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कलंदुला जलप्रपात के नीचे खिला प्रेम

अंगोला की धरती पर बरसात का मौसम अपने पूरे यौवन पर था। दूर तक फैले हरे जंगलों के ऊपर बादल इतने नीचे झुके थे, मानो पेड़ों की चोटियों को छूकर उनके रहस्य सुनना चाहते हों। मालांजे प्रांत की घुमावदार सड़क पर एक पुरानी जीप तेजी से आगे बढ़ रही थी। उसके पहिए लाल मिट्टी को उछालते हुए उस दिशा में जा रहे थे, जहां प्रकृति ने पानी, पत्थर और जंगल को मिलाकर एक अद्भुत चमत्कार बनाया था—कलंदुला जलप्रपात।

जीप की पिछली सीट पर बैठे वन्यजीव फोटोग्राफर देवांश मेहरा ने कैमरे का लेंस साफ करते हुए बाहर देखा। विशाल घास के मैदान, बीच-बीच में दिखाई देते जंगली फूल और दूर तक फैले वृक्ष उसे किसी स्वप्नलोक जैसे लग रहे थे।

देवांश भारत का एक प्रसिद्ध वन्यजीव फोटोग्राफर था। उसके द्वारा खींची गई तस्वीरें दुनिया की कई बड़ी पत्रिकाओं में प्रकाशित हो चुकी थीं। उसने बर्फीले पहाड़ों में हिम तेंदुए का पीछा किया था, अफ्रीकी मैदानों में शेरों के बीच रात बिताई थी और अमेज़न के घने जंगलों में दुर्लभ पक्षियों को कैमरे में कैद किया था। लोग उसकी तस्वीरों में साहस देखते थे, लेकिन कोई यह नहीं जानता था कि उस साहस के पीछे एक व्यक्ति था जो विश्वास करने से डरता था।

तीन वर्ष पहले उसकी मंगेतर ने किसी और व्यक्ति से विवाह कर लिया था। वह भी उस समय, जब देवांश एक लंबे अभियान पर था। उसके लौटने पर उसे केवल एक छोटा-सा संदेश मिला था—“तुम हमेशा जंगलों से प्रेम करते रहे। मुझे किसी ऐसे व्यक्ति की आवश्यकता थी जो मेरे साथ रह सके।”

उस दिन के बाद देवांश ने लोगों से अधिक अपने कैमरे पर भरोसा करना शुरू कर दिया था। कैमरा कभी झूठ नहीं बोलता था। वह जो देखता, वही दिखाता था। मनुष्य की तरह अपने भाव नहीं बदलता था।

उसका वर्तमान अभियान कलंदुला जलप्रपात और उसके आसपास के वन्य जीवन पर एक विशेष फोटो-श्रृंखला तैयार करना था। लेकिन उसके मन में एक दूसरा लक्ष्य भी था। उसने स्थानीय कथाओं में एक ऐसे दुर्लभ फूल के बारे में पढ़ा था जो केवल जलप्रपात की धुंध से भरी चट्टानों के बीच खिलता था। स्थानीय लोग उसे “लुमिया”, अर्थात “जल की रोशनी”, कहते थे।

कहा जाता था कि लुमिया का फूल सूर्य निकलने से पहले केवल कुछ घंटों के लिए खिलता और पहली तेज धूप पड़ते ही अपनी पंखुड़ियां बंद कर लेता था। उस फूल की कोई स्पष्ट तस्वीर उपलब्ध नहीं थी।

देवांश उस फूल की पहली विश्वसनीय तस्वीर लेना चाहता था।

जैसे ही जीप एक छोटे गांव के पास रुकी, दूर से जल के गिरने की भारी गर्जना सुनाई दी। आवाज इतनी शक्तिशाली थी कि धरती के भीतर हल्का कंपन महसूस हो रहा था।

ड्राइवर ने मुस्कराते हुए कहा, “कलंदुला आपका स्वागत कर रहा है।”

देवांश ने कैमरा उठाया और जीप से उतर गया। हवा में नमी थी। पेड़ों से टपकती बूंदें लाल मिट्टी पर छोटे-छोटे निशान बना रही थीं। गांव के कुछ बच्चे उसे कौतूहल से देख रहे थे।

तभी उसकी नजर एक युवती पर पड़ी।

वह एक बड़े बाओबाब वृक्ष के नीचे बैठी कुछ पौधों के नमूने व्यवस्थित कर रही थी। उसने हल्के हरे रंग की कमीज, भूरे रंग की पतलून और मजबूत जूते पहन रखे थे। उसके घुंघराले काले बाल एक कपड़े से पीछे बंधे थे। उसकी त्वचा पर धूप की सुनहरी चमक थी और आंखों में जंगल जैसी गहराई।

युवती ने एक छोटे बैंगनी फूल को कागज के बीच रखते हुए ऊपर देखा।

“आप ही देवांश मेहरा हैं?” उसने स्पष्ट अंग्रेजी में पूछा।

“जी। और शायद आप मेरी स्थानीय मार्गदर्शक हैं?”

युवती खड़ी हुई और उसके सामने आकर बोली, “मार्गदर्शक नहीं। वनस्पति वैज्ञानिक। मेरा नाम अमारा नदोंगो है।”

देवांश ने हाथ बढ़ाया। “आपसे मिलकर प्रसन्नता हुई।”

अमारा ने हाथ मिलाया, लेकिन उसके चेहरे पर औपचारिकता बनी रही।

“मुझे बताया गया है कि आप लुमिया फूल की तलाश करना चाहते हैं।”

“सिर्फ तलाश नहीं। उसकी तस्वीर लेना चाहता हूं।”

“बहुत से लोग यही चाहते हैं।”

“लेकिन शायद किसी ने सही स्थान नहीं खोजा।”

अमारा ने उसकी ओर ऐसे देखा जैसे उसकी बात में छिपे अहंकार को पढ़ रही हो।

“या शायद फूल उन लोगों को दिखाई नहीं देता जो केवल प्रसिद्धि के लिए उसे खोजते हैं।”

देवांश ने हल्की मुस्कान के साथ कैमरा कंधे पर टांगा। “फूल यह निर्णय कैसे करता है?”

“फूल नहीं करता,” अमारा ने कहा, “जंगल करता है।”

यह उनकी पहली मुलाकात थी और पहले ही क्षण दोनों को समझ आ गया था कि उनकी यात्रा आसान नहीं होने वाली।

जल की गर्जना

अगली सुबह अमारा देवांश को जलप्रपात के ऊपरी हिस्से तक ले गई। रास्ता गीला और फिसलन भरा था। ऊंची घास उनके घुटनों को छू रही थी। पेड़ों के बीच रंग-बिरंगे पक्षियों की आवाजें गूंज रही थीं।

कुछ दूर चलने के बाद जंगल अचानक खुल गया।

देवांश वहीं रुक गया।

उसके सामने कलंदुला जलप्रपात अपनी पूरी भव्यता के साथ फैला था। विशाल चट्टानी किनारे से असंख्य सफेद जलधाराएं नीचे गिर रही थीं। पानी की गर्जना आकाश तक पहुंचती हुई लग रही थी। गिरते जल से उठी धुंध हवा में तैर रही थी और सूर्य की किरणों से मिलकर कई छोटे इंद्रधनुष बना रही थी।

देवांश ने बिना कुछ कहे कैमरा उठाया।

उसने चौड़े दृश्य की तस्वीर ली। फिर गिरते जल की गति, धुंध में चमकते इंद्रधनुष, किनारे पर बैठे पक्षियों और चट्टानों से चिपकी काई को कैमरे में कैद किया।

अमारा कुछ दूरी पर खड़ी उसे देखती रही।

“आप हर चीज को कैमरे के भीतर क्यों रखना चाहते हैं?” उसने पूछा।

देवांश ने लेंस से नजर हटाए बिना कहा, “ताकि जो लोग यहां नहीं आ सकते, वे भी इसे देख सकें।”

“लेकिन क्या आप स्वयं इसे देख रहे हैं?”

देवांश ने कैमरा नीचे कर दिया। “मैं समझा नहीं।”

अमारा जलप्रपात की ओर मुड़ी। “कभी-कभी तस्वीर लेने की जल्दी में मनुष्य उस क्षण को जीना भूल जाता है। जलप्रपात को केवल आंखों से नहीं देखा जाता। इसकी आवाज को शरीर में महसूस करना पड़ता है।”

देवांश ने कुछ क्षण कैमरा बंद रखा। उसने आंखें मूंद लीं।

जल की गर्जना उसके कानों से होकर सीने में उतर गई। हवा में तैरती ठंडी बूंदें उसके चेहरे से टकराईं। मिट्टी, पत्तों और पानी की मिली-जुली गंध ने उसे घेर लिया।

जब उसने आंखें खोलीं, अमारा उसे देख रही थी।

“अब?” उसने पूछा।

देवांश ने पहली बार बिना किसी व्यंग्य के कहा, “अब यह एक तस्वीर से बड़ा लगता है।”

अमारा के होंठों पर हल्की मुस्कान आई। वह बहुत छोटी मुस्कान थी, लेकिन देवांश ने उसे कैमरे के बिना भी याद कर लिया।

वे जलप्रपात के किनारे से नीचे जाने वाले रास्ते की ओर बढ़े। अमारा ने बताया कि लुमिया फूल सीधे जलप्रपात के पास नहीं, बल्कि उससे जुड़े एक गुप्त जलमार्ग की चट्टानों पर उगता है। वहां पहुंचने के लिए उन्हें दो दिन जंगल में चलना पड़ता।

“क्या आपने फूल को देखा है?” देवांश ने पूछा।

अमारा कुछ क्षण चुप रही।

“बचपन में।”

“फिर आप स्थान जानती हैं?”

“स्थान बदलता रहता है। बरसात में धाराएं अपना रास्ता बदलती हैं, चट्टानें टूटती हैं और नए पौधे जन्म लेते हैं।”

“लेकिन आपको अनुमान तो होगा।”

अमारा रुकी। “जंगल में अनुमान और अहंकार, दोनों जानलेवा हो सकते हैं।”

देवांश ने महसूस किया कि वह हर बात का सीधा उत्तर नहीं देती थी। उसकी बातों में उस भूमि के प्रति गहरा सम्मान था।

रास्ते में अमारा हर कुछ कदम पर रुककर किसी पौधे को देखती, उसकी पत्तियों को छूती या मिट्टी का नमूना लेती। देवांश को उसकी धीमी गति से परेशानी हो रही थी।

“इस गति से चले तो फूल अगली शताब्दी में मिलेगा,” उसने कहा।

अमारा झुकी रही। “यह पौधा घायल हाथियों के घाव भरने में उपयोग होता है।”

“क्या हाथी आपको यह बताकर गए थे?”

“स्थानीय शिकारी और बुजुर्गों ने बताया। वैज्ञानिक ज्ञान हमेशा प्रयोगशाला से नहीं आता।”

देवांश ने उसकी तस्वीर लेने के लिए कैमरा उठाया।

अमारा तुरंत खड़ी हो गई। “आपने अनुमति नहीं ली।”

“यह केवल काम करते हुए आपकी तस्वीर थी।”

“मेरी तस्वीर है, तो अनुमति मेरी होगी।”

देवांश ने कैमरा नीचे कर लिया। “ठीक है। क्या मैं आपकी तस्वीर ले सकता हूं?”

“नहीं।”

“ठीक है।”

अमारा को शायद इतने सरल उत्तर की उम्मीद नहीं थी। उसने अपना बैग उठाया और आगे बढ़ गई।

कुछ दूरी के बाद उसने पीछे देखे बिना कहा, “जब मैं अनुमति दूंगी, तब तस्वीर अच्छी आनी चाहिए।”

देवांश मुस्करा दिया। “मेरी तस्वीरें अक्सर अच्छी आती हैं।”

“मैंने आपकी तस्वीरों की नहीं, अपने चेहरे की बात की थी।”

उस दिन पहली बार दोनों एक साथ हंसे।

जंगल की रात

शाम होने से पहले उन्होंने नदी के पास शिविर लगाया। देवांश ने तंबू खड़ा किया और अमारा ने सूखी लकड़ियां इकट्ठी कर आग जलाई। जंगल का अंधेरा शहरों के अंधेरे से अलग था। यहां अंधकार खाली नहीं था। उसमें कीटों, पक्षियों और अनदेखे जीवों की आवाजें भरी थीं।

अमारा ने एक बर्तन में कसावा, जंगली सब्जियां और मसाले पकाए। देवांश ने भोजन चखते ही कहा, “यह अभियान का अब तक का सबसे अच्छा हिस्सा है।”

“आपको जलप्रपात से अधिक मेरा खाना पसंद आया?”

“जलप्रपात सुंदर है, लेकिन उसे खाया नहीं जा सकता।”

अमारा हंस पड़ी।

आग की रोशनी उसके चेहरे पर पड़ रही थी। दिन की कठोर वैज्ञानिक अब शांत लग रही थी। देवांश ने कैमरे की ओर हाथ बढ़ाया, फिर रुक गया।

अमारा ने उसकी हरकत देख ली।

“आज नहीं,” उसने कहा।

“मैंने पूछा भी नहीं।”

“आपका कैमरा आपकी आंखों से पहले पूछता है।”

कुछ देर दोनों चुपचाप भोजन करते रहे।

देवांश ने पूछा, “आप वनस्पति वैज्ञानिक कैसे बनीं?”

अमारा ने आग में लकड़ी का एक टुकड़ा डाला। “मेरे पिता गांव के चिकित्सक थे। डॉक्टर नहीं, लेकिन उन्हें औषधीय पौधों का बहुत ज्ञान था। लोग कई दिनों की दूरी से उनके पास आते थे। मेरी मां विद्यालय में पढ़ाती थीं।”

“और लुमिया?”

अमारा की आंखें कुछ देर आग की लपटों में खो गईं।

“मेरी मां मुझे पहली बार वहां ले गई थीं। उस समय मैं दस वर्ष की थी। उन्होंने कहा था कि कुछ फूल सुंदर होने के लिए नहीं खिलते। वे हमें याद दिलाते हैं कि कठिन जगहों में भी जीवन जन्म ले सकता है।”

“वे अब कहां हैं?”

“मेरे पिता का कई वर्ष पहले निधन हो गया। मां राजधानी में मेरी बहन के साथ रहती हैं।”

“आप यहां अकेली रहती हैं?”

“अकेली नहीं। गांव है, जंगल है, मेरा काम है।”

देवांश ने धीरे से कहा, “कभी-कभी बहुत लोगों के बीच भी इंसान अकेला हो सकता है।”

अमारा ने उसकी ओर देखा। “और कभी-कभी इंसान अकेला इसलिए रहता है क्योंकि उसे लोगों पर भरोसा नहीं होता।”

देवांश ने नजरें आग की ओर कर लीं।

“आप हर व्यक्ति का अध्ययन पौधों की तरह करती हैं?”

“पौधे अधिक ईमानदार होते हैं। उन्हें पानी चाहिए तो वे मुरझा जाते हैं। मनुष्य प्रेम चाहते हुए भी कहते हैं कि उन्हें किसी की आवश्यकता नहीं।”

उसका वाक्य देवांश के भीतर कहीं गहराई तक उतर गया।

रात को अचानक तेज वर्षा शुरू हो गई। हवा के साथ पानी तिरछा पड़ रहा था। देवांश के तंबू का एक हिस्सा खुल गया। वह उसे संभालने बाहर निकला तो देखा कि अमारा नमूनों वाले थैले को बचाने की कोशिश कर रही थी।

“पहले तंबू में चलो!” उसने चिल्लाकर कहा।

“ये नमूने कई महीनों के काम का परिणाम हैं।”

एक तेज हवा का झोंका आया और अमारा का संतुलन बिगड़ गया। देवांश ने तुरंत उसका हाथ पकड़ लिया। दोनों कीचड़ में गिरते-गिरते बचे।

कुछ क्षण के लिए उनके चेहरे बहुत पास थे।

वर्षा की बूंदें अमारा की पलकों पर ठहरी थीं। देवांश का हाथ अब भी उसकी कलाई पकड़े हुए था।

अमारा ने धीरे से कहा, “मैं ठीक हूं।”

देवांश ने हाथ छोड़ दिया। दोनों ने मिलकर नमूने सुरक्षित किए और तंबू के भीतर आ गए।

तंबू छोटा था। उन्हें पास-पास बैठना पड़ा। बाहर वर्षा का शोर था और भीतर एक अनकही बेचैनी।

अमारा ने अपने गीले बाल खोले। देवांश ने अपने बैग से तौलिया निकालकर उसकी ओर बढ़ाया।

“धन्यवाद।”

“आपने सोचा नहीं था कि एक अहंकारी फोटोग्राफर तौलिया भी साथ रखता होगा?”

“मैंने सोचा था आपके बैग में केवल कैमरे और पुरस्कार होंगे।”

“पुरस्कार नहीं लाया। उन्हें बारिश पसंद नहीं।”

अमारा मुस्कराई।

फिर उसने अचानक पूछा, “आप लोगों से दूर क्यों रहते हैं?”

देवांश ने उत्तर देने में समय लिया।

“क्योंकि दूरी से तस्वीर साफ आती है।”

“मैं तस्वीर की बात नहीं कर रही।”

देवांश ने बाहर देखते हुए अपनी कहानी बताई। उसने मंगेतर के चले जाने, संदेश और उसके बाद किसी के करीब न जाने की बात कही।

अमारा ने सहानुभूति दिखाने के लिए उसका हाथ नहीं पकड़ा। उसने कोई सामान्य सांत्वना भी नहीं दी।

उसने केवल कहा, “किसी एक व्यक्ति का निर्णय पूरी दुनिया का स्वभाव नहीं होता।”

“विश्वास टूट जाए तो दोबारा बनाना आसान नहीं।”

“जंगल में आग लगने के बाद भी पौधे दोबारा उगते हैं।”

“लेकिन वही जंगल वापस नहीं आता।”

“नहीं,” अमारा ने कहा, “कभी-कभी उससे भी मजबूत जंगल जन्म लेता है।”

बाहर वर्षा धीरे-धीरे शांत होने लगी। लेकिन देवांश के भीतर वर्षों से जमा कठोरता में पहली बार एक छोटी-सी दरार पड़ चुकी थी।

टूटे हुए पुल के पार

अगली सुबह उन्होंने नदी पार करने के लिए लकड़ी का पुराना पुल चुना। बरसात के कारण नदी उफान पर थी। पुल की कई पट्टियां सड़ चुकी थीं।

देवांश ने पुल देखकर कहा, “क्या दूसरा रास्ता नहीं है?”

“है। लेकिन उसमें दो दिन अधिक लगेंगे।”

“और फूल के खिलने का समय?”

“अगली दो सुबहों में संभावना सबसे अधिक है।”

देवांश ने पुल पर कदम रखा। अमारा उसके पीछे थी। नीचे गंदला पानी चट्टानों से टकराकर बह रहा था।

आधे रास्ते पर पहुंचते ही एक लकड़ी टूट गई। अमारा का पैर खाली जगह में चला गया और वह रेलिंग से लटक गई।

“अमारा!”

देवांश तुरंत घुटनों के बल बैठा और उसका हाथ पकड़ लिया। कैमरे का भारी बैग उसके शरीर को पीछे खींच रहा था।

“बैग छोड़ दो!” अमारा चिल्लाई।

उस बैग में लाखों रुपये के कैमरे और महीनों की तस्वीरें थीं।

देवांश ने एक क्षण भी नहीं सोचा। उसने पट्टा खोला और कैमरे वाला बैग नदी में गिरा दिया।

बैग पानी में गिरते ही लहरों के बीच गायब हो गया।

अब उसने दोनों हाथों से अमारा को ऊपर खींच लिया। अमारा पुल पर गिर पड़ी। कुछ पल दोनों सांस लेते रहे।

अमारा ने नदी की ओर देखा। “आपका कैमरा…”

“कैमरा दोबारा खरीदा जा सकता है।”

“उसमें आपकी सारी तस्वीरें थीं।”

“तुम नहीं होतीं तो तस्वीरें किस काम आतीं?”

शब्द उसके मुंह से बिना सोचे निकल गए थे।

अमारा उसकी ओर देखती रही। उसकी आंखों में आश्चर्य, कृतज्ञता और किसी नए भाव का मिश्रण था।

देवांश ने स्थिति को हल्का करने की कोशिश की। “वैसे एक छोटा कैमरा दूसरे बैग में है।”

अमारा की आंखें नम होने के बावजूद वह हंस पड़ी। “तो आपका बलिदान पूरा नहीं था?”

“मैं फोटोग्राफर हूं। बिना कैमरे के घर लौटना मेरी प्रतिष्ठा के विरुद्ध है।”

पुल पार करने के बाद अमारा ने उसके हाथ पर लगी चोट साफ की। देवांश एक चट्टान पर बैठा था और अमारा उसके सामने घुटनों के बल बैठी पट्टी बांध रही थी।

“आपने बैग छोड़ने में देर नहीं की,” उसने कहा।

“सोचने का समय नहीं था।”

“मनुष्य जो बिना सोचे करता है, वही उसके बारे में सबसे सच्ची बात बताता है।”

“और उसने मेरे बारे में क्या बताया?”

अमारा ने पट्टी बांधकर ऊपर देखा। “कि शायद आप उतने स्वार्थी नहीं हैं जितने दिखने की कोशिश करते हैं।”

देवांश ने धीमे स्वर में पूछा, “और तुम उतनी कठोर नहीं हो जितनी दिखाई देती हो?”

अमारा उठ खड़ी हुई। “मैं कठोर नहीं हूं। केवल सावधान हूं।”

“दोनों में अंतर है?”

“बहुत बड़ा। कठोर व्यक्ति महसूस नहीं करना चाहता। सावधान व्यक्ति महसूस करता है, इसलिए डरता है।”

इस बार देवांश के पास कोई उत्तर नहीं था।

गांव का रहस्य

दोपहर के समय वे पहाड़ियों के बीच बसे एक छोटे गांव में पहुंचे। यहां मिट्टी और लकड़ी के घर थे। बच्चे वर्षा के पानी में खेल रहे थे। गांव की एक वृद्ध महिला ने अमारा को देखते ही गले लगा लिया।

उसका नाम मामा एशा था। वह अमारा के पिता को जानती थी।

जब अमारा ने लुमिया फूल का उल्लेख किया तो वृद्ध महिला का चेहरा गंभीर हो गया।

“पहाड़ के भीतर का रास्ता बदल गया है,” उसने स्थानीय भाषा में कहा। अमारा ने देवांश के लिए अनुवाद किया। “पिछले महीने चट्टान खिसकी थी। पुराना रास्ता बंद है।”

“क्या कोई नया रास्ता है?” देवांश ने पूछा।

मामा एशा ने उसकी ओर देखा। फिर अमारा से कुछ कहा।

“वह पूछ रही हैं कि तुम फूल क्यों खोज रहे हो,” अमारा ने बताया।

देवांश ने उत्तर दिया, “उसकी तस्वीर दुनिया को दिखाने के लिए।”

वृद्ध महिला ने सिर हिलाया।

अमारा ने कहा, “वह कहती हैं कि दुनिया को हर सुंदर चीज का स्थान जानने की आवश्यकता नहीं।”

देवांश को यह बात अच्छी नहीं लगी। “मैं स्थान सार्वजनिक नहीं करूंगा। केवल तस्वीर लूंगा।”

मामा एशा ने फिर कुछ कहा।

“उनका कहना है कि पहले भी एक विदेशी दल आया था। उन्होंने दुर्लभ पौधों की तस्वीरें लीं और स्थान दर्ज किया। कुछ महीनों बाद तस्कर आए और पौधे उखाड़कर ले गए।”

देवांश शांत हो गया।

अमारा ने उसकी ओर देखते हुए कहा, “यही कारण है कि मैं आपकी सहायता करने के लिए तैयार नहीं थी।”

“फिर आई क्यों?”

“यह सुनिश्चित करने के लिए कि नुकसान न हो।”

देवांश को पहली बार समझ आया कि अमारा उसे केवल एक जिद्दी फोटोग्राफर नहीं, संभावित खतरे के रूप में देखती थी।

“तुम्हें लगता है मैं स्थान बेच दूंगा?”

“मैं आपको नहीं जानती।”

“दो दिन से साथ हो।”

“विश्वास समय से नहीं, निर्णयों से बनता है।”

देवांश कुछ कहना चाहता था, लेकिन रुक गया। उसने नदी में कैमरा बैग छोड़ दिया था, फिर भी अमारा पूरी तरह आश्वस्त नहीं थी। उसे क्रोध आ सकता था, लेकिन भीतर कहीं वह जानता था कि अमारा गलत नहीं थी।

शाम को मामा एशा उन्हें एक पुराने पथ तक ले गईं। वहां से आगे उन्हें एक संकरी गुफा पार करनी थी।

रात उन्होंने गांव में बिताई। स्थानीय लोग आग के चारों ओर गीत गा रहे थे। एक युवक लकड़ी का वाद्य बजा रहा था। बच्चे नाच रहे थे।

अमारा भी उनके साथ नृत्य में शामिल हो गई। देवांश ने पहली बार उसे पूरी तरह मुक्त देखा। उसके कदम संगीत के साथ बह रहे थे। उसके चेहरे पर ऐसी खुशी थी जो किसी तस्वीर के लिए नहीं, केवल उस क्षण के लिए थी।

देवांश ने छोटा कैमरा निकाला, लेकिन तस्वीर नहीं ली।

अमारा ने नाचते हुए उसकी ओर देखा और कैमरा देख लिया। वह उसके पास आई।

“आज अनुमति मांगोगे?”

देवांश ने कैमरा नीचे कर दिया। “नहीं। आज केवल देखूंगा।”

“क्यों?”

“क्योंकि कुछ क्षणों को कैद करना उन्हें छोटा कर देता है।”

अमारा कुछ पल चुप रही। फिर उसने हाथ आगे बढ़ाया।

“तो केवल देखो मत। मेरे साथ नाचो।”

“मैं नृत्य नहीं करता।”

“हर व्यक्ति नृत्य कर सकता है।”

“तुमने मुझे चलते हुए नहीं देखा?”

अमारा ने उसका हाथ पकड़कर उसे खींच लिया। “आज जंगल आपके अहंकार की एक और परत उतारेगा।”

देवांश के कदम कई बार गलत पड़े। बच्चे हंसते रहे। अमारा उसे सही दिशा में घुमाती रही। कुछ देर बाद वह भी हंसने लगा।

बहुत वर्षों बाद उसने स्वयं को भविष्य की चिंता और अतीत की चोट से मुक्त महसूस किया।

रात के अंत में दोनों आग से कुछ दूरी पर बैठ गए।

“तुमने कहा था कि तुम सावधान हो,” देवांश बोला। “किससे?”

अमारा का चेहरा गंभीर हो गया।

“कुछ वर्ष पहले मैं एक शोधकर्ता के साथ काम करती थी। उसका नाम मिगुएल था। हम साथ शोध करते थे और… एक-दूसरे के करीब थे।”

देवांश के भीतर हल्की ईर्ष्या उठी, जिसे उसने छिपा लिया।

“उसने मेरे शोध से एक औषधीय पौधे की जानकारी चुरा ली। एक कंपनी को बेच दी। कंपनी ने बिना अनुमति उस पौधे की खेती और दवा का पेटेंट कराने की कोशिश की। स्थानीय लोगों को कुछ नहीं मिला।”

“तुमने उसे रोका?”

“लंबी लड़ाई के बाद। लेकिन तब तक वह जा चुका था। उसने कहा था कि विज्ञान भावनाओं से नहीं चलता।”

“और तुमने उसके बाद किसी पर भरोसा नहीं किया।”

अमारा ने हल्की मुस्कान के साथ कहा, “देखा? मैं ही हर व्यक्ति का अध्ययन नहीं करती।”

उनके बीच चुप्पी फैल गई।

देवांश ने धीरे से कहा, “मैं मिगुएल नहीं हूं।”

“हर व्यक्ति शुरुआत में यही कहता है कि वह पिछले व्यक्ति जैसा नहीं है।”

“तो मुझे साबित करने का अवसर दो।”

अमारा ने उसकी ओर देखा। “विश्वास मांगा नहीं जाता, देवांश। कमाया जाता है।”

अंधेरी गुफा

सुबह वे मामा एशा द्वारा बताए गए रास्ते पर निकले। कुछ घंटे बाद वे एक पहाड़ी की तलहटी में पहुंचे, जहां चट्टानों के बीच संकरा प्रवेश द्वार था। भीतर से ठंडी हवा आ रही थी।

अमारा ने टॉर्च जलाई। “इस गुफा के पार वह घाटी है जहां लुमिया मिलने की संभावना है।”

“संभावना?”

“प्रकृति लिखित समझौता नहीं देती।”

गुफा के भीतर अंधेरा गहरा था। कई स्थानों पर उन्हें झुककर चलना पड़ रहा था। छत से पानी टपक रहा था। चमगादड़ों की फड़फड़ाहट सुनाई दे रही थी।

करीब आधे रास्ते पर एक स्थान इतना संकरा था कि केवल एक व्यक्ति रेंगकर निकल सकता था। देवांश पहले आगे बढ़ा। दूसरी ओर पहुंचकर उसने आवाज दी, “रास्ता साफ है।”

अमारा भीतर आई, लेकिन बीच में उसका बैग चट्टान में फंस गया। उसने निकलने की कोशिश की तो ऊपर से छोटे पत्थर गिरने लगे।

“हिलना मत!” देवांश ने कहा।

“मैं फंस गई हूं।”

देवांश वापस संकरे रास्ते में घुसा। दोनों के बीच केवल कुछ इंच का अंतर था। उसने अमारा के बैग का पट्टा खोला और उसे धीरे-धीरे पीछे खींचा।

तभी एक बड़ा पत्थर गिरा और रास्ते का हिस्सा बंद हो गया। अंधेरे में धूल भर गई।

अमारा की सांस तेज हो गई।

“मैं सांस नहीं ले पा रही,” उसने घबराकर कहा।

देवांश ने उसका हाथ पकड़ लिया। “मेरी आवाज सुनो।”

“यह जगह बंद हो रही है।”

“मेरी ओर देखो।”

“अंधेरा है।”

“तो मेरी आवाज को देखो। धीरे-धीरे सांस लो।”

देवांश स्वयं भी डरा हुआ था, लेकिन उसकी आवाज स्थिर रही।

“हम यहां से निकलेंगे। मैं तुम्हें अकेला नहीं छोड़ूंगा।”

“वादा मत करो,” अमारा ने कांपती आवाज में कहा। “लोग डर में वादा करते हैं और सुरक्षित होते ही भूल जाते हैं।”

“तो वादा नहीं। निर्णय समझो। मैं अभी यहां हूं और यहीं रहूंगा।”

कुछ क्षण बाद अमारा की सांस सामान्य होने लगी। देवांश ने चट्टान के किनारे हाथ लगाकर जगह बनाई। दोनों धीरे-धीरे बाहर निकल आए।

गुफा के दूसरे छोर पर पहुंचते ही उन्हें खुला आकाश दिखाई दिया। सामने धुंध से भरी एक छोटी घाटी थी। ऊंची चट्टानों से पतली जलधाराएं गिर रही थीं। हर ओर गहरे हरे रंग की काई और छोटे फूल थे।

अमारा घास पर बैठ गई। देवांश उसके पास आकर चुपचाप बैठ गया।

“मुझे बंद स्थानों से डर लगता है,” अमारा ने कहा। “बचपन में एक बार मिट्टी का कमरा गिर गया था। मैं कई घंटे उसमें बंद रही थी।”

“तुमने पहले क्यों नहीं बताया?”

“मैं नहीं चाहती थी कि तुम्हें लगे मैं कमजोर हूं।”

“डर कमजोरी नहीं है।”

“यह बात एक ऐसे व्यक्ति ने कही है जो अपने टूटे रिश्ते के बाद तीन वर्षों से भाग रहा है।”

देवांश ने हल्का सिर झुका दिया। “ठीक कहा।”

अमारा ने उसकी ओर देखा। “तुम्हें भी डर लगता है?”

“हां।”

“किससे?”

“कि जिस व्यक्ति पर भरोसा करूंगा, वह एक दिन यह निर्णय कर लेगा कि मैं पर्याप्त नहीं हूं।”

अमारा का चेहरा नरम पड़ गया।

“शायद समस्या यह नहीं कि तुम पर्याप्त नहीं थे,” उसने कहा। “शायद तुम दोनों की आवश्यकताएं अलग थीं।”

“यह समझना आसान है। महसूस करना कठिन।”

अमारा ने पहली बार अपनी इच्छा से उसका हाथ पकड़ा।

“कुछ चीजें समझने से नहीं, दोबारा जीने से ठीक होती हैं।”

देवांश ने उसकी उंगलियों को महसूस किया। उसने उनका हाथ कसकर नहीं पकड़ा, केवल अपनी हथेली स्थिर रखी, जैसे उसे निर्णय का पूरा अधिकार दे रहा हो।

कुछ देर बाद अमारा ने हाथ नहीं हटाया।

लुमिया की पहली झलक

घाटी में पहुंचकर दोनों ने घंटों खोज की। अमारा चट्टानों की नमी, काई की दिशा और मिट्टी की बनावट जांचती रही। देवांश छोटे कैमरे से आसपास के दृश्य कैद करता रहा।

सूर्य ढलने लगा, लेकिन फूल नहीं मिला।

उन्होंने एक सुरक्षित चट्टानी हिस्से में तंबू लगाया। रात में जलधाराओं की आवाज किसी मधुर संगीत जैसी सुनाई दे रही थी।

अमारा एक नक्शा देख रही थी। देवांश ने पूछा, “अगर फूल न मिला तो?”

“तो हम लौट जाएंगे।”

“तुम निराश नहीं होगी?”

“होंगी। लेकिन किसी फूल को हमारी इच्छा के अनुसार खिलने के लिए मजबूर नहीं किया जा सकता।”

“तुम हर बात को जीवन से जोड़ देती हो?”

“और तुम हर बात को तस्वीर से।”

देवांश ने कैमरे की स्क्रीन पर एक चित्र खोला। यह पिछली रात गांव में नाचती अमारा की तस्वीर नहीं थी। उसने बच्चों, आग और खुले आकाश की तस्वीर ली थी, जिसके एक किनारे पर अमारा की केवल धुंधली परछाईं थी।

“मैंने अनुमति के बिना तुम्हारा चेहरा नहीं लिया,” उसने कहा।

अमारा ने तस्वीर देखी। “लेकिन मैं इसमें हूं।”

“कुछ लोगों की उपस्थिति चेहरा दिखाई न देने पर भी महसूस होती है।”

अमारा ने उसकी ओर देखा। दोनों के बीच हवा जैसे अचानक ठहर गई।

देवांश ने धीमे से पूछा, “क्या मैं अब तुम्हारी तस्वीर ले सकता हूं?”

अमारा ने कुछ क्षण सोचा। फिर जलधारा के पास जाकर खड़ी हो गई।

“ले सकते हो।”

देवांश ने कैमरा उठाया, लेकिन तुरंत तस्वीर नहीं ली। उसने अमारा के पीछे गिरती पतली जलधारा, हवा में उड़ते उसके बाल और आंखों में दिखाई देती दृढ़ता को ध्यान से देखा।

“मुस्कराना है?” अमारा ने पूछा।

“नहीं। जैसी हो, वैसी रहो।”

उसने तस्वीर ली।

स्क्रीन पर दिखाई देती अमारा किसी मॉडल जैसी नहीं, बल्कि उस घाटी का हिस्सा लग रही थी—मजबूत, शांत और रहस्यमयी।

देवांश ने कैमरा उसकी ओर बढ़ाया।

अमारा ने तस्वीर देखी और कहा, “यह मैं हूं?”

“शायद वह तुम, जिसे तुम दूसरों से छिपाती हो।”

“तुम्हें लगता है तुम मुझे समझ गए हो?”

“नहीं। लेकिन अब समझना चाहता हूं।”

अमारा ने कैमरा लौटाते हुए पूछा, “और जब अभियान समाप्त होगा?”

यही वह प्रश्न था जिससे देवांश स्वयं बच रहा था।

“मैं नहीं जानता।”

“यही अंतर है आकर्षण और विश्वास में,” अमारा बोली। “आकर्षण वर्तमान को सुंदर बनाता है। विश्वास भविष्य के बारे में सोचने का साहस देता है।”

वह तंबू की ओर चली गई।

देवांश वहीं खड़ा रहा। उसने पहली बार महसूस किया कि वह अमारा को केवल एक अभियान की याद नहीं बनाना चाहता था। लेकिन क्या वह अपने शहर, काम और लगातार यात्राओं के बीच उसके लिए स्थान बना सकता था? क्या वह फिर किसी संबंध का जोखिम उठा सकता था?

रात के अंतिम पहर अमारा ने उसे जगाया।

“देवांश, उठो।”

आकाश अभी अंधेरा था। अमारा के हाथ में टॉर्च थी और उसकी आंखों में उत्साह।

“मुझे एक संकेत मिला है।”

दोनों चट्टानों के बीच बने संकरे रास्ते से नीचे उतरे। एक छोटी जलधारा के किनारे अमारा घुटनों के बल बैठ गई। वहां काई के बीच चांदी जैसी पतली पत्तियां उगी थीं।

“लुमिया की पत्तियां,” उसने फुसफुसाकर कहा। “फूल पास होना चाहिए।”

वे धारा के साथ आगे बढ़े। धुंध घनी होती जा रही थी। पूर्व दिशा में हल्की रोशनी दिखाई देने लगी थी।

अचानक अमारा रुक गई।

एक काली चट्टान की दरार में नीली-सफेद चमक दिखाई दे रही थी।

वह लुमिया था।

फूल आकार में छोटा था, लेकिन उसकी पारदर्शी पंखुड़ियों पर पानी की बूंदें मोतियों की तरह चमक रही थीं। भीतर का भाग हल्का सुनहरा था। सुबह की पहली रोशनी पड़ते ही ऐसा लगा जैसे फूल स्वयं प्रकाश उत्पन्न कर रहा हो।

देवांश ने सांस रोककर कैमरा उठाया।

यही वह क्षण था जिसके लिए वह हजारों किलोमीटर दूर आया था।

लेकिन जैसे ही उसने स्थान निर्धारित करने वाला उपकरण निकाला, अमारा का चेहरा बदल गया।

“तुम क्या कर रहे हो?”

“स्थान दर्ज कर रहा हूं, ताकि वैज्ञानिक रिकॉर्ड…”

“तुमने कहा था स्थान सार्वजनिक नहीं करोगे।”

“सार्वजनिक नहीं करूंगा। केवल अपने नोट्स के लिए।”

“यही मिगुएल ने कहा था।”

देवांश ने उपकरण नीचे कर लिया। “मैं मिगुएल नहीं हूं।”

“लेकिन तुम भी वही जानकारी इकट्ठी कर रहे हो।”

“मेरे काम के लिए प्रमाण आवश्यक है।”

“और इस फूल की सुरक्षा?”

“मैं तस्वीर ले सकता हूं और स्थान हटा सकता हूं।”

अमारा पीछे हट गई। उसकी आंखों में वही अविश्वास लौट आया था, जिसे देवांश पिछले दिनों कम होता हुआ महसूस कर रहा था।

“तुम्हारे लिए यह तस्वीर है,” उसने कहा। “मेरे लिए मेरे लोगों की विरासत।”

“तुम मुझ पर विश्वास नहीं करतीं।”

“तुमने मुझे विश्वास करने का कारण दिया, लेकिन अब तुम वही कर रहे हो जिससे मैं डरती थी।”

देवांश के भीतर चोट और क्रोध एक साथ उठे।

“मैंने तुम्हारी जान बचाने के लिए अपना कैमरा नदी में फेंक दिया। गुफा में तुम्हारे साथ रहा। क्या वह पर्याप्त नहीं?”

अमारा की आवाज भी ऊंची हो गई। “किसी को बचाने का अर्थ यह नहीं कि तुम्हें उसके विश्वास पर अधिकार मिल गया।”

देवांश चुप हो गया।

अमारा ने कहा, “विश्वास कोई पुरस्कार नहीं, जिसे एक अच्छे काम के बदले पाया जा सके।”

यह सुनकर देवांश ने उपकरण बंद कर दिया। उसने मेमोरी से स्थान संबंधी जानकारी मिटाई और अमारा को स्क्रीन दिखाई।

“अब केवल तस्वीर होगी। कोई स्थान नहीं।”

अमारा की आंखों में संदेह बना रहा।

“और जब कोई संपादक तुम पर दबाव डालेगा?”

देवांश ने फूल की ओर देखा। फिर कैमरे से मेमोरी कार्ड निकाला और अमारा की हथेली पर रख दिया।

“तस्वीर तुम्हारे पास रहेगी। तुम निर्णय करोगी कि इसे दुनिया के सामने लाना है या नहीं।”

“यह तुम्हारे अभियान का सबसे बड़ा लक्ष्य था।”

“था।”

“अब?”

देवांश ने उसकी आंखों में देखा। “अब मेरा लक्ष्य यह साबित करना नहीं कि मैंने फूल खोज लिया। यह सुनिश्चित करना है कि फूल सुरक्षित रहे और तुम जान सको कि हर व्यक्ति तुम्हारे विश्वास का व्यापार नहीं करता।”

अमारा के चेहरे पर कठोरता धीरे-धीरे पिघलने लगी।

“तुम्हें मुझसे इतना विश्वास क्यों चाहिए?”

देवांश ने पहली बार बिना बचाव के अपने मन की बात कही।

“क्योंकि मैं तुमसे प्रेम करने लगा हूं।”

जलधारा की आवाज के बीच भी उसके शब्द स्पष्ट सुनाई दिए।

अमारा स्थिर खड़ी रही।

देवांश आगे बोला, “शायद यह जल्दी है। शायद मुझे यह नहीं कहना चाहिए। लेकिन मैं हर क्षण को तस्वीर की तरह दूर से देखकर जीवन नहीं बिता सकता। मुझे नहीं पता हमारे रास्ते कैसे मिलेंगे। मैं केवल इतना जानता हूं कि तुम्हारे साथ मैं वह व्यक्ति बनना चाहता हूं जो भागता नहीं।”

अमारा की आंखों में आंसू चमक उठे।

“तुम्हें लगता है प्रेम फूल मिलने जैसा है?” उसने पूछा। “एक दुर्लभ क्षण, जिसे कैमरे में कैद किया और कहानी पूरी?”

“नहीं,” देवांश ने कहा। “पहले ऐसा सोचता था। अब समझा हूं कि प्रेम फूल खोजने में नहीं, उसके रास्ते पर साथ चलने में है। पुल टूटे, बारिश हो, अंधेरी गुफा आए—फिर भी साथ रहना।”

अमारा ने अपनी मुट्ठी खोली। मेमोरी कार्ड उसकी हथेली पर था।

“और अगर मैं अभी भी पूरी तरह विश्वास न कर सकूं?”

“तो मैं प्रतीक्षा करूंगा। विश्वास मांगा नहीं जाता। कमाया जाता है—तुमने ही कहा था।”

अमारा की आंखों से एक बूंद गाल पर उतर आई। उसने आगे बढ़कर अपना माथा देवांश के माथे से लगा दिया।

“मैं भी तुमसे प्रेम करने लगी हूं,” उसने बहुत धीरे से कहा। “और यही कारण है कि मैं अधिक डर रही थी।”

देवांश ने उसके चेहरे को हाथों में नहीं लिया। उसने उसे चूमने की जल्दी नहीं की। वह केवल वहीं खड़ा रहा, उसे अपने निर्णय की जगह देता हुआ।

अमारा ने स्वयं दूरी कम की और उसके होंठों को हल्के से छू लिया।

उनका पहला चुंबन जलप्रपात की गर्जना के बीच नहीं, बल्कि एक छोटी शांत जलधारा के पास हुआ, जहां दुर्लभ लुमिया फूल सुबह की रोशनी में खिल रहा था।

वह प्रेम chance से नहीं, trust से जन्मा था।

लौटने की परीक्षा

वापसी का मार्ग भी आसान नहीं था। दोपहर तक तेज वर्षा होने लगी और घाटी की जलधाराएं उफान पर आ गईं। जिस गुफा से वे आए थे, उसमें पानी भरने का खतरा था। उन्हें पहाड़ी के ऊपरी रास्ते से निकलना पड़ा।

एक स्थान पर चट्टान टूटने से देवांश का पैर घायल हो गया। वह चलने की कोशिश करता रहा, लेकिन दर्द बढ़ता गया।

“तुम आगे गांव तक जाओ,” उसने अमारा से कहा। “मदद लेकर आना।”

“मैं तुम्हें अकेला नहीं छोड़ूंगी।”

“मुझे यहां कुछ नहीं होगा।”

“वादा मत करो,” अमारा ने उसकी ही बात दोहराई। “लोग डर में वादा करते हैं।”

दर्द के बावजूद देवांश मुस्कराया। “तुम मेरी बातें चुराने लगी हो।”

अमारा ने उसका हाथ अपने कंधे पर रखा। “नहीं। तुम्हें याद दिला रही हूं कि विश्वास का अर्थ साथ रहना है।”

वे धीरे-धीरे आगे बढ़े। कई घंटों बाद उन्हें गांव के दो युवक मिले, जिन्हें मामा एशा ने उनकी खोज में भेजा था।

गांव पहुंचने पर देवांश का उपचार किया गया। रात को वह मिट्टी के घर में लेटा था। अमारा उसके पास बैठी जड़ी-बूटी का लेप बदल रही थी।

“तुम्हारी तस्वीर का क्या होगा?” उसने पूछा।

“हमारी तस्वीर।”

“फूल की तस्वीर।”

“वह तुम्हारे पास है।”

अमारा ने मेमोरी कार्ड निकालकर कहा, “मैंने निर्णय लिया है। तस्वीर प्रकाशित हो सकती है, लेकिन स्थान, वैज्ञानिक संकेत और आसपास की पहचान छिपाई जाएगी। लेख में स्थानीय समुदाय के संरक्षण अधिकारों का उल्लेख होगा।”

“और फोटोग्राफर का नाम?”

“देवांश मेहरा।”

“वनस्पति वैज्ञानिक का?”

“अमारा नदोंगो।”

“ठीक है। लेकिन एक शर्त है।”

“क्या?”

“तस्वीर से मिलने वाली आय का एक भाग इस क्षेत्र के पौधों और स्थानीय शिक्षा के संरक्षण में जाएगा।”

अमारा मुस्कराई। “अब तुम मेरी भाषा सीख रहे हो।”

“मैंने अच्छे शिक्षक को चुना है।”

कुछ पल बाद देवांश गंभीर हो गया।

“अभियान एक सप्ताह में समाप्त हो जाएगा।”

अमारा का हाथ रुक गया। “मुझे पता है।”

“मुझे भारत लौटना होगा। फिर एक परियोजना के लिए दक्षिण अमेरिका जाना था।”

“था?”

“मैंने उसे रद्द करने का निर्णय लिया है।”

अमारा ने तुरंत कहा, “मेरे लिए अपना काम मत छोड़ो।”

“मैं काम नहीं छोड़ रहा। उसकी दिशा बदल रहा हूं। मैं कुछ महीनों तक अंगोला में रहकर यहां की जैव विविधता पर काम करना चाहता हूं। तुम्हारे शोध केंद्र के लिए तस्वीरें और दस्तावेज तैयार कर सकता हूं।”

“और उसके बाद?”

“उसके बाद हम मिलकर निर्णय करेंगे। मैं ऐसा भविष्य नहीं बताऊंगा जिसे अभी निभाने की तैयारी नहीं। लेकिन मैं यह भी नहीं कहूंगा कि यह केवल एक सुंदर अभियान था।”

अमारा ने धीरे से उसका हाथ पकड़ा।

“यही उत्तर मुझे चाहिए था।”

तस्वीर जिसने स्थान नहीं बताया

तीन महीने बाद लुमिया फूल की तस्वीर एक अंतरराष्ट्रीय प्रकृति पत्रिका के मुखपृष्ठ पर प्रकाशित हुई। चित्र में काली चट्टान, हरी काई और धुंध के बीच चमकता नीला-सफेद फूल दिखाई दे रहा था। लेख का शीर्षक था—

“वह फूल जिसका स्थान दुनिया को जानने की आवश्यकता नहीं।”

लेख में फूल की दुर्लभता, स्थानीय ज्ञान के महत्व और प्राकृतिक संसाधनों पर समुदायों के अधिकार की चर्चा की गई थी। किसी नक्शे, स्थान या दिशा का उल्लेख नहीं था।

तस्वीर ने दुनिया भर का ध्यान आकर्षित किया। कई वैज्ञानिकों ने शोध में सहयोग की इच्छा जताई, लेकिन अमारा के केंद्र ने स्पष्ट नियम बनाए। स्थानीय समुदाय की अनुमति के बिना कोई नमूना नहीं लिया जा सकता था।

देवांश ने अपनी आय का बड़ा हिस्सा गांव में एक छोटे जैव विविधता अध्ययन केंद्र और बच्चों की पुस्तकालय बनाने में लगाया। वह बच्चों को कैमरा चलाना सिखाता और उनसे कहता, “तस्वीर लेने से पहले उस चीज की कहानी समझो।”

अमारा पौधों के नमूने तैयार करती और बच्चों को बताती कि जंगल केवल लकड़ी या औषधि का भंडार नहीं, एक जीवित संबंध है।

उनके बीच मतभेद अब भी होते थे।

देवांश कभी-कभी बिना बताए लंबी दूरी पर तस्वीर लेने चला जाता और अमारा नाराज होती। अमारा अपने काम में इतनी डूब जाती कि कई दिनों तक ठीक से भोजन नहीं करती और देवांश उसे डांटता।

लेकिन अब वे चुप होकर दूर नहीं भागते थे।

वे बात करते थे।

एक शाम दोनों कलंदुला जलप्रपात के सामने खड़े थे। सूर्य अस्त हो रहा था। गिरते जल पर सुनहरी रोशनी पड़ रही थी।

देवांश ने कैमरा उठाया और अमारा की ओर देखा।

“अनुमति है?”

अमारा ने पूछा, “तस्वीर में क्या दिखाई देगा?”

“एक वैज्ञानिक, जिसने एक फोटोग्राफर को सिखाया कि हर सुंदर चीज पर अधिकार नहीं जताया जाता।”

“और फोटोग्राफर?”

“वह कैमरे के पीछे रहेगा।”

अमारा उसके पास आई और कैमरा उसके हाथ से लेकर एक चट्टान पर रख दिया।

“आज दोनों कैमरे के सामने रहेंगे।”

उसने टाइमर लगाया। दोनों जलप्रपात की ओर पीठ करके नहीं, बल्कि उसकी ओर मुंह करके खड़े हुए। अमारा ने देवांश का हाथ पकड़ लिया।

कैमरे की रोशनी चमकी।

तस्वीर में उनके चेहरे स्पष्ट नहीं आए। जलप्रपात की धुंध ने उन्हें आधा ढक लिया था। लेकिन उनके जुड़े हुए हाथ साफ दिखाई दे रहे थे।

देवांश ने तस्वीर देखकर कहा, “यह तकनीकी रूप से पूरी तरह सही नहीं है।”

“फिर से लेते हैं?”

“नहीं।”

“क्यों?”

उसने अमारा का हाथ और मजबूती से पकड़ लिया।

“क्योंकि प्रेम भी तकनीकी रूप से पूर्ण नहीं होता। उसका सच्चा होना पर्याप्त है।”

अमारा ने अपना सिर उसके कंधे पर रख दिया।

नीचे जल हजारों वर्षों से चट्टानों पर गिर रहा था। उसकी गर्जना समय, दूरी और भय से बड़ी लग रही थी। धुंध के भीतर इंद्रधनुष बनते और मिटते जा रहे थे।

देवांश ने सोचा था कि कलंदुला की यात्रा उसे एक दुर्लभ फूल की तस्वीर देगी। लेकिन इस यात्रा ने उसे वह व्यक्ति दिया था जिसके सामने वह अपने भय छिपाना नहीं चाहता था।

अमारा ने सोचा था कि वह एक बाहरी फोटोग्राफर से अपने जंगल की रक्षा करेगी। लेकिन उसने पाया कि कुछ लोग प्रकृति की सुंदरता लेने नहीं, उसकी जिम्मेदारी बांटने भी आते हैं।

उन्होंने भविष्य के लिए बड़े वादे नहीं किए। उन्होंने केवल छोटे-छोटे निर्णय लिए—सच बोलने के, कठिन समय में रुकने के, एक-दूसरे के काम का सम्मान करने के और भय पैदा होने पर दूर जाने के बजाय बात करने के।

क्योंकि उन्हें समझ आ गया था कि प्रेम किसी दुर्लभ फूल की तरह अचानक दिखाई दे सकता है, लेकिन उसे जीवित रखने के लिए विश्वास की मिट्टी, धैर्य की नमी और ईमानदारी की रोशनी चाहिए।

एक वर्ष बाद उसी घाटी में लुमिया फिर खिला।

इस बार देवांश ने उसकी तस्वीर नहीं ली।

वह और अमारा चट्टान पर बैठकर उसे देखते रहे। सुबह की पहली किरण फूल की पारदर्शी पंखुड़ियों पर पड़ी तो वह जलती हुई छोटी रोशनी जैसा दिखाई दिया।

अमारा ने पूछा, “आज कैमरा क्यों नहीं लाए?”

देवांश ने उसके हाथ पर अपना हाथ रख दिया।

“क्योंकि पहली बार मुझे इसे दुनिया को दिखाना था।”

“और आज?”

“आज मुझे केवल तुम्हारे साथ इसे देखना था।”

अमारा मुस्कराई।

दूर कलंदुला जलप्रपात गर्जना कर रहा था। धुंध हवा में उठ रही थी और जंगल एक नई सुबह के साथ जाग रहा था।

लुमिया फूल कुछ घंटों बाद अपनी पंखुड़ियां बंद कर लेता, लेकिन उसके पास जन्मी प्रेम कहानी अब किसी मौसम की मोहताज नहीं थी।

वह प्रेम संयोग से शुरू हुआ हो सकता था, पर विश्वास ने उसे जड़ें दी थीं।

और कलंदुला की विशाल जलधाराओं के नीचे, जहां पानी चट्टानों को बदल देता है और कठिन दरारों में फूल खिल उठते हैं, दो सावधान दिलों ने आखिरकार यह स्वीकार कर लिया था कि सच्चा प्रेम मिल जाना सबसे बड़ा चमत्कार नहीं है।

सबसे बड़ा चमत्कार है—किसी के मिलने के बाद भी हर दिन उसे चुनना।

कहानी में कलंदुला फॉल्स की रोमांटिक यात्रा के साथ पर्यावरण संरक्षण, स्थानीय समुदाय के अधिकार और रिश्तों में विश्वास का संदेश शामिल किया गया है।

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