आरोही पूरी रात सो नहीं पाई। मेज पर रखी वह पुरानी तस्वीर उसकी आंखों के सामने बार-बार घूम रही थी। तस्वीर में राघव, विराज और समर के साथ खड़ा चौथा आदमी कोई आम इंसान नहीं लग रहा था। उसका चेहरा आधा छाया में था, लेकिन उसकी आंखों में ऐसी ठंडक थी जैसे वह मुस्कुराते हुए भी किसी की जिंदगी खत्म कर सकता हो।
तस्वीर के पीछे लिखी लाइन आरोही के दिमाग में हथौड़े की तरह बज रही थी—“समर सिर्फ मोहरा था। असली खेल अभी बाकी है।”
विराज का फोन अब भी बंद था।
आरोही ने तीसरी बार कॉल किया। फिर चौथी बार। फिर दसवीं बार। लेकिन हर बार वही आवाज आई—“जिस नंबर पर आप कॉल कर रहे हैं, वह अभी बंद है।”
बारिश खिड़की पर लगातार दस्तक दे रही थी। कमरे की रोशनी हल्की थी, और दीवार पर टंगी घड़ी की टिक-टिक सन्नाटे को और डरावना बना रही थी। आरोही ने डर को अपने ऊपर हावी नहीं होने दिया। उसने तस्वीर उठाई और उसे गौर से देखने लगी।
चौथे आदमी की उंगली में एक काली अंगूठी थी। अंगूठी पर एक अजीब-सा निशान बना था—तीन टेढ़ी रेखाएं, जो देखने में सांप जैसी लगती थीं। आरोही ने तुरंत लैपटॉप खोला और इंटरनेट पर उस निशान को खोजने लगी। काफी देर तक उसे कुछ नहीं मिला, लेकिन फिर एक पुराने न्यूज आर्टिकल में वही निशान दिखा।
वह निशान “नागेश्वर ग्रुप” का था।
नागेश्वर ग्रुप शहर का सबसे रहस्यमयी बिजनेस नेटवर्क माना जाता था। बाहर से वह एक चैरिटी ट्रस्ट और इन्वेस्टमेंट कंपनी थी, लेकिन अफवाह थी कि उसके पीछे जमीन घोटाले, फर्जी कंपनियां, राजनीतिक सौदे और कई अनसुलझी मौतों का सच छिपा था। उस ग्रुप का चेहरा कभी सामने नहीं आया था। लोग कहते थे कि उसका मालिक शहर में रहता है, लेकिन कोई उसका नाम नहीं जानता।
आरोही के हाथ कांप गए। क्या राघव की हत्या सिर्फ संपत्ति या भाई की दुश्मनी का मामला नहीं था? क्या समर भी किसी बड़े खेल का हिस्सा था?
तभी दरवाजे की घंटी बजी।
आरोही चौंक गई। रात के ढाई बजे कौन हो सकता था?
वह धीरे-धीरे दरवाजे के पास गई। पीपहोल से देखा तो बाहर कोई नहीं था। उसने दरवाजा खोलने की गलती नहीं की। तभी नीचे से एक लिफाफा दरवाजे के अंदर सरकाया गया।
आरोही पीछे हट गई। कुछ सेकंड बाद उसने लिफाफा उठाया। उसमें एक छोटी-सी पेन ड्राइव थी और एक कागज।
कागज पर लिखा था—“विराज को ढूंढना है तो पुराने कोर्टहाउस आओ। अकेली आना। पुलिस को बताया तो उसका शव मिलेगा।”
आरोही के पैरों तले जमीन खिसक गई। विराज खतरे में था।
उसने तुरंत मीरा को फोन किया। मीरा ने फोन उठाते ही कहा, “आरोही, तुम ठीक हो? मैं भी तुम्हें कॉल करने वाली थी।”
“विराज गायब है,” आरोही ने जल्दी-जल्दी कहा। “मुझे धमकी मिली है। पुराने कोर्टहाउस बुलाया है।”
मीरा कुछ पल चुप रही, फिर बोली, “तुम अकेली नहीं जाओगी।”
“नोट में लिखा है अकेली आना।”
“और तुम सच में मान लोगी? पिछली बार भी हम इसलिए बचे थे क्योंकि हमने दिमाग से काम लिया था। तुम जाओ, लेकिन मैं पीछे रहूंगी। पुलिस को सीधे शामिल नहीं करेंगे, पर लोकेशन रिकॉर्डिंग ऑन रखेंगे।”
आरोही ने पेन ड्राइव लैपटॉप में लगाई। स्क्रीन पर सिर्फ एक वीडियो फाइल थी। उसने वीडियो चलाया।
वीडियो में विराज एक कुर्सी से बंधा था। उसके माथे से खून बह रहा था। कमरे में अंधेरा था। पीछे से किसी आदमी की आवाज आई, “आरोही, तुमने एक निर्दोष को जेल से निकाला। बहुत अच्छा किया। लेकिन हर सच आजाद नहीं होना चाहिए। कुछ सच दफन ही अच्छे लगते हैं।”
आरोही की आंखें भर आईं, लेकिन उसने खुद को संभाला।
वीडियो में आवाज फिर आई, “पुराने कोर्टहाउस में आओ। तुम्हारे पास जो तस्वीर है, वह साथ लाना। और हां, सच से प्यार करने वालों की मौत भी सच जैसी ही होती है—धीमी और दर्दनाक।”
वीडियो खत्म हो गया।
सुबह होने में अभी तीन घंटे थे। आरोही ने फैसला कर लिया। वह जाएगी। लेकिन इस बार वह सिर्फ विराज को बचाने नहीं जा रही थी। वह उस चौथे चेहरे को बेनकाब करने जा रही थी।
पुराना कोर्टहाउस शहर के उस हिस्से में था जिसे लोग रात में पार करने से भी डरते थे। इमारत अंग्रेजों के जमाने की थी। टूटी दीवारें, जंग लगे गेट, धूल से भरे कमरे और लंबे अंधेरे गलियारे। कभी यहां न्याय की आवाज गूंजती थी, अब सिर्फ चमगादड़ों की फड़फड़ाहट और हवा की सीटी सुनाई देती थी।
आरोही ने काले रंग की जैकेट पहनी, फोन में रिकॉर्डिंग चालू की और तस्वीर अपने बैग में रख ली। मीरा थोड़ी दूरी पर अपनी कार में थी। उसने आरोही को छोटा-सा ईयरपीस दिया।
“मैं सुन रही हूं,” मीरा ने कहा। “कुछ गलत लगे तो सिर्फ बोलना—‘बारिश रुक गई।’ मैं तुरंत अंदर आ जाऊंगी।”
आरोही ने सिर हिलाया और कोर्टहाउस के अंदर चली गई।
अंदर घुप्प अंधेरा था। उसके कदमों की आवाज खाली गलियारे में गूंज रही थी। दीवारों पर पुराने केस नंबर लिखे थे। कुछ दरवाजे टूटे हुए थे। हवा में सीलन और डर की गंध थी।
“आ गई तुम,” एक आवाज गूंजी।
आरोही रुक गई। “विराज कहां है?”
“इतनी जल्दी? पहले सच की कीमत तो समझ लो।”
दूसरी मंजिल से हल्की रोशनी आ रही थी। आरोही सीढ़ियां चढ़कर ऊपर पहुंची। सामने पुराने कोर्टरूम का दरवाजा खुला था। अंदर एक बल्ब झूल रहा था। बीच में एक कुर्सी पर विराज बंधा था।
“विराज!” आरोही दौड़कर उसके पास गई।
विराज ने मुश्किल से आंखें खोलीं। “आरोही… तुम क्यों आई?”
“तुम्हें लेने।”
अचानक पीछे से तालियों की आवाज आई। आरोही मुड़ी।
दरवाजे पर एक आदमी खड़ा था। सफेद बाल, महंगा सूट, चेहरे पर शांत मुस्कान और उंगली में वही काली अंगूठी। वही अंगूठी। वही निशान।
आरोही ने फोटो निकाली और उसकी तरफ देखा। यही वह चौथा आदमी था।
“कौन हो तुम?” आरोही ने पूछा।
आदमी मुस्कुराया। “नाम से क्या होगा? नाम तो लोग बदल लेते हैं। लेकिन फिर भी जानना चाहती हो तो सुनो—देवेंद्र नागेश्वर।”
आरोही का दिल जोर से धड़कने लगा। “नागेश्वर ग्रुप…”
“जिसके बारे में लोग बहुत बोलते हैं, लेकिन साबित कुछ नहीं कर पाते,” उसने बात पूरी की।
विराज ने गुस्से में कहा, “तुमने राघव को मरवाया।”
देवेंद्र शांत रहा। “राघव ने अपनी औकात भूल गई थी। उसे लगा सच उसके पास है, इसलिए ताकत भी उसके पास है। लेकिन सच सिर्फ कागज पर होता है, ताकत उन हाथों में होती है जो कागज जला सकते हैं।”
आरोही ने पूछा, “समर तुम्हारे लिए काम करता था?”
“समर लालची था। ऐसे लोग सबसे आसान मोहरे होते हैं। उसे लगा वह अपने भाई की संपत्ति और कंपनी बचा रहा है। असल में वह मेरे लिए रास्ता साफ कर रहा था।”
“और विराज?”
देवेंद्र ने विराज की तरफ देखा। “विराज दिक्कत था। ईमानदार आदमी हमेशा दिक्कत होता है। वह दस्तावेजों तक पहुंच सकता था। इसलिए उसे जेल भेजना जरूरी था।”
आरोही ने ईयरपीस में बहुत धीमे कहा, “बारिश…”
लेकिन इससे पहले कि वह पूरी बात कहती, देवेंद्र हंस पड़ा।
“मीरा बाहर है, है ना?” उसने कहा।
आरोही का चेहरा सफेद पड़ गया।
देवेंद्र ने हाथ से इशारा किया। दो आदमी मीरा को अंदर घसीटते हुए लाए। उसका फोन टूट चुका था, होंठ से खून बह रहा था।
“तुम दोनों बहादुर हो,” देवेंद्र बोला, “लेकिन बहादुरी और मूर्खता में फर्क बहुत कम होता है।”
आरोही अब सचमुच फंस चुकी थी। विराज बंधा था। मीरा पकड़ी गई थी। रिकॉर्डिंग शायद बंद हो चुकी थी। सामने वह आदमी था जिसके पास पैसे, लोग और ताकत सब कुछ था।
देवेंद्र ने आरोही से तस्वीर छीन ली। “यह तस्वीर कहां से मिली?”
“अगर तुम इतने ताकतवर हो तो खुद पता कर लो,” आरोही ने कहा।
देवेंद्र की मुस्कान गायब हो गई। “बहुत बोलती हो। यही आदत तुम्हें जिंदा नहीं रहने देगी।”
वह उसके करीब आया। “तुम्हें पता है, आरोही, तुम्हारी गलती क्या है? तुमने प्यार को सच से जोड़ दिया। प्यार कमजोर करता है। तुम विराज के लिए यहां आईं। अगर तुम उससे प्यार नहीं करतीं, तो शायद जिंदा रहतीं।”
आरोही ने विराज की तरफ देखा। वह घायल था, लेकिन उसकी आंखों में आग थी।
“प्यार कमजोर नहीं करता,” आरोही ने कहा। “प्यार इंसान को डर से बड़ा बना देता है।”
देवेंद्र ने अपने आदमी को इशारा किया। “इन तीनों को खत्म कर दो। पुराना कोर्टहाउस है, आग लग जाएगी। फाइलों में लिखा जाएगा—अज्ञात कारणों से हादसा।”
आदमी ने पेट्रोल की कैन उठाई और कमरे में छिड़कना शुरू कर दिया।
उसी पल आरोही की नजर कोर्टरूम की पुरानी दीवार पर लगी एक टूटी हुई घंटी पर पड़ी। उसके नीचे लोहे की लंबी छड़ पड़ी थी। उसने धीरे से अपना बैग जमीन पर गिराया, जैसे डर के मारे हाथ छूट गया हो। उसी झुकने के बहाने उसने छड़ पकड़ ली।
जैसे ही एक आदमी उसके पास आया, आरोही ने पूरी ताकत से छड़ उसके घुटने पर मारी। वह चीखता हुआ गिर पड़ा। मीरा ने दूसरे आदमी को धक्का दिया और विराज की रस्सी खोलने लगी। देवेंद्र पीछे हट गया और जेब से पिस्तौल निकाल ली।
“बस!” वह चिल्लाया।
सब रुक गए।
देवेंद्र ने पिस्तौल आरोही पर तान दी। “बहुत हो गया नाटक।”
विराज रस्सी से आधा आजाद हो चुका था। वह कुर्सी समेत आगे गिरा और देवेंद्र के पैर से टकराया। गोली चली, लेकिन निशाना चूक गया। गोली दीवार पर लगी और पुरानी लकड़ी टूटकर नीचे गिर गई।
मीरा ने जमीन पर पड़ा पेट्रोल कैन देवेंद्र की तरफ फेंका। वह पीछे हटते हुए लड़खड़ाया। आरोही ने उसी क्षण झपटकर उसके हाथ पर छड़ मारी। पिस्तौल दूर जा गिरी।
लेकिन देवेंद्र बूढ़ा होकर भी कमजोर नहीं था। उसने आरोही का गला पकड़ लिया। “तुम मुझे खत्म नहीं कर सकतीं,” वह गुर्राया।
आरोही की सांस रुकने लगी। उसकी आंखों के सामने अंधेरा छाने लगा। तभी विराज ने पीछे से आकर देवेंद्र को धक्का दिया। देवेंद्र कोर्टरूम के पुराने गवाह-बॉक्स से टकराया और नीचे गिर पड़ा।
मीरा ने तुरंत पिस्तौल उठा ली। “हिलना मत!”
कमरे में कुछ पल के लिए सन्नाटा छा गया।
तभी बाहर से पुलिस की आवाज आई। “हाथ ऊपर!”
आरोही ने हैरानी से मीरा की तरफ देखा।
मीरा ने कमजोर मुस्कान के साथ कहा, “मैं अकेली नहीं आई थी। मैंने लाइव लोकेशन अपने एडिटर को भेज दी थी। उसने पुलिस को भेज दिया।”
देवेंद्र पहली बार डरता हुआ दिखा। लेकिन उसकी आंखों में अब भी अहंकार था।
“तुम लोग कुछ साबित नहीं कर पाओगे,” उसने कहा। “तुम्हारे पास क्या है? एक पुरानी तस्वीर? कुछ आरोप? मैं कल तक बाहर आ जाऊंगा।”
आरोही चुप रही। फिर उसने अपने बैग से एक छोटी डिवाइस निकाली।
देवेंद्र की आंखें फैल गईं।
“रिकॉर्डर,” आरोही ने कहा। “फोन नहीं। ईयरपीस नहीं। यह अलग चल रहा था। तुमने सब कुछ बोल दिया, देवेंद्र नागेश्वर।”
देवेंद्र का चेहरा राख की तरह सफेद हो गया।
पुलिस ने उसे गिरफ्तार कर लिया। उसके आदमियों को भी पकड़ लिया गया। कोर्टहाउस के बाहर सुबह की हल्की रोशनी फैल रही थी। बारिश रुक चुकी थी। आसमान साफ नहीं था, लेकिन अंधेरा टूटने लगा था।
विराज को अस्पताल ले जाया गया। मीरा भी घायल थी, लेकिन खतरे से बाहर थी। आरोही अस्पताल के कॉरिडोर में बैठी थी। उसकी हथेलियों पर खरोंच थी, गले पर निशान था, आंखों में नींद नहीं थी। लेकिन भीतर कहीं एक अजीब शांति थी।
विराज ने होश में आते ही सबसे पहले उसका नाम लिया।
आरोही उसके पास गई। “तुम ठीक हो?”
विराज ने हल्की मुस्कान के साथ कहा, “जब भी मैं मुसीबत में फंसता हूं, तुम किसी फिल्म की हीरोइन की तरह आ जाती हो।”
“और तुम हर बार ऐसे फंसते हो जैसे तुम्हें बचाया जाना पसंद हो,” आरोही ने पहली बार हल्के अंदाज में कहा।
दोनों मुस्कुराए, लेकिन उस मुस्कान के पीछे लंबे दर्द की परछाई थी।
देवेंद्र नागेश्वर की गिरफ्तारी ने पूरे शहर को हिला दिया। उसके दफ्तरों पर छापे पड़े। नकली कंपनियों की लिस्ट मिली। पुराने केस दोबारा खोले गए। कई नेताओं, पुलिस अधिकारियों और बिल्डरों के नाम सामने आए। राघव की हत्या अब एक बड़े अपराधी नेटवर्क की कड़ी बन चुकी थी।
समर मल्होत्रा ने जेल में अपना बयान बदल दिया। उसने स्वीकार किया कि उसने राघव की हत्या देवेंद्र के इशारे पर करवाई थी। उसने यह भी बताया कि राघव के पास ऐसे दस्तावेज थे जो नागेश्वर ग्रुप को हमेशा के लिए खत्म कर सकते थे।
लेकिन सबसे बड़ा खुलासा अभी बाकी था।
छापे के दौरान पुलिस को देवेंद्र के निजी लॉकर से एक डायरी मिली। डायरी में कई नाम थे, कई तारीखें थीं, और एक नाम बार-बार लिखा था—“आर.के.”
आरोही ने जब यह नाम देखा तो उसके मन में फिर बेचैनी उठी।
“आर.के. कौन है?” उसने जांच अधिकारी से पूछा।
अधिकारी ने कहा, “शायद कोई नेता, कोई अफसर, कोई बिजनेसमैन। अभी साफ नहीं है।”
आरोही ने डायरी के पन्ने पलटे। एक जगह लिखा था—“आर.के. ने लड़की पर नजर रखने को कहा। वह बहुत करीब पहुंच रही है।”
लड़की।
आरोही समझ गई। बात उसी की हो रही थी।
लेकिन देवेंद्र तो अब जेल में था। फिर आर.के. कौन था, जो देवेंद्र को भी आदेश दे सकता था?
कुछ दिनों बाद विराज अस्पताल से डिस्चार्ज हुआ। आरोही उसे घर छोड़ने गई। रास्ते में दोनों चुप थे। बहुत कुछ कहने को था, लेकिन शब्द नहीं मिल रहे थे।
घर पहुंचकर विराज ने कहा, “आरोही, तुमने मेरे लिए बहुत कुछ किया। लेकिन अब रुक जाओ। यह लड़ाई बहुत बड़ी हो चुकी है।”
आरोही ने उसकी तरफ देखा। “तुम चाहते हो मैं डर जाऊं?”
“मैं चाहता हूं तुम जिंदा रहो।”
“और मैं चाहती हूं कि हम सच के साथ जिएं।”
विराज ने गहरी सांस ली। “आर.के. का नाम मैंने पहले सुना है।”
आरोही चौंक गई। “कहां?”
“राघव अक्सर कहता था कि असली मालिक कभी सामने नहीं आता। वह उसे ‘राजा’ कहता था। शायद आर.के. वही है।”
“राजा…”
आरोही को शतरंज की बात याद आई। राघव अपनी जरूरी चीजें “राजा के पास” रखता था। क्या काले राजा में मिली मेमोरी कार्ड सिर्फ शुरुआत थी? क्या कोई और राज अभी भी छिपा था?
वह तुरंत राघव के फार्महाउस फिर गई। इस बार पुलिस सील हटा चुकी थी, लेकिन जगह अब भी सुनसान थी। विराज उसके साथ था। दोनों सीधे शतरंज की मेज के पास पहुंचे।
आरोही ने काले राजा को फिर उठाया। उसमें अब कुछ नहीं था। उसने सफेद राजा देखा। खाली। फिर उसकी नजर पूरी शतरंज की बिसात पर गई। उसे लगा जैसे कुछ गड़बड़ है।
“विराज,” उसने कहा, “इस बिसात में चौसठ खाने होने चाहिए, है ना?”
“हां।”
“लेकिन यहां तिरसठ हैं।”
विराज ने ध्यान से देखा। सचमुच, एक कोना अलग था। लकड़ी का एक छोटा टुकड़ा बहुत सफाई से लगाया गया था। विराज ने चाकू से उसे उखाड़ा। नीचे एक पतली चाबी छिपी थी।
चाबी पर लिखा था—“R.K. Locker 17”
आरोही और विराज ने एक-दूसरे को देखा।
यह चाबी किस लॉकर की थी? कौन था आर.के.? और राघव ने उसे क्यों छिपाया था?
कुछ घंटे बाद मीरा ने पता लगाया कि शहर के पुराने रेलवे स्टेशन पर एक निजी लॉकर सुविधा चलती थी, जिसका इस्तेमाल अक्सर व्यापारी और यात्री करते थे। वहां लॉकर नंबर 17 पिछले छह साल से बंद था। नाम दर्ज था—राघव कुमार।
राघव मल्होत्रा ने अपने नाम का दूसरा हिस्सा इस्तेमाल किया था।
आरोही, विराज और मीरा तीनों पुराने रेलवे स्टेशन पहुंचे। स्टेशन अब आधा बंद था। कुछ प्लेटफॉर्म चालू थे, लेकिन पीछे का हिस्सा वीरान पड़ा था। लॉकर रूम में धूल जमी थी। बूढ़े कर्मचारी ने पुराने रजिस्टर देखकर उन्हें अंदर जाने दिया।
लॉकर नंबर 17 दीवार के कोने में था।
आरोही ने चाबी लगाई। ताला खुल गया।
अंदर एक छोटी डायरी, कुछ फोटो और एक सीलबंद लिफाफा था। लिफाफे पर लिखा था—“अगर मैं मारा जाऊं, तो यह सच दुनिया के सामने रखना।”
आरोही ने कांपते हाथों से लिफाफा खोला।
उसमें एक जन्म प्रमाणपत्र था।
नाम—आरोही राघव कुमार।
आरोही की सांस रुक गई।
“ये क्या है?” मीरा ने फुसफुसाकर पूछा।
आरोही ने कागज को फिर पढ़ा। पिता का नाम—राघव कुमार। मां का नाम—नैना।
आरोही पीछे हट गई। “नहीं… यह झूठ है।”
विराज ने कागज लिया। उसकी आंखों में भी सदमा था।
आरोही बचपन से जानती थी कि उसके माता-पिता एक हादसे में मारे गए थे और उसे उसके मामा-मामी ने पाला था। लेकिन इस कागज के हिसाब से उसका असली पिता राघव था—वही राघव जिसकी हत्या के आरोप में विराज जेल गया था।
मीरा ने डायरी खोली। पहले पन्ने पर लिखा था—
“अगर मेरी बेटी कभी यह पढ़े, तो उसे बताना कि मैंने उसे छोड़ा नहीं था। मैंने उसे बचाया था।”
आरोही की आंखों से आंसू बह निकले।
डायरी में राघव ने लिखा था कि कई साल पहले उसने नागेश्वर ग्रुप के खिलाफ सबूत जुटाए थे। उसकी पत्नी नैना भी इस सच को जानती थी। जब देवेंद्र और आर.के. को पता चला कि राघव पुलिस तक पहुंचने वाला है, उन्होंने उसके परिवार को खत्म करने की योजना बनाई। नैना की हत्या को सड़क हादसा दिखा दिया गया। राघव ने अपनी नवजात बेटी को बचाने के लिए उसे दूर भेज दिया और नया नाम दिलवा दिया—आरोही।
आरोही दीवार से टिककर बैठ गई। जिस सच की तलाश में वह निकली थी, वह उसकी अपनी जिंदगी को तोड़ रहा था।
विराज उसके पास बैठा। “आरोही…”
आरोही ने रोते हुए कहा, “मैं अपने पिता के कातिल को बचाने नहीं निकली थी… मैं अपने पिता की हत्या का सच खोज रही थी, और मुझे पता ही नहीं था।”
विराज की आंखें भी भर आईं। “राघव ने तुम्हें बचाया। और शायद इसी वजह से तुम आज उसका अधूरा सच पूरा कर रही हो।”
आरोही ने डायरी का आखिरी पन्ना खोला।
वहां लिखा था—“आर.के. कोई नाम नहीं, एक पद है। इसका मतलब है—राजा का कानून। जो इस नेटवर्क का असली मालिक बनता है, वह आर.के. कहलाता है। अगर देवेंद्र पकड़ा जाए तो समझना, असली आर.के. अभी भी आजाद है।”
नीचे एक आखिरी लाइन थी—
“मेरी बेटी को कभी सच मत बताना, जब तक वह सच उठाने लायक मजबूत न हो जाए।”
आरोही ने आंसू पोंछे। अब उसका चेहरा बदल चुका था। दर्द था, लेकिन उसके भीतर एक नई आग जल चुकी थी।
“मैं मजबूत हूं,” उसने धीरे से कहा। “अब मैं सिर्फ विराज के लिए नहीं लड़ रही। अब मैं अपने पिता, अपनी मां और उन सब लोगों के लिए लड़ूंगी जिन्हें इन लोगों ने मिटा दिया।”
तभी लॉकर रूम की लाइट अचानक बंद हो गई।
मीरा ने घबराकर कहा, “किसी ने मेन स्विच बंद किया है।”
अंधेरे में किसी के कदमों की आवाज गूंजी।
एक आदमी की आवाज आई, “राघव की बेटी आखिर अपने घर लौट ही आई।”
आरोही ने मुड़कर देखा। अंधेरे में एक लंबा साया खड़ा था।
“कौन हो तुम?” विराज ने पूछा।
आदमी ने हल्की हंसी के साथ जवाब दिया, “मैं वही हूं जिसे तुम लोग ढूंढ रहे हो।”
आरोही ने ठंडी आवाज में कहा, “आर.के.?”
साया धीरे-धीरे रोशनी में आया। उसका चेहरा देखकर आरोही का खून जम गया।
वह कोई अनजान आदमी नहीं था।
वह उसका मामा था—राजीव कुमार।
वही आदमी जिसने उसे बचपन से पाला था। वही जिसने उसे सिखाया था कि सच से कभी डरना नहीं चाहिए। वही जिसने हर जन्मदिन पर उसे आशीर्वाद दिया था। वही जो उसके पिता जैसा था।
राजीव कुमार मुस्कुराया।
“हां, बेटा,” उसने कहा। “आर.के. मैं हूं।”
आरोही की दुनिया एक पल में टूट गई।
राजीव ने आगे कहा, “राघव ने तुम्हें मुझसे बचाने के लिए छिपाया था। और किस्मत देखो, तुम मेरी ही छत के नीचे बड़ी हुईं। मैं तुम्हें मार सकता था, लेकिन मैंने तुम्हें जिंदा रखा। क्योंकि मुझे जानना था कि राघव ने बाकी सबूत कहां छिपाए हैं।”
आरोही की आवाज कांप रही थी। “आपने मुझे बेटी कहा… और मेरी मां-बाप को मरवा दिया?”
राजीव ने बिना शर्म के कहा, “ताकत रिश्तों से बड़ी होती है। तुम्हारे पिता यह बात कभी समझ नहीं पाए।”
विराज आगे बढ़ा, लेकिन राजीव ने पिस्तौल निकाल ली। “एक कदम और, तो इस बार कहानी सचमुच खत्म।”
आरोही ने अपने आंसू पोंछे। “नहीं। कहानी अब शुरू हुई है।”
राजीव मुस्कुराया। “तुम अभी भी सोचती हो कि जीत सकती हो?”
आरोही ने डायरी अपनी छाती से लगाई। “हां। क्योंकि आपके पास ताकत है, मेरे पास सच है। और इस बार सच सिर्फ रिकॉर्ड नहीं होगा, आग बनेगा।”
राजीव की आंखों में पहली बार डर की हल्की रेखा दिखाई दी।
बाहर ट्रेन की तेज सीटी गूंजी। पुराने स्टेशन की खिड़कियां कांप उठीं। उसी शोर में आरोही ने डायरी मीरा की तरफ फेंकी और चिल्लाई, “भागो!”
मीरा डायरी लेकर अंधेरे गलियारे की तरफ दौड़ी। राजीव ने गोली चलाई। गोली दीवार से टकराई। विराज ने राजीव पर झपट्टा मारा। दोनों जमीन पर गिर पड़े। आरोही ने लॉकर रूम का लोहे का दरवाजा खींचकर आधा बंद कर दिया, ताकि राजीव के लोग अंदर न आ सकें।
राजीव चीख रहा था, “डायरी वापस लाओ! वह बाहर नहीं जानी चाहिए!”
लेकिन अब देर हो चुकी थी।
मीरा स्टेशन से बाहर निकल चुकी थी। उसने डायरी की तस्वीरें अपने न्यूज चैनल, पुलिस अधिकारी और कई स्वतंत्र पत्रकारों को एक साथ भेज दीं। कुछ ही मिनटों में राजीव कुमार का नाम सामने आने लगा।
लॉकर रूम के अंदर विराज और राजीव की लड़ाई जारी थी। राजीव ने पिस्तौल उठाने की कोशिश की, लेकिन आरोही ने पैर से उसे दूर कर दिया।
राजीव ने उसे देखा। “तुम मुझे जेल भेजोगी? मैं तुम्हारा परिवार हूं।”
आरोही की आंखें लाल थीं। “परिवार खून से नहीं बनता। परिवार वह होता है जो बचाता है, मारता नहीं।”
पुलिस फिर पहुंच गई। इस बार राजीव के पास भागने का रास्ता नहीं था। उसे गिरफ्तार कर लिया गया। जाते-जाते उसने आरोही से कहा, “तुमने मुझे हराया नहीं है। तुमने बस एक दरवाजा खोला है। इस खेल में बहुत राजा हैं।”
आरोही ने जवाब दिया, “तो एक-एक करके सब गिरेंगे।”
कुछ महीनों बाद राजीव कुमार, देवेंद्र नागेश्वर और समर मल्होत्रा के खिलाफ बड़ा मुकदमा शुरू हुआ। राघव की डायरी, मेमोरी कार्ड, रिकॉर्डिंग, बैंक पेपर और कई गवाहों ने मिलकर वह सच सामने रख दिया जिसे सालों तक दफनाया गया था।
आरोही ने अदालत में गवाही दी। उसने कहा, “मैं यहां सिर्फ अपनी कहानी सुनाने नहीं आई हूं। मैं उन सभी लोगों की आवाज लेकर आई हूं जिनके सच को पैसा, डर और झूठ ने दबा दिया। मेरे पिता को मार दिया गया, मेरी मां को हादसा बना दिया गया, मेरी जिंदगी झूठ में रखी गई। लेकिन सच की एक आदत होती है—वह देर से आता है, मगर आता जरूर है।”
कोर्टरूम में सन्नाटा था।
विराज पीछे बैठा था। उसकी आंखों में गर्व था।
मीरा ने पूरी जांच पर एक बड़ी रिपोर्ट बनाई। आरोही की डॉक्यूमेंट्री का दूसरा भाग रिलीज हुआ—“असली कातिल का चौथा चेहरा।” इस बार कहानी सिर्फ प्रेम, अपराध और न्याय की नहीं थी। यह कहानी थी एक लड़की की, जिसने पहले अपने प्यार को बचाया, फिर अपने पिता का सच खोजा, और अंत में अपनी ही परवरिश के पीछे छिपे शैतान को बेनकाब किया।
एक शाम आरोही अपने पिता राघव की पुरानी शतरंज की मेज के सामने बैठी थी। सफेद राजा उसके हाथ में था। विराज उसके पास आया।
“अब क्या करोगी?” उसने पूछा।
आरोही ने राजा को बिसात पर रखा। “अब उन लोगों को खोजूंगी जो अब भी खुद को राजा समझते हैं।”
विराज ने कहा, “इस रास्ते में खतरा है।”
आरोही ने उसकी तरफ देखा। “मुझे पता है। लेकिन अब मैं अकेली नहीं हूं।”
विराज ने उसका हाथ थाम लिया।
बाहर सूरज ढल रहा था। आसमान में लालिमा थी। जैसे किसी पुराने खून का हिसाब अभी बाकी हो। आरोही ने खिड़की से बाहर देखा। शहर वही था, लोग वही थे, लेकिन अब उसे हर चेहरा अलग दिखता था। हर मुस्कान के पीछे शक था, हर चुप्पी के पीछे कहानी।
तभी उसके फोन पर एक नया मैसेज आया।
“आर.के. गिर गया। लेकिन खेल खत्म नहीं हुआ। अगली चाल तुम्हारी मां की मौत से शुरू होगी।”
आरोही ने फोन कसकर पकड़ा।
विराज ने पूछा, “क्या हुआ?”
आरोही ने धीरे से कहा, “मां का सच अभी बाकी है।”
कमरे में रखी शतरंज की बिसात पर काला घोड़ा अपने आप गिर पड़ा, जैसे किसी अदृश्य हाथ ने अगली चाल चल दी हो।
कहानी खत्म नहीं हुई थी।
क्योंकि असली सजा अभी शुरू हुई थी।
इसका तीसरा भाग “मां की मौत का झूठा हादसा” नाम से और भी ज्यादा emotional crime thriller बनाया जा सकता है।
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