बोली, “लेकिन जिस रात तुमने कहा था कि मेरी आवाज सुनकर तुम्हारा दिन अच्छा हो जाता है, उस रात पहली बार मुझे डर लगा कि कहीं तुम मुझे छोड़ न दो। वहीं से प्रेम शुरू हुआ।”
“फिर तुमने पहले क्यों नहीं बताया?”
“क्योंकि मरी हुई लड़कियां भी प्रेम में कायर हो सकती हैं।”
अनिरुद्ध ने उसे गले लगा लिया।
इस बार उसका शरीर ठंडा नहीं था। कुछ क्षणों के लिए नैना बिल्कुल जीवित लड़की जैसी गर्म महसूस हुई।
उसने अनिरुद्ध के कान में कहा, “मेरी मृत्यु को अपनी जिंदगी मत बनाना।”
सूर्य की पहली किरण मंदिर पर पड़ी।
नैना का शरीर सफेद रोशनी में बदलने लगा।
“नैना!”
“मैं तुमसे प्रेम करती हूं, अनिरुद्ध।”
“मैं भी तुमसे प्रेम करता हूं।”
“हमेशा बारह बजकर सात मिनट पर घड़ी मत देखना।”
उसकी अंतिम मुस्कान हवा में चमकी और फिर वह गायब हो गई।
अनिरुद्ध के हाथ खाली रह गए।
मंदिर की सीढ़ी पर केवल लाल साड़ी का एक छोटा टुकड़ा पड़ा था।
## तीन वर्ष बाद
नैना के मामले ने पूरे राज्य में चर्चा पैदा की। अवैध वन्यजीव व्यापार का बड़ा नेटवर्क पकड़ा गया। देवगढ़ के पुराने कुएं के पास नैना की स्मृति में एक छोटा पुस्तकालय बनाया गया, क्योंकि उसे किताबें पढ़ना बहुत पसंद था।
उस पुस्तकालय का नाम रखा गया—
**नैना स्मृति पुस्तकालय एवं डिजिटल सहायता केंद्र।**
अनिरुद्ध ने गांव के बच्चों को कंप्यूटर और इंटरनेट सिखाने की जिम्मेदारी ली। उसने ऐसा सुरक्षित ऑनलाइन मंच बनाया, जहां ग्रामीण महिलाएं और लड़कियां अपनी समस्याएं बिना पहचान बताए दर्ज कर सकती थीं।
वह दिल्ली और देवगढ़ के बीच आता-जाता रहा।
नैना के जाने के बाद उसने लंबे समय तक किसी से विवाह नहीं किया। लेकिन उसने अपनी जिंदगी रोक भी नहीं दी।
तीन वर्ष बाद पुस्तकालय में काम करने वाली एक अध्यापिका **काव्या** उसकी अच्छी मित्र बन गई। वह नैना की कहानी जानती थी। उसने अनिरुद्ध से कभी उसके अतीत को भूलने के लिए नहीं कहा।
एक शाम काव्या ने पूछा, “क्या तुम्हें अब भी रात बारह बजकर सात मिनट पर उसकी कॉल का इंतजार रहता है?”
अनिरुद्ध ने अपनी कलाई पर बंधी फीकी लाल डोरी को देखा।
“इंतजार नहीं। लेकिन कभी-कभी याद जरूर आती है।”
“तुम्हें लगता है वह तुम्हें देखती होगी?”
“मुझे नहीं पता।”
“और अगर देखती होगी?”
अनिरुद्ध ने मुस्कराकर कहा, “तो शायद नाराज होगी कि मैंने अब तक अपना जीवन पूरी तरह आगे नहीं बढ़ाया।”
कुछ महीनों बाद अनिरुद्ध और काव्या ने विवाह करने का निर्णय लिया।
विवाह से एक रात पहले अनिरुद्ध पुस्तकालय में अकेला बैठा नैना की तस्वीर देख रहा था। घड़ी में बारह बजकर सात मिनट हुए।
उसका पुराना मोबाइल, जो तीन वर्ष से बंद पड़ा था, अचानक चमक उठा।
स्क्रीन पर कोई वीडियो कॉल नहीं थी।
केवल एक संदेश था—
**“इस बार अपनी पत्नी की मांग में सिंदूर स्क्रीन के पार से मत भरना। खुश रहना। – तुम्हारी पहली पत्नी”**
अनिरुद्ध की आंखों से आंसू बहने लगे।
संदेश कुछ सेकंड बाद अपने आप गायब हो गया।
उसी समय खिड़की से चमेली की सुगंध भीतर आई और पुस्तकालय की घंटी बिना किसी के छुए बज उठी।
अनिरुद्ध ने आकाश की ओर देखकर धीरे से कहा, “विदा, नैना।”
लेकिन हवा में जैसे कोई फुसफुसाया—
“विदा नहीं। आशीर्वाद।”
अगले दिन विवाह के समय अनिरुद्ध ने काव्या की मांग में सिंदूर भरा। उसकी कलाई पर नैना की बांधी लाल डोरी अब भी थी।
काव्या ने उस डोरी को देखा, लेकिन हटाने के लिए नहीं कहा।
क्योंकि वह समझती थी कि सच्चा प्रेम हमेशा किसी नए प्रेम का शत्रु नहीं बनता। कभी-कभी वह किसी व्यक्ति को इतना बदल देता है कि वह अगला रिश्ता पहले से अधिक ईमानदारी, विश्वास और सम्मान से निभा सके।
नैना अनिरुद्ध की जिंदगी से गई नहीं थी।
वह उसके भीतर उस साहस के रूप में जीवित रही, जिसने उसे मृत लड़की की आवाज सुनने, गांव के शक्तिशाली लोगों से लड़ने और सत्य को सामने लाने की शक्ति दी।
लोग कहते थे कि नैना तीन वर्ष पहले मर गई थी।
कानून के दस्तावेज भी यही कहते थे।
लेकिन अनिरुद्ध जानता था कि कुछ लोग शरीर के रुक जाने से पूरी तरह नहीं मरते। वे अधूरे वचनों, यादों और उन लोगों के निर्णयों में जीवित रहते हैं, जिन्होंने कभी उन्हें सच्चे मन से प्रेम किया था।
उसकी ऑनलाइन शादी दुनिया की नजर में वैध नहीं थी।
न कोई पंडित था, न असली अग्नि, न परिवार और न हस्ताक्षर।
फिर भी उस रिश्ते ने एक हत्या का सच सामने लाया, एक गांव की चुप्पी तोड़ी और कई निर्दोष जानवरों को मारने वाले गिरोह का अंत किया।
शायद विवाह केवल दो जीवित लोगों का साथ नहीं होता।
कभी-कभी विवाह एक ऐसा वचन भी होता है, जिसमें एक व्यक्ति जीवन देता है और दूसरा उस जीवन के अधूरे सत्य को न्याय तक पहुंचाता है।
और हर रात जब घड़ी में बारह बजकर सात मिनट होते, अनिरुद्ध अब मोबाइल की स्क्रीन नहीं देखता था।
वह अपनी कलाई की लाल डोरी को छूकर केवल इतना कहता—
“मैंने तुम्हारा वचन निभाया, नैना।”
दूर पहाड़ों के बीच बंद पड़े पुराने शिव मंदिर की घंटी उसी समय एक बार अवश्य बजती थी।
