शैतान के जंगल से गुजरती आधी रात की ट्रेन
रात के 11 बजकर 47 मिनट पर जब ट्रेन नंबर 3097 ने पुराने कालवन जंगल की सीमा में प्रवेश किया, तब किसी भी यात्री को अंदाजा नहीं था कि वे भारत की सबसे भुला दी गई रेलवे लाइन पर अपनी जिंदगी की सबसे डरावनी यात्रा शुरू कर चुके हैं।
ट्रेन का नाम था “अमृतपुर पैसेंजर”। यह कोई मशहूर ट्रेन नहीं थी। न इसमें चमकदार कोच थे, न बड़े शहरों की भीड़। यह बस छोटे कस्बों और गांवों को जोड़ने वाली एक पुरानी ट्रेन थी, जिसमें किसान, छात्र, मजदूर, दुकानदार और कुछ थके हुए यात्री सफर कर रहे थे। उस रात बारिश तेज थी। मुख्य रेलवे लाइन पर भूस्खलन हो गया था, इसलिए कंट्रोल रूम ने ट्रेन को एक पुराने वैकल्पिक रूट से भेजने का फैसला किया।
वह रूट कई सालों से बंद पड़ा था।
उसका नाम था—कालवन लाइन।
रेलवे के कागजों में वह लाइन अब भी मौजूद थी, लेकिन लोग उसे “शैतान का जंगल” कहते थे। कहा जाता था कि उस जंगल में रेल की पटरियां रात में अपने आप आवाज करती हैं, जैसे कोई अदृश्य ट्रेन अब भी उन पर दौड़ती हो। पुराने ड्राइवर उस रूट से गुजरने से मना कर देते थे। बुजुर्ग गार्ड कहते थे कि कालवन लाइन पर एक स्टेशन था, जो अब नक्शे में नहीं मिलता, लेकिन आधी रात को उसकी पीली बत्तियां फिर जल उठती हैं।
उस स्टेशन का नाम था—रुद्रघाट हॉल्ट।
समस्या यह थी कि रुद्रघाट हॉल्ट चालीस साल पहले ही बंद हो चुका था।
और उससे भी बड़ी समस्या यह थी कि उस स्टेशन पर कभी एक पूरी ट्रेन गायब हुई थी।
उस रात अमृतपुर पैसेंजर के स्लीपर कोच S3 में अठाईस साल की काव्या सेन बैठी थी। वह शहर से अपने गांव लौट रही थी। पेशे से वह इतिहास की रिसर्चर थी और पुराने रेलवे रिकॉर्ड्स पर काम कर रही थी। उसकी सीट खिड़की के पास थी। बारिश की बूंदें कांच पर दौड़ रही थीं और बाहर सिर्फ काला जंगल दिखाई दे रहा था।
उसके सामने वाली सीट पर एक बूढ़े आदमी बैठे थे। सफेद बाल, झुर्रियों वाला चेहरा, और हाथ में पीतल की पुरानी घड़ी। उनका नाम शंभूनाथ था। वे कभी रेलवे में गार्ड रह चुके थे।
काव्या ने देखा कि जैसे ही ट्रेन कालवन जंगल में घुसी, बूढ़े आदमी का चेहरा बदल गया। उन्होंने अपनी घड़ी देखी, फिर खिड़की से बाहर झांका और धीरे से बोले, “आज ट्रेन को इस रास्ते नहीं लाना चाहिए था।”
काव्या ने पूछा, “आप इस लाइन को जानते हैं?”
शंभूनाथ ने उसकी तरफ देखा। “जानता हूं, इसलिए डरता हूं।”
काव्या को ऐसे जवाब हमेशा आकर्षित करते थे। उसने नोटबुक निकाली। “क्यों? इस लाइन पर क्या हुआ था?”
बूढ़े आदमी ने तुरंत सिर हिला दिया। “कहानियां सुनना आसान है, बेटी। उनमें फंसना मुश्किल।”
ट्रेन अचानक झटके से हिली। ऊपर की बर्थ पर सोया एक लड़का नीचे गिरते-गिरते बचा। कोच की लाइट कुछ सेकंड के लिए बुझी, फिर पीली और कमजोर होकर जल उठी।
लाउडस्पीकर से खरखराती आवाज आई—
“अगला स्टेशन… रुद्रघाट हॉल्ट…”
पूरे कोच में सन्नाटा फैल गया।
काव्या ने हैरानी से ऊपर लगे रूट चार्ट को देखा। उसमें रुद्रघाट नाम का कोई स्टेशन नहीं था। मोबाइल में नेटवर्क नहीं था। ट्रेन की गति धीमी होने लगी।
शंभूनाथ का चेहरा राख जैसा सफेद हो गया।
उन्होंने बहुत धीमे स्वर में कहा, “किसी से बात मत करना। कोई कुछ पूछे, जवाब मत देना। कोई सीट मांगे, जगह मत देना। कोई टिकट दिखाए, हाथ मत लगाना।”
काव्या ने पूछा, “क्यों?”
ट्रेन की सीटी ने उसका सवाल निगल लिया।
बाहर अंधेरे जंगल के बीच अचानक एक स्टेशन दिखाई दिया। छोटा-सा प्लेटफॉर्म। टूटी हुई बेंच। जंग लगा बोर्ड। लेकिन उस बोर्ड पर पीली रोशनी साफ पड़ रही थी—
“रुद्रघाट हॉल्ट”
बारिश प्लेटफॉर्म पर नहीं गिर रही थी।
जैसे स्टेशन किसी अलग समय में खड़ा हो।
ट्रेन धीरे-धीरे रुक गई।
दरवाजे अपने आप खुल गए।
कोई घोषणा नहीं हुई। कोई स्टेशन मास्टर नहीं दिखा। कोई कुली नहीं। बस धुंध। पीली बत्तियां। और प्लेटफॉर्म पर खड़े कुछ यात्री।
वे अजीब थे।
एक औरत गोद में बच्चा लिए खड़ी थी, लेकिन बच्चा बिल्कुल स्थिर था। एक बुजुर्ग आदमी ने हाथ में पुराना चमड़े का सूटकेस पकड़ रखा था। दो बच्चे स्कूल यूनिफॉर्म में थे, पर उनके कपड़े पुराने जमाने के लग रहे थे। एक सैनिक जैसा आदमी प्लेटफॉर्म के किनारे खड़ा था। सभी के चेहरे फीके थे, जैसे पानी में भीगी पुरानी तस्वीरें।
फिर वे ट्रेन में चढ़ने लगे।
S3 कोच का दरवाजा खुला। ठंडी हवा अंदर आई। काव्या की सांस रुक गई।
सबसे पहले वही औरत अंदर आई। उसके गीले बाल चेहरे से चिपके थे। उसने धीरे-धीरे कोच में नजर घुमाई और काव्या की सीट के पास आकर रुक गई।
“बेटी,” उसने बहुत मीठी आवाज में कहा, “थोड़ी जगह दे दो। बच्चा बीमार है।”
काव्या का दिल पिघलने लगा। वह उठने ही वाली थी कि शंभूनाथ ने उसका हाथ कसकर पकड़ लिया। उन्होंने बिना उसकी तरफ देखे सिर हिलाया।
मत।
काव्या चुप रही।
औरत की आंखें अचानक काली हो गईं। उसकी मुस्कान गायब हो गई। उसने फिर कहा, इस बार भारी आवाज में, “जगह दे दो।”
काव्या ने होंठ भींच लिए।
औरत कुछ पल तक उसे घूरती रही, फिर आगे बढ़ गई। उसके गुजरते ही काव्या ने देखा कि सीट की लोहे की रॉड पर बर्फ जम गई थी।
दूसरा आदमी आया। उसने एक यात्री को पुराना टिकट दिखाया। “भाई साहब, बताना यह टिकट सही है क्या?”
वह यात्री नींद में था। उसने आंखें मलते हुए टिकट पकड़ लिया।
जैसे ही उसकी उंगलियां उस टिकट से छुईं, उसकी आंखें फैल गईं। उसने चीखने की कोशिश की, लेकिन आवाज नहीं निकली। उसका शरीर धीरे-धीरे पारदर्शी होने लगा। कुछ सेकंड बाद उसकी सीट खाली थी।
वह गायब हो चुका था।
कोच में बैठे लोग चीखने लगे। लेकिन बाहर कोई आवाज नहीं गई। जैसे कोच के भीतर ही सब बंद हो गया हो।
काव्या खड़ी हो गई। “यह क्या हो रहा है?”
शंभूनाथ ने कांपती आवाज में कहा, “मैंने कहा था, हाथ मत लगाना।”
अब तक कई अजीब यात्री कोच में फैल चुके थे। वे किसी से पानी मांग रहे थे, किसी से रास्ता पूछ रहे थे, किसी से नाम पूछ रहे थे। जो भी जवाब देता, उसके आसपास धुंध घिर जाती। जो भी उनकी चीज छूता, वह जैसे धीरे-धीरे कोच से मिटने लगता।
ट्रेन के बाकी डिब्बों से चीखें आने लगीं।
काव्या ने दरवाजे की ओर दौड़कर बाहर देखने की कोशिश की। प्लेटफॉर्म पर अब और भी लोग खड़े थे। सैकड़ों। वे सब चुपचाप ट्रेन में चढ़ने की प्रतीक्षा कर रहे थे।
शंभूनाथ ने काव्या को खींचकर वापस बैठा दिया। “दरवाजे के पास मत जा। जो उतरता है, वह वापस नहीं आता।”
काव्या ने पूछा, “ये लोग कौन हैं?”
बूढ़े आदमी की आंखें भर आईं। “वे यात्री हैं। उस आखिरी ट्रेन के यात्री।”
काव्या का दिल तेज धड़कने लगा। “कौन सी आखिरी ट्रेन?”
शंभूनाथ ने गहरी सांस ली।
“चालीस साल पहले इस लाइन पर रात की एक ट्रेन चलती थी—रुद्रघाट मेल। बारिश की रात थी। जंगल में जमीन धंस गई थी। स्टेशन मास्टर को खबर थी कि आगे पुल टूटा है, लेकिन उसने ट्रेन नहीं रोकी। ऊपर से आदेश था कि मालगाड़ी को पहले निकालना है। यात्रियों की ट्रेन को पुराने प्लेटफॉर्म पर रोककर रखा गया। फिर अचानक जंगल से आग फैली। कुछ लोग कहते हैं बिजली गिरी, कुछ कहते हैं किसी ने सिग्नल केबिन में आग लगा दी। ट्रेन के दरवाजे बंद थे। लोग भीतर फंस गए।”
काव्या की सांस अटक गई। “सभी मर गए?”
“सभी नहीं,” शंभूनाथ ने धीमे से कहा। “एक गार्ड भाग गया था। उसने दरवाजे खोलने की कोशिश नहीं की। वह अपनी जान बचाकर जंगल से निकल आया। अगले दिन जब लोग पहुंचे, तो ट्रेन जली हुई थी। स्टेशन जल चुका था। रिकॉर्ड में हादसा छोटा करके लिखा गया। कई नाम गायब कर दिए गए। स्टेशन बंद कर दिया गया।”
“और वह गार्ड?”
शंभूनाथ ने खिड़की की तरफ देखा। “वह मेरा पिता था।”
काव्या चुप रह गई।
अब उसे समझ आया कि बूढ़े आदमी का डर सिर्फ भूतों से नहीं, अपराध-बोध से था। शायद वह पाप उसने नहीं किया था, लेकिन उसकी छाया उसकी पूरी जिंदगी पर पड़ी थी।
तभी कोच के दूसरे छोर से आवाज आई—
“शंभू…”
बूढ़े आदमी ने आंखें बंद कर लीं।
प्लेटफॉर्म से एक आदमी चढ़ा। उसका शरीर आधा जला हुआ था। उसने पुराने रेलवे गार्ड की वर्दी पहन रखी थी। हाथ में लालटेन थी। वह धीरे-धीरे चलता हुआ उनके सामने आकर रुक गया।
“शंभू,” उसने कहा, “इतने साल बाद आया है?”
काव्या ने शंभूनाथ की तरफ देखा। “आप इसे जानते हैं?”
शंभूनाथ के होंठ कांपे। “यह मेरे पिता हैं।”
जला हुआ गार्ड मुस्कुराया। “मैंने तुम्हें कहा था न, इस लाइन पर कभी मत आना।”
शंभूनाथ की आंखों से आंसू गिरने लगे। “आपने उन्हें क्यों नहीं बचाया?”
गार्ड का चेहरा कठोर हो गया। “मैंने कोशिश की थी।”
“झूठ,” कोच में कई आवाजें एक साथ गूंजीं।
भूतिया यात्री उनकी ओर मुड़ गए।
“दरवाजे बंद थे…”
“बच्चे रो रहे थे…”
“तुम भाग गए…”
“तुमने लालटेन फेंक दी…”
जले हुए गार्ड की आंखें जलने लगीं। “मैं जीना चाहता था।”
शंभूनाथ ने सिर झुका लिया। “और वे?”
गार्ड ने कोई जवाब नहीं दिया।
तभी ट्रेन की सीटी बजी। दरवाजे बंद होने लगे। लेकिन भूतिया यात्री अब भी अंदर थे। ट्रेन धीरे-धीरे चल पड़ी।
काव्या ने खिड़की से बाहर देखा। रुद्रघाट हॉल्ट पीछे नहीं छूट रहा था। ट्रेन चल रही थी, फिर भी स्टेशन वहीं का वहीं था। जैसे वे किसी गोल चक्र में फंस गए हों।
लाउडस्पीकर से आवाज आई—
“अगला स्टेशन… अंतिम डिब्बा…”
किसी ने हंसी।
काव्या ने शंभूनाथ से पूछा, “अंतिम डिब्बा क्या है?”
शंभूनाथ ने कहा, “पुरानी ट्रेन का आखिरी कोच। कहते हैं, हादसे में वही सबसे पहले जला था। जिनकी आत्माएं सबसे ज्यादा पीड़ा में थीं, वे वहीं फंसी हैं।”
कोच की लाइट फिर बुझी। जब रोशनी लौटी, तो S3 कोच बदल चुका था।
सीटें पुरानी लकड़ी की थीं। पंखे गायब थे। खिड़कियों पर लोहे की सलाखें थीं। लोगों के कपड़े भी बदलते दिख रहे थे। कुछ यात्रियों के चेहरे धुंधले होने लगे। जैसे वर्तमान धीरे-धीरे अतीत में बदल रहा हो।
काव्या ने अपनी कलाई पर बंधी घड़ी देखी। सुइयां उल्टी दिशा में घूम रही थीं।
ट्रेन के भीतर एक बच्ची की आवाज गूंजी—
“किसी ने दरवाजा क्यों नहीं खोला?”
काव्या ने सामने देखा। स्कूल यूनिफॉर्म पहने एक छोटी लड़की खड़ी थी। उसके बालों में लाल रिबन था। उसके चेहरे पर राख लगी थी।
इस बार शंभूनाथ ने खुद को रोक नहीं पाया।
“बेटी…” उन्होंने कहा।
काव्या चिल्लाई, “जवाब मत दीजिए!”
लेकिन देर हो चुकी थी।
लड़की मुस्कुराई। “आपने जवाब दिया।”
धुंध शंभूनाथ के पैरों से लिपटने लगी। जला हुआ गार्ड हंसने लगा। “अब तू भी यहीं रहेगा, मेरे बेटे। पाप का खून पाप में लौटता है।”
शंभूनाथ ने पहली बार डर की जगह दृढ़ता दिखाई। उन्होंने अपनी पीतल की घड़ी काव्या को थमा दी।
“मेरे पिता ने गलती की। मैंने जिंदगी भर उससे भागकर दूसरी गलती की। इस घड़ी में उनका पुराना गार्ड लॉग छिपा है। उसमें असली हादसे का रिकॉर्ड है। अगर तू बच गई, तो सच बाहर लाना।”
काव्या ने घड़ी खोली। अंदर एक छोटा-सा मुड़ा हुआ कागज था। उस पर हादसे की रात के असली नाम, समय, आदेश और गार्ड की लिखावट थी।
“दरवाजे बंद रखने का आदेश गलत था। यात्रियों को बचाया जा सकता था।”
काव्या का दिल भर आया। “लेकिन हम बचेंगे कैसे?”
शंभूनाथ ने खड़े होते हुए कहा, “जिस स्टेशन को रिकॉर्ड से मिटाया गया, उसे नाम वापस चाहिए। जिन यात्रियों को गिना नहीं गया, उन्हें स्वीकार किया जाना चाहिए।”
वह कोच के बीच में खड़े हुए और ऊंची आवाज में बोले—
“मैं शंभूनाथ, उस गार्ड का बेटा, स्वीकार करता हूं कि रुद्रघाट हादसे को छिपाया गया। जिन लोगों को मरा हुआ भी दर्ज नहीं किया गया, वे इंसान थे। उनके नाम थे। उनके घर थे। उनका दर्द था।”
भूतिया यात्री शांत होने लगे।
जला हुआ गार्ड गुर्राया। “चुप रह! सच हमें मुक्त नहीं करेगा, हमें दोषी बना देगा!”
शंभूनाथ ने उसकी ओर देखा। “दोष से भागना ही हमें इस रात में बांधकर रखता है।”
काव्या ने घड़ी से कागज निकाला और नाम पढ़ने शुरू किए।
“सरला देवी… मोहनलाल… इमरान अली… राधा… गोपाल… चंद्रकांत… सुशीला… अज्ञात बालक नहीं—नाम विनय…”
हर नाम के साथ एक भूतिया चेहरा रोशनी में बदलने लगा। कुछ यात्रियों की आंखों से काली राख बहने लगी। वे जैसे वर्षों बाद पहली बार अपने नाम सुन रहे थे।
ट्रेन कांपने लगी।
जला हुआ गार्ड चीखा, “नहीं! अगर ये मुक्त हो गए तो मैं अकेला रह जाऊंगा!”
काव्या ने अगला नाम पढ़ा।
“मीना, उम्र आठ वर्ष…”
लाल रिबन वाली बच्ची आगे आई। उसके चेहरे से राख हटने लगी। उसने धीरे से पूछा, “मेरा नाम सच में लिखा था?”
काव्या की आंखें भर आईं। “हाँ, मीना। तुम किसी फाइल की गलती नहीं थीं। तुम यात्री थीं। तुम इंसान थीं।”
बच्ची मुस्कुराई।
उसी पल कोच का बंद दरवाजा खुल गया।
बाहर वही रुद्रघाट हॉल्ट था, लेकिन अब धुंध में सफेद रोशनी फैल रही थी। प्लेटफॉर्म पर खड़े मृत यात्री धीरे-धीरे उतरने लगे। कोई रो रहा था, कोई अपने प्रियजनों को ढूंढ रहा था, कोई बस आसमान की ओर देख रहा था।
लेकिन जला हुआ गार्ड शंभूनाथ को पकड़ चुका था।
“तू मेरे साथ रहेगा,” वह गरजा। “खून का हिसाब खून से होगा।”
शंभूनाथ ने काव्या की तरफ देखा। “जाओ।”
“नहीं!” काव्या चिल्लाई।
“सच बाहर ले जाओ,” उन्होंने कहा। “वरना यह स्टेशन फिर लौटेगा।”
काव्या ने दरवाजे की तरफ भागना चाहा, पर एक भूतिया यात्री ने उसका रास्ता रोक लिया। वह बुजुर्ग औरत थी, जिसने पहले बच्चे के लिए जगह मांगी थी। इस बार उसके चेहरे पर क्रोध नहीं, करुणा थी।
“तू जीवित है,” उसने कहा। “जीवित लोग ही इतिहास बदल सकते हैं।”
उसने काव्या को धक्का दिया।
काव्या वर्तमान वाली ट्रेन के S3 कोच में वापस गिर पड़ी।
लाइटें जल उठीं। बारिश फिर खिड़की पर पड़ रही थी। यात्री घबराए हुए थे। कुछ सीटें खाली थीं। जिन लोगों ने टिकट छुआ था या जवाब दिया था, वे लौटे नहीं थे।
ट्रेन तेज गति से जंगल से बाहर निकल रही थी।
काव्या ने खिड़की से पीछे देखा। दूर अंधेरे में रुद्रघाट हॉल्ट कुछ पल के लिए दिखाई दिया। प्लेटफॉर्म पर शंभूनाथ खड़े थे। उनके पास लाल रिबन वाली बच्ची थी। वे काव्या को देख रहे थे।
फिर स्टेशन अंधेरे में डूब गया।
सुबह ट्रेन अमृतपुर पहुंची। रेलवे अधिकारियों ने कहा कि ट्रेन तकनीकी खराबी के कारण कुछ देर रुकी थी। उन्होंने रुद्रघाट हॉल्ट का नाम सुनकर हंस दिया। “ऐसा कोई स्टेशन इस लाइन पर नहीं है,” उन्होंने कहा।
लेकिन काव्या के पास सबूत था।
शंभूनाथ की पीतल की घड़ी। उसके अंदर छिपा असली गार्ड लॉग। और उसके कैमरे में रिकॉर्ड हुई कुछ धुंधली फुटेज—पीली बत्तियां, पुराना बोर्ड, और ट्रेन में चढ़ते वे यात्री जिनके पैर जमीन को छू नहीं रहे थे।
काव्या ने महीनों तक पुराने दस्तावेज खंगाले। उसने गायब नाम ढूंढे। उसने अखबारों की पुरानी कटिंग निकालीं। उसने उन परिवारों को खोजा जिनके पूर्वज कभी “लापता” घोषित कर दिए गए थे। आखिरकार उसकी रिपोर्ट छपी—
“रुद्रघाट हॉल्ट हादसा: चालीस साल बाद सामने आए छिपाए गए नाम”
देश भर में हलचल मच गई। रेलवे ने जांच बैठाई। पुराने रिकॉर्ड सुधारे गए। रुद्रघाट के मृत यात्रियों की याद में स्मारक बनाने की घोषणा हुई।
कुछ महीनों बाद काव्या फिर कालवन जंगल गई। दिन का समय था। रेलवे अधिकारी, गांव वाले और कुछ परिवार उसके साथ थे। जहां पुराना स्टेशन होना चाहिए था, वहां सिर्फ झाड़ियां थीं। लेकिन जब मजदूरों ने जमीन साफ की, तो नीचे जंग लगा बोर्ड मिला—
“रुद्रघाट हॉल्ट”
स्मारक बनाया गया। नाम पत्थर पर लिखे गए। हर नाम साफ। हर उम्र साफ। हर पहचान साफ।
काव्या ने सबसे नीचे एक अलग पंक्ति लिखवाई—
“उन लोगों की स्मृति में, जिन्हें इतिहास ने भुलाया, पर रात ने नहीं।”
उस रात पहली बार कालवन जंगल में ट्रेन की कोई भूतिया सीटी नहीं सुनाई दी।
लोगों ने कहा कि आत्माएं मुक्त हो गईं।
काव्या भी यही मानना चाहती थी।
लेकिन कहानी पूरी तरह खत्म नहीं हुई।
साल भर बाद, बरसात की एक और रात, एक मालगाड़ी उसी जंगल से गुजरी। ड्राइवर ने कंट्रोल रूम को घबराई आवाज में संदेश भेजा—
“साहब… आगे स्टेशन दिख रहा है। रूट मैप में नहीं है। प्लेटफॉर्म पर एक बूढ़ा गार्ड खड़ा है। उसके हाथ में लालटेन है।”
कंट्रोल रूम ने कहा, “लाइन साफ है। कोई स्टेशन नहीं है।”
ड्राइवर ने कुछ सेकंड बाद फुसफुसाकर कहा—
“वह मुझे रुकने का इशारा कर रहा है।”
उस रात मालगाड़ी समय पर रोक दी गई।
आगे पुल के पास पटरी टूटी हुई थी।
सैकड़ों लोगों की जान बच गई।
जब अधिकारी सुबह वहां पहुंचे, तो लाइन के किनारे मिट्टी में पीतल की पुरानी घड़ी पड़ी मिली। घड़ी बंद थी। उसकी सुइयां 12 बजकर 03 मिनट पर अटकी थीं।
और उसके पीछे खरोंचकर लिखा था—
“इस बार दरवाजा खोल दिया।”
काव्या ने जब यह सुना, तो वह देर तक चुप रही। उसे समझ आ गया कि रुद्रघाट हॉल्ट अब डर का स्टेशन नहीं रहा।
वह चेतावनी बन चुका था।
कभी-कभी आधी रात को कालवन जंगल से गुजरने वाले लोग अब भी दूर पीली रोशनी देखते हैं। कुछ कहते हैं, प्लेटफॉर्म पर यात्री खड़े होते हैं। कुछ कहते हैं, लालटेन लिए एक बूढ़ा गार्ड रास्ता दिखाता है। और कुछ ड्राइवर शपथ लेकर कहते हैं कि जब भी पटरियों पर खतरा होता है, जंगल से एक धीमी आवाज आती है—
“रुको…”
जो डरकर नहीं, समझकर रुक जाता है, वह बच जाता है।
और जो उस आवाज का मजाक उड़ाता है, उसे आधी रात की ट्रेन अपने साथ ले जाती है।
क्योंकि शैतान के जंगल से गुजरती हर ट्रेन सिर्फ मंजिल तक नहीं जाती।
कभी-कभी वह इतिहास के उस प्लेटफॉर्म से भी गुजरती है—
जहां भूले हुए नाम अब भी न्याय का इंतजार करते हैं।
रात के 11 बजकर 47 मिनट पर जब ट्रेन नंबर 3097 ने पुराने कालवन जंगल की सीमा में प्रवेश किया, तब किसी भी यात्री को अंदाजा नहीं था कि वे भारत की सबसे भुला दी गई रेलवे लाइन पर अपनी जिंदगी की सबसे डरावनी यात्रा शुरू कर चुके हैं।
ट्रेन का नाम था “अमृतपुर पैसेंजर”। यह कोई मशहूर ट्रेन नहीं थी। न इसमें चमकदार कोच थे, न बड़े शहरों की भीड़। यह बस छोटे कस्बों और गांवों को जोड़ने वाली एक पुरानी ट्रेन थी, जिसमें किसान, छात्र, मजदूर, दुकानदार और कुछ थके हुए यात्री सफर कर रहे थे। उस रात बारिश तेज थी। मुख्य रेलवे लाइन पर भूस्खलन हो गया था, इसलिए कंट्रोल रूम ने ट्रेन को एक पुराने वैकल्पिक रूट से भेजने का फैसला किया।
वह रूट कई सालों से बंद पड़ा था।
उसका नाम था—कालवन लाइन।
रेलवे के कागजों में वह लाइन अब भी मौजूद थी, लेकिन लोग उसे “शैतान का जंगल” कहते थे। कहा जाता था कि उस जंगल में रेल की पटरियां रात में अपने आप आवाज करती हैं, जैसे कोई अदृश्य ट्रेन अब भी उन पर दौड़ती हो। पुराने ड्राइवर उस रूट से गुजरने से मना कर देते थे। बुजुर्ग गार्ड कहते थे कि कालवन लाइन पर एक स्टेशन था, जो अब नक्शे में नहीं मिलता, लेकिन आधी रात को उसकी पीली बत्तियां फिर जल उठती हैं।
उस स्टेशन का नाम था—रुद्रघाट हॉल्ट।
समस्या यह थी कि रुद्रघाट हॉल्ट चालीस साल पहले ही बंद हो चुका था।
और उससे भी बड़ी समस्या यह थी कि उस स्टेशन पर कभी एक पूरी ट्रेन गायब हुई थी।
उस रात अमृतपुर पैसेंजर के स्लीपर कोच S3 में अठाईस साल की काव्या सेन बैठी थी। वह शहर से अपने गांव लौट रही थी। पेशे से वह इतिहास की रिसर्चर थी और पुराने रेलवे रिकॉर्ड्स पर काम कर रही थी। उसकी सीट खिड़की के पास थी। बारिश की बूंदें कांच पर दौड़ रही थीं और बाहर सिर्फ काला जंगल दिखाई दे रहा था।
उसके सामने वाली सीट पर एक बूढ़े आदमी बैठे थे। सफेद बाल, झुर्रियों वाला चेहरा, और हाथ में पीतल की पुरानी घड़ी। उनका नाम शंभूनाथ था। वे कभी रेलवे में गार्ड रह चुके थे।
काव्या ने देखा कि जैसे ही ट्रेन कालवन जंगल में घुसी, बूढ़े आदमी का चेहरा बदल गया। उन्होंने अपनी घड़ी देखी, फिर खिड़की से बाहर झांका और धीरे से बोले, “आज ट्रेन को इस रास्ते नहीं लाना चाहिए था।”
काव्या ने पूछा, “आप इस लाइन को जानते हैं?”
शंभूनाथ ने उसकी तरफ देखा। “जानता हूं, इसलिए डरता हूं।”
काव्या को ऐसे जवाब हमेशा आकर्षित करते थे। उसने नोटबुक निकाली। “क्यों? इस लाइन पर क्या हुआ था?”
बूढ़े आदमी ने तुरंत सिर हिला दिया। “कहानियां सुनना आसान है, बेटी। उनमें फंसना मुश्किल।”
ट्रेन अचानक झटके से हिली। ऊपर की बर्थ पर सोया एक लड़का नीचे गिरते-गिरते बचा। कोच की लाइट कुछ सेकंड के लिए बुझी, फिर पीली और कमजोर होकर जल उठी।
लाउडस्पीकर से खरखराती आवाज आई—
“अगला स्टेशन… रुद्रघाट हॉल्ट…”
पूरे कोच में सन्नाटा फैल गया।
काव्या ने हैरानी से ऊपर लगे रूट चार्ट को देखा। उसमें रुद्रघाट नाम का कोई स्टेशन नहीं था। मोबाइल में नेटवर्क नहीं था। ट्रेन की गति धीमी होने लगी।
शंभूनाथ का चेहरा राख जैसा सफेद हो गया।
उन्होंने बहुत धीमे स्वर में कहा, “किसी से बात मत करना। कोई कुछ पूछे, जवाब मत देना। कोई सीट मांगे, जगह मत देना। कोई टिकट दिखाए, हाथ मत लगाना।”
काव्या ने पूछा, “क्यों?”
ट्रेन की सीटी ने उसका सवाल निगल लिया।
बाहर अंधेरे जंगल के बीच अचानक एक स्टेशन दिखाई दिया। छोटा-सा प्लेटफॉर्म। टूटी हुई बेंच। जंग लगा बोर्ड। लेकिन उस बोर्ड पर पीली रोशनी साफ पड़ रही थी—
“रुद्रघाट हॉल्ट”
बारिश प्लेटफॉर्म पर नहीं गिर रही थी।
जैसे स्टेशन किसी अलग समय में खड़ा हो।
ट्रेन धीरे-धीरे रुक गई।
दरवाजे अपने आप खुल गए।
कोई घोषणा नहीं हुई। कोई स्टेशन मास्टर नहीं दिखा। कोई कुली नहीं। बस धुंध। पीली बत्तियां। और प्लेटफॉर्म पर खड़े कुछ यात्री।
वे अजीब थे।
एक औरत गोद में बच्चा लिए खड़ी थी, लेकिन बच्चा बिल्कुल स्थिर था। एक बुजुर्ग आदमी ने हाथ में पुराना चमड़े का सूटकेस पकड़ रखा था। दो बच्चे स्कूल यूनिफॉर्म में थे, पर उनके कपड़े पुराने जमाने के लग रहे थे। एक सैनिक जैसा आदमी प्लेटफॉर्म के किनारे खड़ा था। सभी के चेहरे फीके थे, जैसे पानी में भीगी पुरानी तस्वीरें।
फिर वे ट्रेन में चढ़ने लगे।
S3 कोच का दरवाजा खुला। ठंडी हवा अंदर आई। काव्या की सांस रुक गई।
सबसे पहले वही औरत अंदर आई। उसके गीले बाल चेहरे से चिपके थे। उसने धीरे-धीरे कोच में नजर घुमाई और काव्या की सीट के पास आकर रुक गई।
“बेटी,” उसने बहुत मीठी आवाज में कहा, “थोड़ी जगह दे दो। बच्चा बीमार है।”
काव्या का दिल पिघलने लगा। वह उठने ही वाली थी कि शंभूनाथ ने उसका हाथ कसकर पकड़ लिया। उन्होंने बिना उसकी तरफ देखे सिर हिलाया।
मत।
काव्या चुप रही।
औरत की आंखें अचानक काली हो गईं। उसकी मुस्कान गायब हो गई। उसने फिर कहा, इस बार भारी आवाज में, “जगह दे दो।”
काव्या ने होंठ भींच लिए।
औरत कुछ पल तक उसे घूरती रही, फिर आगे बढ़ गई। उसके गुजरते ही काव्या ने देखा कि सीट की लोहे की रॉड पर बर्फ जम गई थी।
दूसरा आदमी आया। उसने एक यात्री को पुराना टिकट दिखाया। “भाई साहब, बताना यह टिकट सही है क्या?”
वह यात्री नींद में था। उसने आंखें मलते हुए टिकट पकड़ लिया।
जैसे ही उसकी उंगलियां उस टिकट से छुईं, उसकी आंखें फैल गईं। उसने चीखने की कोशिश की, लेकिन आवाज नहीं निकली। उसका शरीर धीरे-धीरे पारदर्शी होने लगा। कुछ सेकंड बाद उसकी सीट खाली थी।
वह गायब हो चुका था।
कोच में बैठे लोग चीखने लगे। लेकिन बाहर कोई आवाज नहीं गई। जैसे कोच के भीतर ही सब बंद हो गया हो।
काव्या खड़ी हो गई। “यह क्या हो रहा है?”
शंभूनाथ ने कांपती आवाज में कहा, “मैंने कहा था, हाथ मत लगाना।”
अब तक कई अजीब यात्री कोच में फैल चुके थे। वे किसी से पानी मांग रहे थे, किसी से रास्ता पूछ रहे थे, किसी से नाम पूछ रहे थे। जो भी जवाब देता, उसके आसपास धुंध घिर जाती। जो भी उनकी चीज छूता, वह जैसे धीरे-धीरे कोच से मिटने लगता।
ट्रेन के बाकी डिब्बों से चीखें आने लगीं।
काव्या ने दरवाजे की ओर दौड़कर बाहर देखने की कोशिश की। प्लेटफॉर्म पर अब और भी लोग खड़े थे। सैकड़ों। वे सब चुपचाप ट्रेन में चढ़ने की प्रतीक्षा कर रहे थे।
शंभूनाथ ने काव्या को खींचकर वापस बैठा दिया। “दरवाजे के पास मत जा। जो उतरता है, वह वापस नहीं आता।”
काव्या ने पूछा, “ये लोग कौन हैं?”
बूढ़े आदमी की आंखें भर आईं। “वे यात्री हैं। उस आखिरी ट्रेन के यात्री।”
काव्या का दिल तेज धड़कने लगा। “कौन सी आखिरी ट्रेन?”
शंभूनाथ ने गहरी सांस ली।
“चालीस साल पहले इस लाइन पर रात की एक ट्रेन चलती थी—रुद्रघाट मेल। बारिश की रात थी। जंगल में जमीन धंस गई थी। स्टेशन मास्टर को खबर थी कि आगे पुल टूटा है, लेकिन उसने ट्रेन नहीं रोकी। ऊपर से आदेश था कि मालगाड़ी को पहले निकालना है। यात्रियों की ट्रेन को पुराने प्लेटफॉर्म पर रोककर रखा गया। फिर अचानक जंगल से आग फैली। कुछ लोग कहते हैं बिजली गिरी, कुछ कहते हैं किसी ने सिग्नल केबिन में आग लगा दी। ट्रेन के दरवाजे बंद थे। लोग भीतर फंस गए।”
काव्या की सांस अटक गई। “सभी मर गए?”
“सभी नहीं,” शंभूनाथ ने धीमे से कहा। “एक गार्ड भाग गया था। उसने दरवाजे खोलने की कोशिश नहीं की। वह अपनी जान बचाकर जंगल से निकल आया। अगले दिन जब लोग पहुंचे, तो ट्रेन जली हुई थी। स्टेशन जल चुका था। रिकॉर्ड में हादसा छोटा करके लिखा गया। कई नाम गायब कर दिए गए। स्टेशन बंद कर दिया गया।”
“और वह गार्ड?”
शंभूनाथ ने खिड़की की तरफ देखा। “वह मेरा पिता था।”
काव्या चुप रह गई।
अब उसे समझ आया कि बूढ़े आदमी का डर सिर्फ भूतों से नहीं, अपराध-बोध से था। शायद वह पाप उसने नहीं किया था, लेकिन उसकी छाया उसकी पूरी जिंदगी पर पड़ी थी।
तभी कोच के दूसरे छोर से आवाज आई—
“शंभू…”
बूढ़े आदमी ने आंखें बंद कर लीं।
प्लेटफॉर्म से एक आदमी चढ़ा। उसका शरीर आधा जला हुआ था। उसने पुराने रेलवे गार्ड की वर्दी पहन रखी थी। हाथ में लालटेन थी। वह धीरे-धीरे चलता हुआ उनके सामने आकर रुक गया।
“शंभू,” उसने कहा, “इतने साल बाद आया है?”
काव्या ने शंभूनाथ की तरफ देखा। “आप इसे जानते हैं?”
शंभूनाथ के होंठ कांपे। “यह मेरे पिता हैं।”
जला हुआ गार्ड मुस्कुराया। “मैंने तुम्हें कहा था न, इस लाइन पर कभी मत आना।”
शंभूनाथ की आंखों से आंसू गिरने लगे। “आपने उन्हें क्यों नहीं बचाया?”
गार्ड का चेहरा कठोर हो गया। “मैंने कोशिश की थी।”
“झूठ,” कोच में कई आवाजें एक साथ गूंजीं।
भूतिया यात्री उनकी ओर मुड़ गए।
“दरवाजे बंद थे…”
“बच्चे रो रहे थे…”
“तुम भाग गए…”
“तुमने लालटेन फेंक दी…”
जले हुए गार्ड की आंखें जलने लगीं। “मैं जीना चाहता था।”
शंभूनाथ ने सिर झुका लिया। “और वे?”
गार्ड ने कोई जवाब नहीं दिया।
तभी ट्रेन की सीटी बजी। दरवाजे बंद होने लगे। लेकिन भूतिया यात्री अब भी अंदर थे। ट्रेन धीरे-धीरे चल पड़ी।
काव्या ने खिड़की से बाहर देखा। रुद्रघाट हॉल्ट पीछे नहीं छूट रहा था। ट्रेन चल रही थी, फिर भी स्टेशन वहीं का वहीं था। जैसे वे किसी गोल चक्र में फंस गए हों।
लाउडस्पीकर से आवाज आई—
“अगला स्टेशन… अंतिम डिब्बा…”
किसी ने हंसी।
काव्या ने शंभूनाथ से पूछा, “अंतिम डिब्बा क्या है?”
शंभूनाथ ने कहा, “पुरानी ट्रेन का आखिरी कोच। कहते हैं, हादसे में वही सबसे पहले जला था। जिनकी आत्माएं सबसे ज्यादा पीड़ा में थीं, वे वहीं फंसी हैं।”
कोच की लाइट फिर बुझी। जब रोशनी लौटी, तो S3 कोच बदल चुका था।
सीटें पुरानी लकड़ी की थीं। पंखे गायब थे। खिड़कियों पर लोहे की सलाखें थीं। लोगों के कपड़े भी बदलते दिख रहे थे। कुछ यात्रियों के चेहरे धुंधले होने लगे। जैसे वर्तमान धीरे-धीरे अतीत में बदल रहा हो।
काव्या ने अपनी कलाई पर बंधी घड़ी देखी। सुइयां उल्टी दिशा में घूम रही थीं।
ट्रेन के भीतर एक बच्ची की आवाज गूंजी—
“किसी ने दरवाजा क्यों नहीं खोला?”
काव्या ने सामने देखा। स्कूल यूनिफॉर्म पहने एक छोटी लड़की खड़ी थी। उसके बालों में लाल रिबन था। उसके चेहरे पर राख लगी थी।
इस बार शंभूनाथ ने खुद को रोक नहीं पाया।
“बेटी…” उन्होंने कहा।
काव्या चिल्लाई, “जवाब मत दीजिए!”
लेकिन देर हो चुकी थी।
लड़की मुस्कुराई। “आपने जवाब दिया।”
धुंध शंभूनाथ के पैरों से लिपटने लगी। जला हुआ गार्ड हंसने लगा। “अब तू भी यहीं रहेगा, मेरे बेटे। पाप का खून पाप में लौटता है।”
शंभूनाथ ने पहली बार डर की जगह दृढ़ता दिखाई। उन्होंने अपनी पीतल की घड़ी काव्या को थमा दी।
“मेरे पिता ने गलती की। मैंने जिंदगी भर उससे भागकर दूसरी गलती की। इस घड़ी में उनका पुराना गार्ड लॉग छिपा है। उसमें असली हादसे का रिकॉर्ड है। अगर तू बच गई, तो सच बाहर लाना।”
काव्या ने घड़ी खोली। अंदर एक छोटा-सा मुड़ा हुआ कागज था। उस पर हादसे की रात के असली नाम, समय, आदेश और गार्ड की लिखावट थी।
“दरवाजे बंद रखने का आदेश गलत था। यात्रियों को बचाया जा सकता था।”
काव्या का दिल भर आया। “लेकिन हम बचेंगे कैसे?”
शंभूनाथ ने खड़े होते हुए कहा, “जिस स्टेशन को रिकॉर्ड से मिटाया गया, उसे नाम वापस चाहिए। जिन यात्रियों को गिना नहीं गया, उन्हें स्वीकार किया जाना चाहिए।”
वह कोच के बीच में खड़े हुए और ऊंची आवाज में बोले—
“मैं शंभूनाथ, उस गार्ड का बेटा, स्वीकार करता हूं कि रुद्रघाट हादसे को छिपाया गया। जिन लोगों को मरा हुआ भी दर्ज नहीं किया गया, वे इंसान थे। उनके नाम थे। उनके घर थे। उनका दर्द था।”
भूतिया यात्री शांत होने लगे।
जला हुआ गार्ड गुर्राया। “चुप रह! सच हमें मुक्त नहीं करेगा, हमें दोषी बना देगा!”
शंभूनाथ ने उसकी ओर देखा। “दोष से भागना ही हमें इस रात में बांधकर रखता है।”
काव्या ने घड़ी से कागज निकाला और नाम पढ़ने शुरू किए।
“सरला देवी… मोहनलाल… इमरान अली… राधा… गोपाल… चंद्रकांत… सुशीला… अज्ञात बालक नहीं—नाम विनय…”
हर नाम के साथ एक भूतिया चेहरा रोशनी में बदलने लगा। कुछ यात्रियों की आंखों से काली राख बहने लगी। वे जैसे वर्षों बाद पहली बार अपने नाम सुन रहे थे।
ट्रेन कांपने लगी।
जला हुआ गार्ड चीखा, “नहीं! अगर ये मुक्त हो गए तो मैं अकेला रह जाऊंगा!”
काव्या ने अगला नाम पढ़ा।
“मीना, उम्र आठ वर्ष…”
लाल रिबन वाली बच्ची आगे आई। उसके चेहरे से राख हटने लगी। उसने धीरे से पूछा, “मेरा नाम सच में लिखा था?”
काव्या की आंखें भर आईं। “हाँ, मीना। तुम किसी फाइल की गलती नहीं थीं। तुम यात्री थीं। तुम इंसान थीं।”
बच्ची मुस्कुराई।
उसी पल कोच का बंद दरवाजा खुल गया।
बाहर वही रुद्रघाट हॉल्ट था, लेकिन अब धुंध में सफेद रोशनी फैल रही थी। प्लेटफॉर्म पर खड़े मृत यात्री धीरे-धीरे उतरने लगे। कोई रो रहा था, कोई अपने प्रियजनों को ढूंढ रहा था, कोई बस आसमान की ओर देख रहा था।
लेकिन जला हुआ गार्ड शंभूनाथ को पकड़ चुका था।
“तू मेरे साथ रहेगा,” वह गरजा। “खून का हिसाब खून से होगा।”
शंभूनाथ ने काव्या की तरफ देखा। “जाओ।”
“नहीं!” काव्या चिल्लाई।
“सच बाहर ले जाओ,” उन्होंने कहा। “वरना यह स्टेशन फिर लौटेगा।”
काव्या ने दरवाजे की तरफ भागना चाहा, पर एक भूतिया यात्री ने उसका रास्ता रोक लिया। वह बुजुर्ग औरत थी, जिसने पहले बच्चे के लिए जगह मांगी थी। इस बार उसके चेहरे पर क्रोध नहीं, करुणा थी।
“तू जीवित है,” उसने कहा। “जीवित लोग ही इतिहास बदल सकते हैं।”
उसने काव्या को धक्का दिया।
काव्या वर्तमान वाली ट्रेन के S3 कोच में वापस गिर पड़ी।
लाइटें जल उठीं। बारिश फिर खिड़की पर पड़ रही थी। यात्री घबराए हुए थे। कुछ सीटें खाली थीं। जिन लोगों ने टिकट छुआ था या जवाब दिया था, वे लौटे नहीं थे।
ट्रेन तेज गति से जंगल से बाहर निकल रही थी।
काव्या ने खिड़की से पीछे देखा। दूर अंधेरे में रुद्रघाट हॉल्ट कुछ पल के लिए दिखाई दिया। प्लेटफॉर्म पर शंभूनाथ खड़े थे। उनके पास लाल रिबन वाली बच्ची थी। वे काव्या को देख रहे थे।
फिर स्टेशन अंधेरे में डूब गया।
सुबह ट्रेन अमृतपुर पहुंची। रेलवे अधिकारियों ने कहा कि ट्रेन तकनीकी खराबी के कारण कुछ देर रुकी थी। उन्होंने रुद्रघाट हॉल्ट का नाम सुनकर हंस दिया। “ऐसा कोई स्टेशन इस लाइन पर नहीं है,” उन्होंने कहा।
लेकिन काव्या के पास सबूत था।
शंभूनाथ की पीतल की घड़ी। उसके अंदर छिपा असली गार्ड लॉग। और उसके कैमरे में रिकॉर्ड हुई कुछ धुंधली फुटेज—पीली बत्तियां, पुराना बोर्ड, और ट्रेन में चढ़ते वे यात्री जिनके पैर जमीन को छू नहीं रहे थे।
काव्या ने महीनों तक पुराने दस्तावेज खंगाले। उसने गायब नाम ढूंढे। उसने अखबारों की पुरानी कटिंग निकालीं। उसने उन परिवारों को खोजा जिनके पूर्वज कभी “लापता” घोषित कर दिए गए थे। आखिरकार उसकी रिपोर्ट छपी—
“रुद्रघाट हॉल्ट हादसा: चालीस साल बाद सामने आए छिपाए गए नाम”
देश भर में हलचल मच गई। रेलवे ने जांच बैठाई। पुराने रिकॉर्ड सुधारे गए। रुद्रघाट के मृत यात्रियों की याद में स्मारक बनाने की घोषणा हुई।
कुछ महीनों बाद काव्या फिर कालवन जंगल गई। दिन का समय था। रेलवे अधिकारी, गांव वाले और कुछ परिवार उसके साथ थे। जहां पुराना स्टेशन होना चाहिए था, वहां सिर्फ झाड़ियां थीं। लेकिन जब मजदूरों ने जमीन साफ की, तो नीचे जंग लगा बोर्ड मिला—
“रुद्रघाट हॉल्ट”
स्मारक बनाया गया। नाम पत्थर पर लिखे गए। हर नाम साफ। हर उम्र साफ। हर पहचान साफ।
काव्या ने सबसे नीचे एक अलग पंक्ति लिखवाई—
“उन लोगों की स्मृति में, जिन्हें इतिहास ने भुलाया, पर रात ने नहीं।”
उस रात पहली बार कालवन जंगल में ट्रेन की कोई भूतिया सीटी नहीं सुनाई दी।
लोगों ने कहा कि आत्माएं मुक्त हो गईं।
काव्या भी यही मानना चाहती थी।
लेकिन कहानी पूरी तरह खत्म नहीं हुई।
साल भर बाद, बरसात की एक और रात, एक मालगाड़ी उसी जंगल से गुजरी। ड्राइवर ने कंट्रोल रूम को घबराई आवाज में संदेश भेजा—
“साहब… आगे स्टेशन दिख रहा है। रूट मैप में नहीं है। प्लेटफॉर्म पर एक बूढ़ा गार्ड खड़ा है। उसके हाथ में लालटेन है।”
कंट्रोल रूम ने कहा, “लाइन साफ है। कोई स्टेशन नहीं है।”
ड्राइवर ने कुछ सेकंड बाद फुसफुसाकर कहा—
“वह मुझे रुकने का इशारा कर रहा है।”
उस रात मालगाड़ी समय पर रोक दी गई।
आगे पुल के पास पटरी टूटी हुई थी।
सैकड़ों लोगों की जान बच गई।
जब अधिकारी सुबह वहां पहुंचे, तो लाइन के किनारे मिट्टी में पीतल की पुरानी घड़ी पड़ी मिली। घड़ी बंद थी। उसकी सुइयां 12 बजकर 03 मिनट पर अटकी थीं।
और उसके पीछे खरोंचकर लिखा था—
“इस बार दरवाजा खोल दिया।”
काव्या ने जब यह सुना, तो वह देर तक चुप रही। उसे समझ आ गया कि रुद्रघाट हॉल्ट अब डर का स्टेशन नहीं रहा।
वह चेतावनी बन चुका था।
कभी-कभी आधी रात को कालवन जंगल से गुजरने वाले लोग अब भी दूर पीली रोशनी देखते हैं। कुछ कहते हैं, प्लेटफॉर्म पर यात्री खड़े होते हैं। कुछ कहते हैं, लालटेन लिए एक बूढ़ा गार्ड रास्ता दिखाता है। और कुछ ड्राइवर शपथ लेकर कहते हैं कि जब भी पटरियों पर खतरा होता है, जंगल से एक धीमी आवाज आती है—
“रुको…”
जो डरकर नहीं, समझकर रुक जाता है, वह बच जाता है।
और जो उस आवाज का मजाक उड़ाता है, उसे आधी रात की ट्रेन अपने साथ ले जाती है।
क्योंकि शैतान के जंगल से गुजरती हर ट्रेन सिर्फ मंजिल तक नहीं जाती।
कभी-कभी वह इतिहास के उस प्लेटफॉर्म से भी गुजरती है—
जहां भूले हुए नाम अब भी न्याय का इंतजार करते हैं।