फुसफुसाता बरगद का पेड़
फुसफुसाता बरगद का पेड़
सूरज ढलने के बाद कोई भी विरानपुर गांव की तरफ नहीं जाता था। नक्शे में वह गांव अब भी मौजूद था, लेकिन असल दुनिया में जैसे वह धीरे-धीरे मिट चुका था। टूटी हुई कच्ची सड़क, जंगली घास से ढके मकान, सूखे कुएं और बंद दरवाजों पर लटके पुराने ताले—विरानपुर किसी छोड़ी हुई कहानी जैसा लगता था।
गांव के बीचोंबीच एक विशाल बरगद का पेड़ था। इतना बड़ा कि उसकी जटाएं जमीन में उतरकर छोटी-छोटी दीवारों जैसी बन गई थीं। उसकी शाखाएं पूरे चौक को ढक लेती थीं। दिन में भी उसके नीचे अंधेरा रहता था, और रात में तो वह पेड़ किसी जीवित दानव जैसा दिखता था।
लोग कहते थे, आधी रात को वह बरगद लोगों के नाम फुसफुसाता है।
और जो भी अपने नाम का जवाब देता है, वह हमेशा के लिए गायब हो जाता है।
शहर में रहने वाला पत्रकार आर्यन इन बातों को अंधविश्वास मानता था। वह रहस्यमयी जगहों पर रिपोर्ट बनाता था और लोगों के डर के पीछे छिपे सच को खोजता था। एक दिन उसे विरानपुर के बारे में एक पुरानी पुलिस फाइल मिली। फाइल में लिखा था कि पिछले पचास सालों में उस गांव से बयालीस लोग लापता हुए थे। किसी की लाश नहीं मिली, कोई संघर्ष के निशान नहीं मिले, बस हर मामले में एक बात समान थी—लापता व्यक्ति को आखिरी बार आधी रात के आसपास बरगद के पेड़ के पास देखा गया था।
आर्यन को लगा यह उसकी जिंदगी की सबसे बड़ी कहानी बन सकती है।
वह कैमरा, रिकॉर्डर और टॉर्च लेकर विरानपुर पहुंचा। उसके साथ उसकी साथी मीरा थी, जो डॉक्यूमेंट्री शूट करती थी। गांव के बाहर उन्हें एक बूढ़ा चरवाहा मिला। उसने उन्हें आगे जाने से रोकने की कोशिश की।
“बेटा, वहां रात मत बिताना,” बूढ़े ने कहा। “पेड़ नाम लेकर बुलाता है। आवाज कभी मां जैसी लगती है, कभी दोस्त जैसी, कभी अपने ही दिल जैसी।”
आर्यन ने मुस्कुराकर पूछा, “और अगर कोई जवाब न दे?”
बूढ़े की आंखें डर से फैल गईं। “तब वह दूसरी बार नाम लेता है। तीसरी बार वह तुम्हारी आवाज में पूछता है—‘क्यों नहीं बोल रहे?’”
मीरा ने आर्यन की तरफ देखा। “हमें सच में जाना चाहिए?”
आर्यन ने कैमरा उठाया। “यही तो पता करना है कि सच क्या है।”
वे गांव में दाखिल हुए। हर घर खाली था। कुछ दरवाजे आधे खुले थे, जैसे लोग जल्दी में भागे हों। एक घर में चूल्हे पर पुराना बर्तन अब भी रखा था। दूसरे घर की दीवार पर बच्चों की ऊंचाई नापने की रेखाएं बनी थीं। तीसरे घर में एक टूटी हुई चूड़ी पड़ी थी।
गांव खाली था, लेकिन बिल्कुल शांत नहीं था।
कहीं न कहीं से धीमी सरसराहट आती रहती थी।
शाम होते-होते वे बरगद के पास पहुंचे। पेड़ के तने पर सैकड़ों नाम खुरचे हुए थे—मोहन, लता, भीमा, कमला, राघव, सोनू, शिवा। कुछ नाम इतने पुराने थे कि वे छाल में घुल चुके थे। कुछ नाम नए लग रहे थे।
मीरा ने तने पर हाथ रखा और तुरंत पीछे हट गई।
“यह ठंडा नहीं है,” उसने कहा। “यह गर्म है। जैसे अंदर कुछ धड़क रहा हो।”
आर्यन ने रिकॉर्डर चालू किया। “शायद पेड़ के भीतर नमी है। पुराने बरगद में ऐसा हो सकता है।”
तभी ऊपर से एक सूखी जटा धीरे से हिली, जबकि हवा बिल्कुल बंद थी।
रात गहरी होने लगी। दोनों ने चौक में कैमरे लगाए—एक पेड़ के सामने, एक पुराने कुएं की तरफ, एक पंचायत घर के दरवाजे पर। आर्यन ने तय किया कि वे आधी रात तक इंतजार करेंगे।
ग्यारह बजे तक कुछ नहीं हुआ।
ग्यारह बजकर पचास मिनट पर गांव में ठंड बढ़ गई।
ग्यारह बजकर अट्ठावन मिनट पर सारे कैमरों की स्क्रीन एक साथ झिलमिलाने लगी।
और ठीक बारह बजे बरगद के भीतर से एक धीमी फुसफुसाहट निकली—
“मीरा…”
मीरा का चेहरा सफेद पड़ गया।
आर्यन ने तुरंत उसका हाथ पकड़ लिया। “जवाब मत देना।”
आवाज फिर आई।
“मीरा… इधर देखो…”
इस बार आवाज उसकी मां जैसी थी। मीरा की मां कई साल पहले गुजर चुकी थी। वह कांपने लगी। उसकी आंखों में आंसू आ गए।
“ये मेरी मां की आवाज है,” उसने धीरे से कहा।
आर्यन ने कठोर आवाज में कहा, “नहीं। यह पेड़ है।”
बरगद की जटाएं धीरे-धीरे जमीन पर रेंगने लगीं। वे सांपों जैसी लग रही थीं। पेड़ की छाल पर एक नया नाम उभरने लगा—
मीरा।
मीरा के होंठ कांपे। वह जवाब देने ही वाली थी कि आर्यन ने उसका मुंह हाथ से ढक दिया।
फुसफुसाहट अचानक बदल गई।
अब आवाज आर्यन की थी।
“मीरा, मैं हूं। बोलो न।”
मीरा ने डरकर आर्यन को देखा। असली आर्यन उसके सामने खड़ा था, मगर पेड़ भी उसी की आवाज में बोल रहा था।
फिर पेड़ ने दूसरा नाम लिया—
“आर्यन…”
आर्यन की रीढ़ में बर्फ उतर गई।
आवाज इस बार उसके पिता जैसी थी। वही पिता जो बचपन में उसे छोड़कर चले गए थे। आवाज में पछतावा था, प्यार था, और दर्द भी।
“आर्यन… बेटा… मुझे माफ कर दो…”
आर्यन ने आंखें बंद कर लीं। उसने खुद को याद दिलाया कि वह पत्रकार है, डरपोक बच्चा नहीं। लेकिन आवाज उसके भीतर के सबसे पुराने घाव को छू रही थी।
“एक बार बोल दो,” आवाज ने कहा। “बस एक बार।”
आर्यन ने दांत भींच लिए।
“नहीं,” उसने फुसफुसाकर कहा, लेकिन आवाज इतनी धीमी थी कि पेड़ तक न पहुंचे।
तभी जमीन फटने जैसी आवाज आई। बरगद की जड़ों के बीच एक पुराना पत्थर दिखाई दिया। उस पर लिखा था—
“जिस नाम को पेड़ पुकारे, उसका सच पेड़ जानता है।”
मीरा ने धीरे से कहा, “आर्यन, यह सिर्फ लोगों को नहीं बुलाता। यह उनकी कमजोरी पकड़ता है।”
आर्यन ने कैमरा उठाया और पेड़ के चारों ओर घूमने लगा। उसे पीछे की तरफ जड़ों के बीच एक छोटा दरवाजा दिखा। दरवाजा लकड़ी का था, लेकिन उस पर छाल चढ़ चुकी थी। उसने जोर लगाया। दरवाजा खुल गया।
नीचे अंधेरा तहखाना था।
मीरा ने कहा, “हमें नीचे नहीं जाना चाहिए।”
आर्यन बोला, “जिन लोग गायब हुए, उनका जवाब शायद यहीं है।”
दोनों टॉर्च लेकर नीचे उतरे। तहखाने में मिट्टी और सड़ी लकड़ी की गंध थी। दीवारों पर पुराने दीपक लगे थे। बीच में पत्थर की वेदी थी, और उसके ऊपर एक मोटी जड़ धड़क रही थी। सचमुच धड़क रही थी—जैसे दिल।
वेदी के आसपास पुराने सामान पड़े थे—चप्पल, चश्मे, बच्चों की किताबें, घड़ियां, चूड़ियां, मंगलसूत्र, स्कूल बैग। ये उन लोगों की चीजें थीं जो गायब हुए थे।
दीवार पर लाल मिट्टी से एक कहानी लिखी थी।
बहुत पहले विरानपुर में भयंकर अकाल पड़ा था। लोग भूख से मर रहे थे। गांव के तांत्रिक ने कहा कि बरगद में वन-देवता बसता है। अगर उसे हर साल एक “आवाज” दी जाए, तो गांव बचा रहेगा। लोगों ने पहले पशु चढ़ाए, फिर अनाज, फिर इंसानी बलि। लेकिन एक रात बलि के लिए लाई गई बच्ची ने पेड़ से प्रार्थना की कि वह निर्दोष लोगों को न खाए। तब पेड़ ने शरीर लेना छोड़ दिया और आवाजें निगलना शुरू कर दिया। जो उसके नाम पर उत्तर देता, उसकी आत्मा पेड़ में कैद हो जाती।
मीरा ने कांपते हुए पूछा, “तो गायब लोग मरे नहीं हैं?”
तभी तहखाने की दीवारों से कई फुसफुसाहटें उठीं।
“हमें निकालो…”
“मेरा नाम वापस दो…”
“मैं घर जाना चाहता हूं…”
आर्यन ने वेदी के पास एक पुरानी कुल्हाड़ी देखी। उसके पास लिखा था—
“जड़ काटो, आवाजें मुक्त होंगी। पर जो आखिरी नाम सुनेगा, उसे पेड़ रोकने की कोशिश करेगा।”
आर्यन ने कुल्हाड़ी उठाई।
ऊपर से बरगद गरजा।
पूरा तहखाना कांप उठा। जड़ें दीवारों से निकलकर उनकी तरफ बढ़ीं। मीरा ने कैमरा छोड़कर आर्यन का हाथ पकड़ा।
“जल्दी करो!”
आर्यन ने पहली चोट जड़ पर मारी। काला रस बाहर निकला। तहखाने में चीख गूंजी।
दूसरी चोट पर दीवारों से चेहरों जैसी आकृतियां उभर आईं।
तीसरी चोट पर पेड़ ने आर्यन की मां की आवाज निकाली।
“बेटा, मत काट। मुझे दर्द हो रहा है।”
आर्यन रुक गया।
मीरा चिल्लाई, “यह तुम्हारी मां नहीं है!”
पेड़ ने तुरंत मीरा की मां की आवाज निकाली।
“मीरा… तूने मुझे अकेला छोड़ दिया…”
मीरा की आंखों से आंसू बहने लगे, लेकिन उसने कुल्हाड़ी उठाकर आर्यन के हाथ में फिर थमा दी।
“काटो,” उसने कहा। “यह हमारे प्यार का इस्तेमाल कर रहा है।”
आर्यन ने पूरी ताकत से अंतिम चोट मारी।
जड़ फट गई।
एक तेज सफेद रोशनी तहखाने में फैल गई। दीवारों से बंद आवाजें बाहर निकलने लगीं। बरगद की जटाएं तड़पने लगीं। गांव के खाली मकानों के दरवाजे अपने आप खुल गए। हवा में पुराने नाम गूंजने लगे—मोहन, लता, कमला, शिवा, राघव, तारा, भीमा।
लेकिन बरगद अभी खत्म नहीं हुआ था।
उसने आखिरी बार फुसफुसाया—
“आर्यन…”
इस बार आवाज किसी और की नहीं थी।
यह खुद आर्यन की आवाज थी।
“तुम सच खोजते हो, लेकिन सच से भागते भी हो। तुम अपने पिता से नफरत करते हो, पर अब भी उनका जवाब चाहते हो। बोलो, आर्यन। बस बोलो।”
आर्यन का गला सूख गया। वह जवाब देना चाहता था। वह कहना चाहता था कि हां, उसे जवाब चाहिए। हां, उसे दर्द है। हां, वह अब भी उस खालीपन से भागता है।
लेकिन उसने समझ लिया था—पेड़ उत्तर नहीं चाहता, स्वीकृति चाहता है।
वह चुप रहा।
मीरा ने उसका हाथ पकड़ा।
बरगद ने तीसरी बार उसका नाम लिया—
“आर्यन!”
इस बार आवाज गुस्से में थी। जड़ों ने उसे कमर से पकड़ लिया। वह घसीटा जाने लगा। मीरा ने उसे खींचा, लेकिन जड़ें बहुत मजबूत थीं।
आर्यन ने जेब से लाइटर निकाला और टूटी जड़ पर आग लगा दी।
काला रस जल उठा।
बरगद की चीख पूरे विरानपुर में फैल गई। पेड़ की शाखाएं पागलों की तरह हिलने लगीं। तना बीच से फट गया। उसके भीतर से धुआं नहीं, बल्कि सैकड़ों हल्की रोशनियां निकलीं—वे आत्माएं थीं, जिनके नाम पेड़ ने निगल लिए थे।
जड़ें ढीली पड़ गईं।
आर्यन और मीरा किसी तरह तहखाने से बाहर भागे। जैसे ही वे चौक में पहुंचे, विशाल बरगद का पेड़ अंदर से जलता हुआ दिखाई दिया। आग लाल नहीं थी, सफेद थी। वह पेड़ को राख नहीं बना रही थी, बल्कि उसे खाली कर रही थी।
सुबह तक बरगद सूख चुका था।
उसकी छाल पर लिखे सारे नाम गायब थे।
विरानपुर की हवा पहली बार हल्की लगी।
कुछ दिनों बाद प्रशासन वहां पहुंचा। पुरानी गुमशुदगी की फाइलें फिर खुलीं। आर्यन की डॉक्यूमेंट्री वायरल हुई, लेकिन उसने तहखाने वाली पूरी फुटेज कभी जारी नहीं की। उसने सिर्फ इतना लिखा—
“कुछ गांव नक्शे से नहीं मिटते, वे लोगों की चुप्पी में कैद रहते हैं।”
मीरा ने पूछा, “क्या पेड़ सच में खत्म हो गया?”
आर्यन ने सूखे बरगद को देखा। “शायद।”
तभी हवा चली।
सूखी शाखा से एक छोटी जटा नीचे गिरी। वह जमीन पर रेंगती हुई पुराने कुएं की दिशा में चली गई।
आर्यन ने उसे देखा, लेकिन किसी से कुछ नहीं कहा।
कई महीने बाद विरानपुर में एक नया पौधा उग आया।
बिल्कुल उसी जगह, जहां बरगद की आखिरी जड़ मिट्टी में गई थी।
दिन में वह बस एक साधारण पौधा लगता था।
लेकिन एक रात, जब गांव की सड़क से एक राहगीर गुजरा, तो उसे अंधेरे से एक बहुत धीमी आवाज सुनाई दी—
“रुको…”
राहगीर ठिठक गया।
फिर आवाज ने उसका नाम लिया।
वह जवाब देने ही वाला था कि अचानक उसे गांव की पुरानी चेतावनी याद आई।
उसने अपने होंठ बंद कर लिए और बिना पीछे देखे तेज कदमों से आगे बढ़ गया।
पीछे से पत्तों की हल्की सरसराहट आई।
जैसे कोई अधूरी भूख फिर जागने लगी हो।
क्योंकि कुछ श्राप जलते नहीं।
वे मिट्टी में छिप जाते हैं।
और आधी रात का इंतजार करते हैं।