मंगेतर की आवाज में आया फिरौती का फोन
सगाई के बाद की उनकी आखिरी मुलाकात थी।
तीन दिन बाद शादी होने वाली थी और ईशानी वर्मा अपने मंगेतर सार्थक मल्होत्रा के साथ दिल्ली के एक शांत रेस्तरां में बैठी विवाह की बाकी तैयारियों पर चर्चा कर रही थी।
मेज पर फूलों की सूची, मेहमानों के नाम और हनीमून की टिकटें खुली पड़ी थीं। सार्थक अपनी कॉफी में चीनी मिलाते हुए विवाह के बाद नए घर की सजावट पर बहस कर रहा था।
“मैं बेडरूम में गहरे रंग की दीवार नहीं चाहता,” उसने कहा।
ईशानी मुस्कराई। “तुम्हें कब से दीवारों के रंग की चिंता होने लगी?”
“जब से पता चला कि मुझे पूरी जिंदगी उसी कमरे में रहना है।”
“मेरे साथ या दीवारों के साथ?”
सार्थक ने उसका हाथ पकड़ लिया।
“दीवारें बदल सकती हैं। तुम नहीं।”
ईशानी के चेहरे पर मुस्कान फैल गई। पिछले तीन वर्षों में यही सार्थक का सबसे प्यारा गुण था। वह साधारण बात को भी इस तरह कहता कि वह प्रेम का वचन लगने लगती।
तभी ईशानी का मोबाइल बज उठा।
स्क्रीन पर कोई नंबर नहीं था। केवल लिखा था—
अज्ञात कॉल।
उसने कॉल उठाई।
“हैलो?”
कुछ क्षण केवल तेज सांसों की आवाज सुनाई दी।
फिर दूसरी ओर से एक पुरुष बोला—
“ईशानी, घबराना मत। मेरी बात ध्यान से सुनो।”
ईशानी का चेहरा सफेद पड़ गया।
वह आवाज सार्थक की थी।
बिल्कुल वही गहराई, वही हल्का कंपन और हर वाक्य के बाद सांस रोकने की वही आदत।
ईशानी ने सामने देखा।
सार्थक उसके ठीक सामने बैठा था।
उसके हाथ में कॉफी का कप था।
फोन से आवाज फिर आई—
“मैं सार्थक हूं। मुझे अगवा कर लिया गया है।”
ईशानी के होंठों से मुश्किल से शब्द निकले।
“तो मेरे सामने कौन बैठा है?”
फोन पर कुछ क्षण खामोशी रही।
फिर आवाज बोली—
“वह मैं नहीं हूं।”
ईशानी ने कुर्सी के हत्थे को कसकर पकड़ लिया।
सामने बैठे सार्थक ने पूछा, “किसका फोन है?”
ईशानी ने उत्तर नहीं दिया।
फोन वाला व्यक्ति तेजी से बोला—
“उसे मत बताना कि मैंने फोन किया है। मेरी जान खतरे में है। पचास लाख रुपये लेकर कल रात पुराने मल्होत्रा कपड़ा कारखाने पहुंचना। पुलिस को बताया तो मैं जिंदा नहीं बचूंगा।”
ईशानी की आंखें सामने बैठे व्यक्ति से हट नहीं रही थीं।
“मैं कैसे मान लूं कि तुम सार्थक हो?”
दूसरी ओर से धीमी आवाज आई—
“पिछले वर्ष शिमला में तुमने मुझसे पूछा था कि अगर हमारी शादी न हुई तो मैं क्या करूंगा। मैंने कहा था कि तुम्हारे घर के सामने चाय की दुकान खोल लूंगा, ताकि हर सुबह तुम्हें देख सकूं।”
ईशानी की सांस रुक गई।
यह बात केवल वह और सार्थक जानते थे।
फोन वाला व्यक्ति आगे बोला—
“और तुम मुझे अकेले में ‘सत्तू’ कहती हो। यह नाम मैंने तुम्हें किसी को बताने से मना किया था।”
ईशानी की आंखों में भय उतर आया।
सामने बैठा सार्थक अब उसे संदेह से देख रहा था।
फोन से अंतिम वाक्य सुनाई दिया—
“उसके दाहिने हाथ को देखना। असली सार्थक बचपन से हर काम दाएं हाथ से करता है।”
कॉल कट गया।
ईशानी ने धीरे से सामने देखा।
सार्थक अपने बाएं हाथ से कॉफी का कप उठा रहा था।
बदल गया था सार्थक
“क्या हुआ?” उसने पूछा।
ईशानी ने तुरंत मोबाइल मेज के नीचे कर लिया।
“गलत नंबर था।”
“गलत नंबर पर तुम्हारा चेहरा ऐसा क्यों हो गया?”
“किसी ने दुर्घटना की खबर सुना दी थी। बाद में पता चला वह किसी और के बारे में बात कर रहा था।”
सार्थक ने उसकी आंखों में देखते हुए पूछा, “तुम मुझसे कुछ छिपा रही हो?”
ईशानी ने उसके बाएं हाथ की ओर देखा।
उसे अचानक पिछले दस दिनों की कई छोटी घटनाएं याद आने लगीं।
सार्थक ने हमेशा कॉफी में दो चम्मच चीनी डाली थी। आज उसने बिना चीनी की कॉफी मंगाई थी।
उसे मूंगफली से गंभीर एलर्जी थी, लेकिन दो दिन पहले उसने घर की पार्टी में मूंगफली वाली मिठाई खा ली थी। जब ईशानी ने घबराकर उसे रोका, तो उसने कहा था कि अब उसकी एलर्जी खत्म हो चुकी है।
सार्थक उसे हमेशा “ईशु” कहता था। पिछले एक सप्ताह से वह पूरा नाम लेकर बुला रहा था।
एक शाम वह कार की चाबी बाएं हाथ से घुमाने की कोशिश कर रहा था। ईशानी ने मजाक में पूछा भी था कि वह अचानक बाएं हाथ वाला कैसे हो गया। उसने थकान का बहाना बना दिया था।
क्या सामने बैठा व्यक्ति सच में सार्थक नहीं था?
लेकिन वह उसका चेहरा, चाल, मुस्कान और आवाज सब पहचानती थी। उसके गाल के पास वही छोटा तिल था। दाहिनी भौं के ऊपर बचपन की चोट का वही हल्का निशान था।
“हमें चलना चाहिए,” ईशानी ने कहा।
सार्थक ने बिल मंगाया।
रेस्तरां से बाहर निकलते समय उसने ईशानी का हाथ पकड़ना चाहा, लेकिन वह कुछ दूरी पर हट गई।
“तुम ठीक हो?” उसने पूछा।
“थोड़ी घबराहट है।”
“शादी से?”
“शायद।”
सार्थक उसके पास झुककर बोला, “भागने का विचार हो तो अभी बता दो। बारात के सामने सुनूंगा तो मेरी इज्जत चली जाएगी।”
सामान्य दिनों में ईशानी हंस पड़ती।
लेकिन आज उसे उसकी मुस्कान में अपनापन नहीं, चेतावनी दिखाई दी।
पहली जांच
घर पहुंचते ही ईशानी ने दरवाजा बंद किया और अपनी सबसे करीबी मित्र समीरा को फोन किया। समीरा साइबर अपराध विभाग में निरीक्षक थी।
उसने पूरी घटना सुनाई।
समीरा ने पूछा, “जिस नंबर से कॉल आया, वह दिखाई नहीं दिया?”
“नहीं।”
“आवाज रिकॉर्ड की?”
“कॉल अचानक आया। मैं कुछ नहीं कर पाई।”
“आवाज की नकल संभव है। आजकल कुछ मिनट की रिकॉर्डिंग से किसी की आवाज बनाई जा सकती है।”
“लेकिन उसे हमारी निजी बातें पता थीं।”
“सार्थक का फोन हैक हो सकता है। संदेश, तस्वीरें और रिकॉर्डिंग किसी के पास पहुंच सकती हैं।”
ईशानी ने कहा, “सामने बैठा सार्थक भी पिछले कुछ दिनों से अलग व्यवहार कर रहा है।”
समीरा कुछ क्षण चुप रही।
“क्या सार्थक का कोई जुड़वां भाई है?”
“नहीं। उसने कभी नहीं बताया।”
“कभी-कभी परिवार ऐसी बातें छिपाते हैं। पहले उसके घर जाओ। बचपन की तस्वीरें देखो। किसी को कॉल के बारे में मत बताना।”
“और फिरौती?”
“पैसे तैयार करने का अभिनय करो। कॉल दोबारा आए तो समय बढ़ाने की कोशिश करना।”
ईशानी ने उसी रात सार्थक की मां सविता मल्होत्रा को फोन किया।
“मां, क्या मैं आपसे मिलने आ सकती हूं?”
सविता ने हंसते हुए कहा, “तीन दिन बाद तुम यहीं रहने आ रही हो। अब भी अनुमति मांगोगी?”
मल्होत्रा परिवार का घर दक्षिण दिल्ली में था। ईशानी वहां पहुंची तो सविता विवाह के गहने व्यवस्थित कर रही थीं।
ईशानी ने सामान्य स्वर में पूछा, “मैं सार्थक के बचपन की तस्वीरें देखना चाहती हूं। शादी में एक वीडियो बनाना है।”
सविता अचानक रुक गईं।
“पुरानी तस्वीरों की क्या जरूरत है?”
“बचपन से अब तक की यात्रा दिखानी है।”
“बहुत-सी तस्वीरें खो गई थीं।”
“कैसे?”
“बीस साल पहले हमारे पुराने कारखाने में आग लग गई थी। कुछ सामान वहां के कार्यालय में रखा था।”
ईशानी ने ध्यान से पूछा, “क्या सार्थक उस दिन कारखाने में था?”
सविता के हाथ से गहनों का डिब्बा गिर गया।
“तुम यह क्यों पूछ रही हो?”
“सार्थक ने कभी आग का जिक्र नहीं किया।”
सविता ने नजरें फेर लीं।
“वह बहुत छोटा था। उसे कुछ याद नहीं।”
ईशानी कमरे की दीवार पर लगी पारिवारिक तस्वीरों को देखने लगी। अधिकांश तस्वीरों में सार्थक दस वर्ष की उम्र के बाद दिखाई देता था। उससे पहले की केवल दो तस्वीरें थीं।
एक तस्वीर में सविता दो बच्चों के बीच बैठी थीं।
दोनों लड़कों के चेहरे एक जैसे थे।
तस्वीर का एक हिस्सा फाड़ा गया था, लेकिन दूसरे बच्चे का आधा चेहरा अब भी दिखाई दे रहा था।
ईशानी ने तस्वीर उठा ली।
“यह दूसरा बच्चा कौन है?”
सविता ने तेजी से उसके हाथ से तस्वीर छीन ली।
“सार्थक का चचेरा भाई।”
“नाम क्या था?”
“मुझे याद नहीं।”
“आप अपने इतने करीबी रिश्तेदार का नाम भूल गईं?”
सविता की आंखों में भय उतर आया।
“ईशानी, शादी से पहले पुराने दुखों को मत जगाओ।”
“क्या सार्थक का कोई जुड़वां भाई था?”
सविता का चेहरा पीला पड़ गया।
उन्होंने कमरे का दरवाजा बंद कर दिया।
“तुमसे यह किसने कहा?”
ईशानी ने उत्तर नहीं दिया।
सविता कुर्सी पर बैठ गईं। उनकी आंखों से आंसू बहने लगे।
“उसका नाम समर था।”
वह बेटा जो आग में मर गया
सविता ने बताया कि सार्थक और समर जुड़वां भाई थे। बचपन में उन्हें देखकर परिवार के लोग भी भ्रमित हो जाते थे।
सार्थक शांत और डरपोक था। समर निडर, जिद्दी और तेज स्वभाव का।
बीस वर्ष पहले मल्होत्रा परिवार का एक बड़ा कपड़ा कारखाना शहर के बाहर था। बच्चों के पिता धीरज मल्होत्रा अक्सर दोनों बेटों को वहां लेकर जाते थे।
एक रात कारखाने में भयंकर आग लगी।
पांच मजदूर मारे गए। समर भी लापता हो गया। पुलिस को जला हुआ एक छोटा शव मिला, जिसे परिवार ने समर का मान लिया।
“क्या डीएनए जांच नहीं हुई?” ईशानी ने पूछा।
“उस समय शव की हालत बहुत खराब थी। धीरज ने कहा कि कपड़ों और लॉकेट से पहचान हो गई है।”
“क्या आपने स्वयं देखा था?”
सविता रोने लगीं।
“मुझे शव देखने नहीं दिया गया। उन्होंने कहा कि मैं सह नहीं पाऊंगी।”
“समर की मृत्यु के बाद परिवार ने उसका नाम लेना क्यों बंद कर दिया?”
सविता ने धीमे स्वर में कहा, “सार्थक को बहुत बुरे दौरे पड़ते थे। वह कहता था कि समर जिंदा है और उसे बुला रहा है। डॉक्टर ने हमें सारी तस्वीरें हटाने की सलाह दी।”
“क्या यह डॉक्टर की सलाह थी या धीरज जी का निर्णय?”
सविता ने कोई उत्तर नहीं दिया।
ईशानी समझ गई कि परिवार में कुछ और भी छिपा था।
तभी मुख्य दरवाजा खुलने की आवाज आई।
सार्थक घर आ गया था।
ईशानी ने जल्दी से तस्वीर अपने बैग में रख ली।
सार्थक कमरे में आया और उसे देखकर मुस्कराया।
“तुम यहां हो और मुझे बताया भी नहीं?”
ईशानी ने उसके चेहरे को ध्यान से देखा। अब उसे पहली बार सार्थक के भीतर किसी दूसरे व्यक्ति की संभावना दिखाई दे रही थी।
उसने पूछा, “समर कौन था?”
सार्थक की मुस्कान गायब हो गई।
सविता ने घबराकर कहा, “मैंने इसे बता दिया।”
कुछ क्षण तक सार्थक बिल्कुल स्थिर खड़ा रहा।
फिर उसने कहा, “मेरा भाई था। बचपन में मर गया।”
“तुमने मुझे कभी क्यों नहीं बताया?”
“हर व्यक्ति के जीवन में कुछ दुख ऐसे होते हैं, जिन्हें वह बार-बार नहीं जीना चाहता।”
“क्या तुम उसकी तरह दिखते थे?”
“हम जुड़वां थे।”
“क्या तुम उसकी तरह बाएं हाथ से काम कर सकते हो?”
सार्थक ने उसकी ओर तीखी नजर से देखा।
“इस प्रश्न का क्या अर्थ है?”
ईशानी ने कहा, “बस जानना चाहती थी।”
सार्थक उसके पास आया।
“तुम आज अजीब व्यवहार कर रही हो।”
उसने ईशानी के कंधे पर हाथ रखा। उसका स्पर्श मजबूत था।
“किसी ने तुम्हें मेरे बारे में कुछ बताया है?”
ईशानी ने स्वयं को संभाला।
“नहीं।”
सार्थक कुछ देर उसे देखता रहा, जैसे उसके चेहरे से सच पढ़ने की कोशिश कर रहा हो।
फिर धीरे से बोला, “पुराने कारखाने से दूर रहना।”
“क्यों?”
“वह स्थान सुरक्षित नहीं है।”
“इमारत के कारण या उसके भीतर छिपे रहस्य के कारण?”
सार्थक का चेहरा कठोर हो गया।
“शादी से पहले हर रहस्य जानना आवश्यक नहीं होता।”
यह वाक्य सार्थक कभी नहीं कह सकता था।
उसने हमेशा ईशानी से कहा था कि विवाह का अर्थ बिना भय सच बोलना है।
ईशानी को विश्वास होने लगा कि सामने खड़ा व्यक्ति उसका मंगेतर नहीं था।
दूसरी फिरौती कॉल
रात के ठीक ग्यारह बजे फिर फोन आया।
इस बार ईशानी ने रिकॉर्डिंग चालू कर दी।
“पैसे तैयार हैं?” वही आवाज बोली।
“पहले मुझे प्रमाण चाहिए कि तुम जीवित हो।”
“वीडियो कॉल नहीं कर सकता।”
“क्यों?”
“उन्होंने मेरी आंखों पर पट्टी बांधी है।”
“तुम्हें कब अगवा किया गया?”
“दस दिन पहले।”
ईशानी का दिल तेज धड़कने लगा। उसी समय से सामने वाले सार्थक का व्यवहार बदला था।
“तुम्हें किसने अगवा किया?”
फोन पर कुछ देर चुप्पी रही।
“समर ने।”
ईशानी ने पूछा, “तुम्हारा भाई तो मर चुका है।”
“वह नहीं मरा था। वह वापस आ गया है।”
“उसे क्या चाहिए?”
“पैसा नहीं। पचास लाख रुपये केवल बहाना हैं। वह मेरे पिता को पुराने कारखाने तक बुलाना चाहता है।”
“क्यों?”
“क्योंकि बीस वर्ष पहले लगी आग दुर्घटना नहीं थी।”
ईशानी ने गहरी सांस ली।
“असली बात बताओ।”
“पिता ने कारखाने में जहरीले रसायन अवैध रूप से जमा किए थे। मजदूर नेता गिरधारी लाल ने इसका विरोध किया। वह पुलिस और मीडिया के पास जाने वाला था।”
“फिर क्या हुआ?”
“पिता और मेरे चाचा ने उसे कार्यालय में बुलाया। वहां झगड़ा हुआ। गिरधारी लाल की हत्या कर दी गई। प्रमाण मिटाने के लिए आग लगाई गई।”
“समर ने यह सब देखा था?”
“हां। हम दोनों वहीं थे। समर ने छिपकर सब देख लिया था।”
“और तुम?”
“मैं डरकर बाहर भाग गया। समर भीतर रह गया।”
ईशानी की आवाज कांपने लगी।
“क्या तुम्हारे पिता ने जानबूझकर उसे मरने दिया?”
फोन पर भारी सांस सुनाई दी।
“शायद उन्होंने सोचा कि आग के साथ गवाह भी खत्म हो जाएगा।”
“लेकिन वह बच गया।”
“एक मजदूर उसे पीछे के रास्ते से बाहर ले गया। पिता ने सभी को बताया कि समर मर चुका है। बचाने वाला मजदूर उसे शहर से दूर ले गया।”
“तुम्हें यह सब कब पता चला?”
“जब समर दस दिन पहले मेरे सामने आया।”
“उसने तुम्हें कहां रखा है?”
“पुराने कारखाने के तहखाने में। ईशानी, जो व्यक्ति तुम्हारे आसपास है, वह खतरनाक है। उस पर भरोसा मत करना।”
“अगर वह खतरनाक है तो उसने मुझे नुकसान क्यों नहीं पहुंचाया?”
फोन पर कुछ क्षण चुप्पी रही।
“क्योंकि उसे तुम्हारी जरूरत है।”
“किसलिए?”
“तुम मेरे पिता को कारखाने तक ला सकती हो।”
तभी फोन पर धातु गिरने की आवाज आई।
सार्थक ने घबराकर कहा, “वह आ गया। कल रात ग्यारह बजे पैसे लेकर आना। अकेली मत आना, लेकिन उसे पता भी मत चलने देना कि पुलिस साथ है।”
कॉल कट गया।
ईशानी ने रिकॉर्डिंग समीरा को भेज दी।
कुछ मिनट बाद समीरा का उत्तर आया—
“आवाज का प्रारंभिक विश्लेषण बता रहा है कि यह कृत्रिम रूप से बनाई गई रिकॉर्डिंग नहीं है। आवाज वास्तविक है।”
“लेकिन दोनों भाइयों की आवाज एक जैसी हो सकती है।”
“हां। केवल आवाज से पहचान संभव नहीं।”
ईशानी ने पूछा, “अब क्या करूं?”
“कल से पहले हमें पता लगाना होगा कि फोन किस उपकरण से आ रहा है। अगली कॉल लंबी रखना।”
ईशानी के सामने सबसे बड़ा प्रश्न अब भी था—
फोन पर बोलने वाला असली सार्थक था या सामने बैठा व्यक्ति?
वह प्रश्न जिसका उत्तर केवल सार्थक जानता था
अगले दिन ईशानी ने सामने वाले व्यक्ति को अपने घर बुलाया।
“मैं शादी से पहले तुम्हारे साथ कुछ समय अकेले बिताना चाहती हूं,” उसने कहा।
वह आया तो ईशानी ने सामान्य व्यवहार किया। उसने चाय बनाई और पुराना फोटो एल्बम खोलकर बैठ गई।
“हम एक खेल खेलते हैं,” उसने कहा। “मैं हमारे रिश्ते से जुड़े प्रश्न पूछूंगी।”
सार्थक मुस्कराया।
“तुम अभी से पति की परीक्षा लेने लगी?”
“डर लग रहा है?”
“नहीं।”
ईशानी ने पहला प्रश्न पूछा, “हम पहली बार किस दिन मिले थे?”
उसने तुरंत सही तारीख बता दी।
“मैंने उस दिन कौन-सा रंग पहना था?”
“पीली कुर्ती।”
सही उत्तर।
“तुमने मुझे पहली बार कहां चूमा था?”
“तुम्हारी कार में, इंडिया गेट की पार्किंग के पास।”
सही।
“उस दिन बारिश हो रही थी?”
“हां।”
ईशानी ने उसकी आंखों में देखा।
बारिश नहीं हो रही थी।
यह ऐसा झूठ था, जिसे तस्वीरें देखकर कोई नहीं पहचान सकता था। उस दिन उन्होंने बाद में मजाक किया था कि मौसम इतना साफ था कि उनके पास रोमांटिक बारिश का बहाना भी नहीं था।
ईशानी ने कुछ नहीं कहा।
अगला प्रश्न पूछा, “मेरे दाएं कंधे पर चोट का निशान कैसे बना?”
वह रुका।
“स्कूल में सीढ़ियों से गिरने के कारण।”
गलत।
वह निशान बचपन में गर्म दूध गिरने से बना था। इसकी बात उन्होंने केवल एक बार निजी बातचीत में की थी। शायद सार्थक के संदेशों में इसका उल्लेख नहीं था।
सामने बैठा व्यक्ति उसकी परीक्षा समझ गया।
“तुम क्या साबित करना चाहती हो?”
ईशानी ने पूछा, “तुम सार्थक हो?”
वह हंसा, लेकिन हंसी में तनाव था।
“शादी से दो दिन पहले यह कैसा प्रश्न है?”
“जवाब दो।”
उसका चेहरा धीरे-धीरे कठोर हो गया।
“तुम्हें किसका फोन आया था?”
ईशानी पीछे हट गई।
वह अपनी जगह से उठा।
“उसने तुम्हें क्या बताया?”
“तुम्हारा नाम समर है।”
कुछ क्षण कमरे में पूर्ण सन्नाटा रहा।
फिर उस व्यक्ति ने आंखें बंद कर लीं।
जब उसने दोबारा देखा, उसके चेहरे पर सार्थक वाली मुलायम मुस्कान नहीं थी।
“मैं तुम्हें नुकसान नहीं पहुंचाना चाहता था।”
ईशानी की आंखों में भय और क्रोध भर गया।
“मेरा मंगेतर कहां है?”
“सुरक्षित है।”
“तुमने उसका अपहरण किया।”
“मुझे उसके परिवार तक पहुंचने का दूसरा रास्ता नहीं मिला।”
“तुम दस दिन से उसके रूप में मेरे सामने रह रहे हो।”
“केवल परिवार की तिजोरी और पुराने दस्तावेजों तक पहुंचने के लिए।”
“तुमने मुझे छुआ। मेरे साथ शादी की योजनाएं बनाईं। मेरे परिवार के सामने सार्थक बनकर बैठे।”
समर ने नजरें झुका लीं।
“मैंने सीमा पार की। मैं जानता हूं।”
ईशानी ने थप्पड़ मारने के लिए हाथ उठाया, लेकिन रोक लिया।
“तुम्हें अपने भाई और अपने पिता से बदला लेना था। मुझे क्यों शामिल किया?”
“तुम्हारे बिना मैं धीरज मल्होत्रा को कारखाने तक नहीं ला सकता था।”
“तो फिरौती का फोन किसने किया?”
समर की आंखों में पहली बार भ्रम दिखाई दिया।
“कौन-सा फिरौती का फोन?”
ईशानी स्थिर रह गई।
“सार्थक ने फोन किया। उसने कहा तुमने उसे कारखाने में कैद किया है।”
समर ने तुरंत कहा, “मैंने उसे एक पुराने फार्महाउस में रखा है। कारखाने में नहीं।”
“क्या?”
“उसके पास फोन भी नहीं है।”
ईशानी का शरीर ठंडा पड़ गया।
अगर सामने वाला समर था और सार्थक के पास फोन नहीं था, तो मंगेतर की आवाज में फिरौती कॉल कौन कर रहा था?
समर ने कहा, “मुझे रिकॉर्डिंग सुनाओ।”
ईशानी ने फोन निकाला, लेकिन उसी क्षण खिड़की का शीशा टूट गया।
एक गोली समर के कंधे को छूती हुई दीवार में जा लगी।
समर ने ईशानी को नीचे खींच लिया।
दूसरी गोली चली।
“पीछे के दरवाजे से निकलो!” समर चिल्लाया।
दोनों रसोई के रास्ते बाहर निकले। गली में एक काली कार तेजी से दूर जाती दिखाई दी।
समर ने घायल कंधे को दबाते हुए कहा, “वह हमें दोनों को मारना चाहता है।”
“कौन?”
समर ने उत्तर दिया—
“शायद वही व्यक्ति, जिसने बीस वर्ष पहले आग लगाई थी।”
असली फिरौती मांगने वाला
समीरा की टीम ने कॉल रिकॉर्डिंग और टावर डेटा की जांच की। फोन पुराने कारखाने के आसपास से किया गया था।
लेकिन कॉल करने वाला सार्थक नहीं हो सकता था, क्योंकि समर ने पुलिस के सामने फार्महाउस का स्थान बता दिया। वहां छापा मारा गया और सार्थक जीवित मिला।
उसे हल्की चोटें थीं, लेकिन वह सुरक्षित था।
ईशानी जब अस्पताल पहुंची तो सार्थक ने उसे गले लगाने की कोशिश की। वह कुछ क्षण स्थिर रही, फिर रोते हुए उससे लिपट गई।
“तुम ठीक हो?”
“अब हूं।”
ईशानी पीछे हटी और उसे ध्यान से देखा। वह दाएं हाथ से पानी का गिलास पकड़ रहा था। उसने उसे “ईशु” कहा। उसकी आंखों में वही परिचित गर्माहट थी।
फिर भी पिछले दिनों के अनुभव ने ईशानी के विश्वास को चोट पहुंचाई थी। अब वह केवल चेहरे और आवाज के आधार पर किसी को अपना नहीं मान पा रही थी।
सार्थक ने उसकी बेचैनी समझ ली।
“तुम चाहो तो कोई प्रश्न पूछ सकती हो।”
ईशानी ने धीमे स्वर में कहा, “पहली बार मैंने तुम्हें चूमा था या तुमने मुझे?”
सार्थक मुस्कराया।
“तुमने किया था। फिर अगले छह महीनों तक दावा करती रहीं कि मैं आगे आया था।”
ईशानी की आंखों से फिर आंसू बह निकले।
“तुम ही हो।”
सार्थक ने पूछा, “समर कहां है?”
“पुलिस हिरासत में है। उसने तुम्हारे अपहरण की बात स्वीकार कर ली।”
“उसने मुझे चोट नहीं पहुंचाई। केवल बांधकर रखा और भोजन देता रहा।”
“वह मेरे सामने तुम्हारा रूप बनकर रहा।”
सार्थक का चेहरा बदल गया।
“उसने तुम्हारे साथ…”
“नहीं। उसने कोई शारीरिक सीमा पार नहीं की, लेकिन उसने हमारे विश्वास का उपयोग किया।”
कुछ देर बाद समीरा कमरे में आई।
“हमने फिरौती कॉल करने वाले की पहचान का एक हिस्सा खोज लिया है।”
उसने रिकॉर्डिंग चलाई।
“आवाज सार्थक की थी, लेकिन कॉल उसी समय किया गया, जब सार्थक फार्महाउस में बेहोश था।”
“तो आवाज की नकल हुई?” ईशानी ने पूछा।
“पूरी तरह कृत्रिम नहीं। यह वर्षों पुरानी वास्तविक रिकॉर्डिंग के टुकड़ों से बनाई गई थी।”
सार्थक ने कहा, “किसके पास मेरी इतनी रिकॉर्डिंग हो सकती है?”
समीरा ने एक नाम लिया—
“तुम्हारे पिता धीरज मल्होत्रा के छोटे भाई, विनोद मल्होत्रा।”
सार्थक चौंक गया।
“चाचा?”
समीरा ने बताया कि विनोद ही कारखाने का दैनिक संचालन देखते थे। आग वाली रात अवैध रसायन उन्हीं के निर्देश पर लाए गए थे।
धीरज ने मजदूर नेता गिरधारी लाल के साथ बहस की थी, लेकिन हत्या संभवतः विनोद ने की थी। आग भी उसी ने लगाई थी।
वर्षों से धीरज और विनोद एक-दूसरे के अपराध छिपाते रहे।
अब समर के लौटने से विनोद डर गया था। वह चाहता था कि दोनों जुड़वां भाई और धीरज पुराने कारखाने में इकट्ठे हों, ताकि वह एक और आग में सभी प्रमाण और गवाह समाप्त कर सके।
“फिरौती कॉल उसी जाल का हिस्सा था,” समीरा बोली। “वह ईशानी को पैसे के साथ वहां बुलाना चाहता था। उसे पता था कि समर भी पीछे आएगा।”
ईशानी ने पूछा, “उसे हमारी निजी बातें कैसे पता चलीं?”
“विनोद ने सार्थक के घर और कार में वर्षों से निगरानी उपकरण लगा रखे थे। उसे डर था कि सार्थक को बचपन की कोई स्मृति लौट सकती है।”
सार्थक ने सिर पकड़ लिया।
“चाचा हमारे परिवार के हर निजी क्षण को रिकॉर्ड करते रहे?”
“केवल परिवार को नहीं,” समीरा ने कहा, “वह धीरज मल्होत्रा को भी नियंत्रित करता रहा।”
पिता की स्वीकारोक्ति
धीरज मल्होत्रा को पुलिस ने पूछताछ के लिए बुलाया। शुरुआत में उन्होंने सब आरोपों से इनकार किया।
लेकिन जब समर को उनके सामने लाया गया, उनका चेहरा बदल गया।
समर ने कहा, “आपने मुझे मरने के लिए छोड़ दिया था।”
धीरज की आंखों में आंसू आ गए।
“मैंने सोचा था तुम आग में…”
“आपने मुझे खोजने की कोशिश नहीं की।”
“विनोद ने कहा था कि शव मिल गया।”
“वह शव किसी मजदूर के बच्चे का था। आपने डीएनए जांच क्यों नहीं कराई?”
धीरज चुप रहे।
समर ने मेज पर एक पुरानी धातु की सीटी रखी।
“यह आपने हमें कारखाने में खेलने के लिए दी थी। आग वाली रात यह मेरे पास थी।”
धीरज ने सीटी पहचान ली।
उनके भीतर वर्षों से दबा अपराधबोध टूट गया।
उन्होंने स्वीकार किया कि गिरधारी लाल ने अवैध रसायनों और मजदूरों की सुरक्षा पर प्रश्न उठाए थे। विनोद ने गुस्से में उसे लोहे की छड़ से मार दिया।
धीरज ने पुलिस बुलाने के बजाय भाई और कंपनी की प्रतिष्ठा बचाने का निर्णय लिया। दोनों ने कार्यालय में आग लगाई।
उन्हें पता नहीं था कि बच्चे भीतर हैं।
सार्थक बाहर भाग आया, लेकिन समर धुएं में फंस गया। विनोद ने धीरज को विश्वास दिलाया कि समर मर चुका है और जांच बढ़ने पर पूरा परिवार जेल जाएगा।
“मैंने अपने बेटे की जगह अपना नाम बचाया,” धीरज रोते हुए बोले। “यह मेरी सबसे बड़ी सजा है।”
समर ने कठोर स्वर में कहा, “आपको सजा अभी मिली कहां है?”
उसी समय पुलिस को सूचना मिली कि विनोद अपने घर से भाग चुका है।
कुछ देर बाद ईशानी के मोबाइल पर वीडियो संदेश आया।
स्क्रीन पर पुराने कारखाने का अंदरूनी हिस्सा दिखाई दे रहा था। बीच में सविता मल्होत्रा कुर्सी से बंधी थीं।
विनोद की आवाज सुनाई दी—
“धीरज, अपने दोनों बेटों और उस लड़की के साथ रात बारह बजे कारखाने पहुंचो। पुलिस आई तो सविता जलकर मर जाएगी।”
दो भाइयों की पहचान
पुलिस ने कारखाने के चारों ओर घेरा बनाने की योजना तैयार की। लेकिन विनोद ने पूरे क्षेत्र में निगरानी कैमरे लगा रखे थे।
समर ने कहा, “वह पुलिस को देखते ही आग लगा देगा।”
सार्थक उसकी ओर देखकर बोला, “तुम्हें कारखाने के गुप्त रास्ते याद हैं?”
“कुछ।”
दोनों भाइयों ने पहली बार बिना क्रोध एक-दूसरे की ओर देखा।
चेहरे एक जैसे थे, लेकिन जीवन ने उन्हें अलग बना दिया था। सार्थक की आंखों में स्थिरता थी। समर की आंखों में वर्षों का क्रोध।
सार्थक ने कहा, “तुमने मेरा अपहरण किया। मेरी जिंदगी में प्रवेश किया और ईशानी को धोखा दिया।”
“मैं जानता हूं।”
“मैं तुम्हें माफ नहीं करता।”
समर ने सिर झुका लिया।
“लेकिन आज मां को बचाने के लिए मुझे तुम्हारी सहायता चाहिए।”
समर ने उसकी ओर हाथ बढ़ाया।
“इसके बाद मैं भागूंगा नहीं।”
दोनों भाइयों ने हाथ मिला लिया।
ईशानी ने भी जाने का निर्णय लिया।
सार्थक ने कहा, “यह बहुत खतरनाक है।”
“फिरौती का फोन मुझे आया था। विनोद को लगता है कि मैं उसके जाल में फंस चुकी हूं। मैं नहीं गई तो उसे शक होगा।”
“मैं तुम्हें जोखिम में नहीं डाल सकता।”
ईशानी ने कहा, “पिछले दस दिनों से हर पुरुष मेरे लिए निर्णय ले रहा है—समर ने तय किया कि मुझे सच जानने की जरूरत नहीं, विनोद ने तय किया कि मुझे जाल की तरह उपयोग करेगा और तुम तय कर रहे हो कि मुझे कहां जाना चाहिए। अब मैं स्वयं निर्णय लूंगी।”
सार्थक चुप हो गया।
“ठीक है,” उसने कहा, “लेकिन हम साथ रहेंगे।”
ईशानी ने उसकी आंखों में देखते हुए कहा, “इस बार सच में।”
आधी रात का कारखाना
पुराना मल्होत्रा कपड़ा कारखाना शहर से दूर सुनसान औद्योगिक क्षेत्र में था। उसकी टूटी चिमनियां अंधेरे आकाश में काली परछाइयों जैसी दिखाई दे रही थीं।
रात बारह बजे धीरज, सार्थक और ईशानी मुख्य द्वार से भीतर गए।
समर पीछे के गुप्त रास्ते से प्रवेश कर चुका था।
कारखाने के मुख्य हॉल में पेट्रोल और रसायनों के ड्रम रखे थे। जमीन पर पतले तारों का जाल फैला था।
बीच में सविता कुर्सी से बंधी थीं।
विनोद ऊपरी लोहे के पुल पर खड़ा था। उसके हाथ में बंदूक और एक रिमोट था।
“दोनों बेटे कहां हैं?” उसने पूछा।
धीरज ने कहा, “समर नहीं आया।”
विनोद हंसा।
“वह जरूर आया है। बीस वर्ष से इसी रात की प्रतीक्षा कर रहा है।”
उसने ईशानी की ओर देखा।
“तुम्हें मंगेतर की आवाज कैसी लगी?”
ईशानी ने कहा, “आवाज उसकी थी, लेकिन शब्द एक कायर के थे।”
विनोद का चेहरा कठोर हो गया।
“तुम्हें लगता है तुम मुझे उकसाकर समय खरीद लोगी?”
“आप पहले ही हार चुके हैं। आपकी कॉल रिकॉर्ड हो चुकी है। पुलिस को सब पता है।”
विनोद ने रिमोट उठा लिया।
“एक बटन दबाते ही यह पूरा कारखाना जल जाएगा।”
धीरज ने कहा, “विनोद, सविता को छोड़ दो। अपराध हमने किया था। बच्चों को जाने दो।”
विनोद चिल्लाया, “अपराध हमने नहीं, तुमने किया था!”
धीरज ने उसकी ओर देखा।
“गिरधारी को तुमने मारा था।”
विनोद के चेहरे पर पागलपन उतर आया।
“उसने मुझे चोर कहा था। उस कारखाने को हमने खड़ा किया और मजदूर हमें कानून सिखाने लगे थे!”
“आग तुमने लगाई।”
“और तुमने मुझे रोका नहीं।”
धीरज ने सिर झुका लिया।
“यही मेरा अपराध है।”
विनोद को समझ नहीं आया कि धीरज अचानक खुले रूप में स्वीकार क्यों कर रहे थे।
ईशानी की साड़ी में लगा छोटा कैमरा पूरी बातचीत बाहर खड़ी पुलिस टीम तक पहुंचा रहा था।
उसी समय समर ऊपरी पुल के पीछे पहुंच गया। उसने विनोद पर झपटने की कोशिश की, लेकिन विनोद मुड़ गया और गोली चला दी।
गोली समर के पेट के पास लगी।
वह नीचे गिर पड़ा।
सार्थक चिल्लाया, “समर!”
विनोद ने रिमोट का बटन दबा दिया।
कुछ नहीं हुआ।
सार्थक ने जेब से तार का छोटा हिस्सा निकालकर दिखाया।
“जब तुम भाषण दे रहे थे, ईशानी ने मुख्य नियंत्रण तार काट दिया।”
विनोद ने क्रोध में दूसरा डेटोनेटर निकाला।
“इसके लिए तार की जरूरत नहीं।”
वह बटन दबाने वाला था कि सविता ने बंधे हाथों के बावजूद अपनी कुर्सी पीछे गिरा दी। कुर्सी विनोद के घुटनों से टकराई।
रिमोट उसके हाथ से गिर गया।
सार्थक आगे दौड़ा।
दोनों के बीच संघर्ष शुरू हो गया। विनोद ने सार्थक का गला पकड़कर उसे लोहे की रेलिंग से धक्का देने की कोशिश की।
घायल समर ने जमीन पर पड़ा रिमोट उठाया।
विनोद ने उसे देखकर कहा, “दबा दो। तुम्हें तो पूरे मल्होत्रा परिवार से नफरत है।”
समर ने रिमोट को देखा।
बीस वर्षों का दर्द उसके चेहरे पर था।
उसके सामने वह पिता था, जिसने उसे मरने के लिए छोड़ दिया। वह भाई था, जिसे उसकी जगह परिवार और प्रेम मिला। वह मां थी, जिसने वर्षों तक उसे मृत मान लिया।
एक बटन सब समाप्त कर सकता था।
ईशानी ने धीरे से कहा, “न्याय और बदला एक जैसे दिखाई दे सकते हैं, समर। लेकिन उनका अंत अलग होता है।”
समर ने रिमोट जमीन पर रखा और अपने पैर से तोड़ दिया।
सार्थक ने विनोद को धक्का देकर जमीन पर गिरा दिया।
पुलिस भीतर घुस आई।
विनोद गिरफ्तार हो गया।
लेकिन कारखाने के पिछले हिस्से में पेट्रोल फैल चुका था। संघर्ष के दौरान गिरी बंदूक से निकली चिंगारी ने आग पकड़ ली।
लपटें तेजी से बढ़ने लगीं।
सार्थक ने समर को उठाने की कोशिश की।
“हम साथ निकलेंगे।”
समर दर्द से बोला, “मुझे छोड़ दो। मां को ले जाओ।”
सार्थक ने उसका हाथ अपने कंधे पर रखा।
“एक बार तुम्हें इसी कारखाने में छोड़ दिया गया था। इस बार नहीं।”
दोनों भाई एक-दूसरे का सहारा लेकर बाहर निकले।
ईशानी और धीरज सविता को लेकर पीछे आए।
जैसे ही सभी मुख्य द्वार पार कर बाहर पहुंचे, कारखाने का एक हिस्सा गिर गया।
बीस वर्ष पुरानी आग का रहस्य उसी स्थान पर समाप्त हुआ, जहां से शुरू हुआ था।
शादी का स्थगित होना
समर को अस्पताल ले जाया गया। गोली शरीर के भीतर गहराई तक नहीं गई थी। उपचार के बाद वह बच गया।
उसने सार्थक के अपहरण और पहचान बदलकर परिवार में प्रवेश करने का अपराध स्वीकार किया।
सार्थक ने पुलिस से कहा कि समर ने उसके साथ शारीरिक हिंसा नहीं की थी, लेकिन उसने उसे दस दिनों तक उसकी इच्छा के विरुद्ध कैद रखा। कानून को अपना काम करना था।
धीरज और विनोद पर हत्या, आगजनी, प्रमाण मिटाने और आपराधिक साजिश का मुकदमा चला।
गिरधारी लाल और आग में मारे गए मजदूरों के परिवारों को पहली बार सच और न्याय की आशा मिली।
ईशानी और सार्थक की शादी स्थगित हो गई।
लोगों ने समझा कि इतने बड़े रहस्य के कारण रिश्ता टूट गया है।
लेकिन वास्तविक कारण कुछ और था।
ईशानी ने सार्थक से कहा, “मैं तुमसे प्रेम करती हूं। लेकिन पिछले दिनों में मैंने तुम्हारा चेहरा देखकर किसी दूसरे व्यक्ति पर विश्वास किया। अब मुझे स्वयं को समझने के लिए समय चाहिए।”
सार्थक ने पूछा, “क्या तुम्हें मुझ पर संदेह है?”
“तुम पर नहीं। अपनी पहचानने की क्षमता पर।”
सार्थक ने उसका हाथ पकड़ा।
“मैं प्रतीक्षा करूंगा।”
“तुम नाराज नहीं हो?”
“विवाह किसी तारीख को बचाने के लिए नहीं होना चाहिए। हमें पहले अपने भीतर का भय ठीक करना होगा।”
ईशानी मुस्कराई।
“यही उत्तर केवल असली सार्थक दे सकता था।”
छह महीने बाद
समर न्यायिक हिरासत में था। उसने पुलिस को पुराने अपराध से जुड़े सभी प्रमाण सौंपे और मजदूरों के परिवारों के पक्ष में बयान दिया।
एक दिन ईशानी और सार्थक उससे मिलने गए।
समर कांच के दूसरी ओर बैठा था। उसके चेहरे पर अब सार्थक जैसी मुस्कान बनाने का प्रयास नहीं था।
ईशानी ने कहा, “तुमने मेरे साथ जो किया, उसे मैं भूल नहीं सकती।”
“मुझे पता है।”
“लेकिन कारखाने में तुमने हम सबकी जान भी बचाई।”
“एक सही काम दस दिनों का झूठ मिटा नहीं सकता।”
ईशानी ने कहा, “शायद नहीं। लेकिन यह साबित करता है कि तुम केवल अपने अपराध नहीं हो।”
समर ने सार्थक की ओर देखा।
“मां कैसी हैं?”
“हर सप्ताह तुम्हें पत्र लिखती हैं।”
“मैंने उनके सामने जाने का अधिकार खो दिया।”
सार्थक ने कहा, “यह निर्णय उन्हें करने दो।”
समर की आंखें भर आईं।
“तुम मुझसे नफरत नहीं करते?”
“करता था। अब समझने की कोशिश कर रहा हूं।”
“क्या हम कभी भाई बन पाएंगे?”
सार्थक ने उत्तर दिया, “भाई हम जन्म से हैं। रिश्ता हमें आगे बनाना होगा।”
असली आवाज
एक वर्ष बाद ईशानी और सार्थक ने सादगी से विवाह किया।
न कोई बहुत बड़ा समारोह था, न मीडिया और न उद्योग जगत के प्रभावशाली लोग। समारोह में केवल करीबी मित्र, परिवार और आग में मारे गए मजदूरों के कुछ परिजन शामिल हुए।
सविता ने ईशानी के सिर पर हाथ रखते हुए कहा, “तुमने मेरे दोनों बेटों को दूसरी बार जन्म दिया।”
ईशानी ने कहा, “मैंने केवल उन्हें एक-दूसरे को चुनने का अवसर दिया।”
विवाह के बाद विदाई से पहले ईशानी का मोबाइल बजा।
स्क्रीन पर जेल से स्वीकृत कॉल दिखाई दी।
उसने फोन उठाया।
दूसरी ओर से आवाज आई—
“शादी मुबारक हो।”
वह आवाज बिल्कुल सार्थक जैसी थी।
एक क्षण के लिए ईशानी का दिल फिर तेज धड़कने लगा।
फिर उसने स्वयं को संभाला।
“धन्यवाद, समर।”
दूसरी ओर कुछ पल चुप्पी रही।
समर ने पूछा, “तुमने कैसे पहचान लिया?”
ईशानी ने सामने खड़े सार्थक की ओर देखा।
“अब मैं केवल आवाज से लोगों को नहीं पहचानती।”
“फिर कैसे?”
“उनके सच से।”
समर धीमे से हंसा।
“मेरे भाई का ध्यान रखना।”
ईशानी ने कहा, “यह आदेश मुझे उसे देना चाहिए।”
कॉल कटने के बाद सार्थक उसके पास आया।
“किसका फोन था?”
ईशानी ने शरारत से कहा, “मेरे मंगेतर की आवाज में किसी अनजान आदमी का।”
सार्थक हंस पड़ा।
“अब मैं तुम्हारा मंगेतर नहीं, पति हूं।”
“चेहरा वही है। पद बदल गया।”
सार्थक ने उसका हाथ पकड़ लिया।
विवाह मंडप के बाहर सूरज ढल रहा था। दूर कहीं कारखाने की पुरानी चिमनी दिखाई दे रही थी, जिसे अब मजदूर स्मारक में बदला जा रहा था।
उस स्मारक पर उन सभी मजदूरों के नाम लिखे गए थे, जिनकी मृत्यु को वर्षों तक दुर्घटना बताया गया।
सबसे नीचे एक पंक्ति दर्ज थी—
“आवाज की नकल की जा सकती है, चेहरे का रूप लिया जा सकता है, लेकिन सत्य अधिक समय तक किसी और की पहचान में कैद नहीं रहता।”
ईशानी ने उस रात सीखा था कि प्रेम केवल किसी परिचित आवाज पर विश्वास करने का नाम नहीं।
प्रेम वह साहस है, जिसमें हम प्रिय व्यक्ति से कठिन प्रश्न पूछते हैं, उसके चेहरे के पीछे छिपा सच देखते हैं और भ्रम टूटने के बाद भी सही व्यक्ति का हाथ दोबारा पकड़ना सीखते हैं।
एक ही आवाज में दो भाई बोल सकते थे।
एक ही चेहरे के पीछे दो अलग जीवन खड़े हो सकते थे।
लेकिन अंत में दोनों की पहचान उनके जन्म से नहीं, उनके निर्णयों से हुई।
एक भाई ने बदले की राह छोड़कर न्याय चुना।
दूसरे ने क्रोध छोड़कर अपने खोए भाई को बचाया।
और ईशानी ने भय के बीच उस आवाज को पहचाना, जो फोन से नहीं, विश्वास से आती थी।
