दुल्हन के लाल जोड़े में छिपा था बीस साल पुराना खून

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दुल्हन के लाल जोड़े में छिपा था बीस साल पुराना खूनमेरी डिजिटल कॉपी ने मेरी जिंदगी छीन ली

शादी से ठीक एक रात पहले जब इरा ने पुश्तैनी लाल जोड़ा पहना, उसकी दादी ने उसके हाथ से आईना छीन लिया।

“इसे अभी उतार दो,” दादी कांपती आवाज में बोलीं।

इरा ने मुस्कराते हुए कहा, “दादी, आप ही तो कहती थीं कि हमारे परिवार की हर बड़ी बहू इसी जोड़े में विदा हुई है।”

“हर बहू नहीं,” दादी ने उसकी आंखों में देखते हुए कहा, “केवल वे, जिनकी किस्मत ने उनसे कुछ छीनना था।”

कमरे में अचानक सन्नाटा फैल गया।

चारों ओर शादी की तैयारियां चल रही थीं। नीचे आंगन में हल्दी के गीत गाए जा रहे थे। रसोई से घी, इलायची और पकवानों की सुगंध आ रही थी। रिश्तेदार हंसते हुए एक-दूसरे को आवाज दे रहे थे।

लेकिन ऊपरी मंजिल के पुराने कमरे में हवा भारी हो गई थी।

इरा ने लाल जोड़े के घाघरे को दोनों हाथों से फैलाकर देखा। कपड़ा गहरे सुर्ख रंग का था। उसके किनारों पर सोने के तार से बेल-बूटे बने थे। घूंघट के बीच छोटी-छोटी चांदी की बूंदें जड़ी थीं।

वह जोड़ा सुंदर था, लेकिन उसे पहनते ही इरा को अजीब बेचैनी महसूस हुई थी।

सीने के पास कपड़ा असामान्य रूप से ठंडा था।

और घाघरे के निचले हिस्से से हल्की-सी लोहे जैसी गंध आ रही थी।

इरा ने दादी से पूछा, “आप डर क्यों रही हैं?”

दादी ने कमरे का दरवाजा भीतर से बंद किया और धीरे से बोलीं, “यह जोड़ा बीस वर्ष पहले तुम्हारी बुआ रागिनी ने पहना था।”

“पापा की बड़ी बहन?”

परिवार में रागिनी बुआ का नाम बहुत कम लिया जाता था। इरा ने बचपन में केवल इतना सुना था कि शादी के कुछ दिनों बाद उनकी मृत्यु हो गई थी।

“सब कहते हैं उनकी तबीयत अचानक बिगड़ गई थी,” इरा ने कहा।

दादी की आंखों में आंसू भर आए।

“परिवार में बहुत कुछ कहा जाता है। सब सच नहीं होता।”

इससे पहले कि इरा कुछ और पूछती, दरवाजे पर जोर की दस्तक हुई।

“इरा! जल्दी नीचे आओ,” उसकी मां मालती ने कहा। “मेहंदी वाले इंतजार कर रहे हैं।”

दादी ने तुरंत अपने आंसू पोंछे।

“यह जोड़ा उतार दो।”

इरा ने पूछा, “लेकिन कल शादी में मुझे यही पहनना है।”

दादी ने धीमे स्वर में कहा, “कल तक बहुत कुछ बदल सकता है।”

पुश्तैनी हवेली की शादी
इरा की शादी शहर के प्रसिद्ध व्यवसायी परिवार के बेटे विवान सिंह से होने वाली थी। दोनों की मुलाकात एक वास्तुकला परियोजना के दौरान हुई थी।

इरा पुराने भवनों का संरक्षण करने वाली वास्तुकार थी और विवान एक निर्माण कंपनी संभालता था। परिवारों की सहमति से पहले ही दोनों एक-दूसरे को पसंद करने लगे थे।

विवान शांत, संवेदनशील और स्पष्ट स्वभाव का था। उसने इरा से कहा था, “मैं तुम्हें अपने परिवार के हिसाब से बदलना नहीं चाहता।”

इरा ने हंसते हुए उत्तर दिया था, “यह बात शादी के बाद याद रखना।”

विवाह इरा की पुश्तैनी हवेली में रखा गया था। यह हवेली लगभग डेढ़ सौ वर्ष पुरानी थी। मोटी दीवारें, नक्काशीदार खिड़कियां, विशाल आंगन और भीतर कई बंद कमरे थे।

इरा के पिता राजेंद्र प्रताप परिवार के मुखिया थे। गांव और आसपास के क्षेत्र में उनका बहुत सम्मान था।

उनके छोटे भाई महेंद्र परिवार का जमीन और खेती का काम देखते थे। महेंद्र की पत्नी सुशीला हर समय घर की प्रतिष्ठा और रीति-रिवाजों की बात करती थीं।

रागिनी बुआ की मृत्यु के बाद परिवार ने उनका नाम लेना लगभग बंद कर दिया था। हवेली की तीसरी मंजिल का वह कमरा भी बंद था, जहां वे शादी से पहले रहती थीं।

इरा ने कई बार उस कमरे के बारे में पूछा था, लेकिन हर बार उसे बताया जाता कि वहां पुराना सामान रखा है।

मेहंदी की रस्म के दौरान इरा बार-बार दादी की ओर देखती रही। दादी चुपचाप एक कोने में बैठी थीं। उनकी नजरें पुश्तैनी लाल जोड़े वाले संदूक पर टिकी थीं।

वह जोड़ा परिवार की परंपरा माना जाता था। कहा जाता था कि लगभग सौ वर्ष पहले एक राजघराने की बेटी उसे अपने साथ लाई थी। समय-समय पर उसमें सुधार और नई कढ़ाई होती रही, लेकिन मूल कपड़ा वही था।

रात को सभी रिश्तेदार सो गए तो इरा ने लाल जोड़ा फिर बाहर निकाला।

उसने घाघरे का अंदरूनी हिस्सा ध्यान से देखा।

कपड़े के एक कोने पर गहरे भूरे रंग का धब्बा था। ऊपर से लाल धागे की भारी कढ़ाई करके उसे छिपाया गया था।

इरा ने फोन की रोशनी पास लाकर देखा।

धब्बे के किनारे काले पड़ चुके थे।

वह साधारण रंग नहीं था।

वह पुराने खून जैसा दिख रहा था।

इरा ने उंगली से कढ़ाई को छुआ। उसी क्षण उसके कान के पास किसी महिला की फुसफुसाहट सुनाई दी—

“मेरा जोड़ा लौटा दो…”

इरा ने डरकर पीछे देखा।

कमरे में कोई नहीं था।

उसने सोचा कि शायद तनाव के कारण उसे भ्रम हुआ है। तभी आईने में उसे अपने पीछे लाल जोड़े में एक दूसरी दुल्हन दिखाई दी।

उसका चेहरा घूंघट से ढका था।

इरा तेजी से मुड़ी।

वहां कोई नहीं था।

दोबारा आईने की ओर देखा तो लाल दुल्हन गायब थी।

लेकिन आईने पर भीतर से किसी ने उंगली फेरकर लिखा था—

“मैं गिरी नहीं थी।”

रागिनी बुआ की अधूरी शादी
इरा तुरंत दादी के कमरे में पहुंची।

दादी सोई नहीं थीं। ऐसा लग रहा था जैसे वे उसी का इंतजार कर रही हों।

“आईने पर लिखा था कि वह गिरी नहीं थीं,” इरा ने कहा।

दादी का चेहरा सफेद पड़ गया।

“तुमने उसे देखा?”

“किसे?”

“रागिनी को।”

इरा उनके सामने बैठ गई।

“अब आप मुझे पूरा सच बताएंगी।”

दादी कुछ देर चुप रहीं। फिर उन्होंने संदूक से एक पुराना फोटो एल्बम निकाला।

एक तस्वीर में लाल जोड़े पहने बहुत सुंदर युवती खड़ी थी। उसके चेहरे की बनावट इरा जैसी थी। बड़ी आंखें, लंबा चेहरा और माथे पर छोटी बिंदी।

“यह रागिनी है,” दादी ने कहा।

“इनकी मृत्यु कैसे हुई?”

“शादी के तीन दिन बाद हवेली की छत से गिरकर।”

“लेकिन आपने कहा था…”

“वह दुर्घटना नहीं थी।”

इरा का दिल तेज धड़कने लगा।

दादी ने बताया कि रागिनी की शादी पास के जमींदार परिवार के बेटे देवेंद्र से तय हुई थी। परिवार प्रसन्न था, लेकिन शादी से कुछ दिन पहले रागिनी ने विवाह से इनकार करना शुरू कर दिया।

उसे पता चल गया था कि देवेंद्र अवैध हथियारों और जमीन हड़पने वाले गिरोह से जुड़ा था। इस काम में इरा के चाचा महेंद्र और कुछ स्थानीय अधिकारी भी शामिल थे।

“महेंद्र चाचा?” इरा ने अविश्वास से पूछा।

दादी ने सिर झुका लिया।

“तुम्हारे चाचा तब जवान थे। उन्हें धन और प्रभाव चाहिए था। रागिनी ने उन्हें देवेंद्र के साथ बात करते सुन लिया था।”

रागिनी ने प्रमाण इकट्ठे किए। उसने अपने कैमरे से कुछ तस्वीरें लीं और एक लेख स्थानीय पत्रकार आलोक मिश्रा को भेजने की योजना बनाई।

आलोक रागिनी का बचपन का मित्र था।

“क्या वे दोनों एक-दूसरे से प्रेम करते थे?” इरा ने पूछा।

दादी की आंखों में पीड़ा उतर आई।

“रागिनी उससे प्रेम करती थी। लेकिन परिवार की इज्जत के नाम पर उसकी शादी देवेंद्र से तय कर दी गई।”

“फिर शादी हुई?”

“हुई। क्योंकि तुम्हारे दादा ने उसकी बात नहीं मानी। उन्होंने कहा कि लड़की के डर के कारण इतने बड़े रिश्ते को नहीं तोड़ा जा सकता।”

शादी के दिन रागिनी ने यही लाल जोड़ा पहना था। उसने दादी से कहा था कि जोड़े की कढ़ाई के भीतर उसने कुछ प्रमाण छिपाए हैं। अगर उसके साथ कुछ हो जाए तो जोड़ा आलोक तक पहुंचा दिया जाए।

लेकिन शादी के तीसरे दिन रात को हवेली की छत से गिरकर उसकी मृत्यु हो गई।

“क्या वह देवेंद्र के घर से यहां आई थीं?”

“हां। परिवार ने कहा था कि वह रस्म के लिए मायके आई थी। रात को वह छत पर गई और गिर गई।”

“किसी ने जांच नहीं की?”

“परिवार ने आत्महत्या बताया। पुलिस ने भी वही लिख दिया।”

“और जोड़े में छिपे प्रमाण?”

दादी ने कांपते स्वर में कहा, “मुझे जोड़ा मिला ही नहीं। महेंद्र ने कहा कि खून लगने के कारण उसे जला दिया गया।”

इरा ने कहा, “लेकिन जोड़ा तो हमारे पास है।”

दादी ने उसकी ओर देखा।

“तभी मुझे समझ आया कि उसने झूठ बोला था। उसने जोड़ा छिपा दिया और वर्षों बाद परंपरा के नाम पर फिर संदूक में रख दिया।”

“क्यों?”

“शायद उसे लगा प्रमाण नष्ट हो चुके हैं।”

इरा ने जोड़े पर बने खून के धब्बे की बात बताई।

दादी ने तुरंत कहा, “कल यह जोड़ा मत पहनना। महेंद्र को पता चला कि तुम्हें कुछ मिल गया है, तो वह…”

दादी वाक्य पूरा नहीं कर पाईं।

कमरे के बाहर लकड़ी का फर्श चरमराया।

कोई उनकी बातें सुन रहा था।

बंद कमरे में मिला प्रेमपत्र
इरा दरवाजा खोलकर बाहर निकली। गलियारा खाली था। दूर सीढ़ियों के पास सफेद कुर्ते की हल्की झलक दिखाई दी।

उसे लगा वह महेंद्र चाचा थे।

अगली सुबह शादी की तैयारियों के बीच इरा ने विवान को हवेली के पीछे बुलाया।

“मुझे तुम्हारी सहायता चाहिए,” उसने कहा।

विवान ने उसके चेहरे की चिंता देखकर पूछा, “क्या तुम शादी नहीं करना चाहती?”

“शादी करना चाहती हूं। लेकिन संभव है कि हमारी शादी से पहले परिवार में हत्या का सच सामने आ जाए।”

विवान ने कुछ क्षण उसे देखा।

“शुरू से बताओ।”

इरा ने पूरी बात बताई। उसे डर था कि विवान इसे अंधविश्वास समझेगा, लेकिन उसने ध्यान से सब सुना।

“हम पुलिस के पास जा सकते हैं,” विवान ने कहा।

“बीस वर्ष पुराना आरोप है। हमारे पास अभी केवल दादी की बात और कपड़े पर धब्बा है।”

“जोड़े की वैज्ञानिक जांच हो सकती है।”

“चाचा उसे हमसे छीन सकते हैं।”

विवान ने कहा, “पहले पता लगाते हैं कि रागिनी बुआ ने प्रमाण कहां छिपाए थे।”

इरा को बंद कमरे का ध्यान आया।

दोनों तीसरी मंजिल पर पहुंचे। कमरे के बाहर पुराना ताला लगा था। विवान ने औजार से उसे खोल दिया।

दरवाजा खुलते ही धूल भरी हवा बाहर आई।

कमरे में पुराना पलंग, लकड़ी की अलमारी, टूटा आईना और दीवार पर सूखे फूलों की माला लटकी थी।

ऐसा लगता था जैसे रागिनी के जाने के बाद किसी ने कमरे को छुआ तक नहीं।

इरा ने अलमारी खोली। उसमें कुछ किताबें, कपड़े और अधूरे पत्र थे।

एक पत्र आलोक के नाम था।

आलोक,

मैं डरती हूं कि मेरे पास समय कम है। देवेंद्र और महेंद्र केवल जमीन का व्यापार नहीं कर रहे। वे उन किसानों को धमकाते हैं जो जमीन देने से मना करते हैं। पिछले महीने हरिया काका गायब नहीं हुए थे। मैंने उन्हें पुराने गोदाम में मृत देखा था।

मेरे पास कुछ तस्वीरें हैं। मैं उन्हें अपने शादी के जोड़े में छिपा रही हूं। घाघरे के तीसरे सुनहरे फूल के नीचे कपड़े की दो परतें हैं।

अगर मैं तुम तक न पहुंच सकूं तो समझना कि उन्होंने मुझे रोक दिया।

तुमसे प्रेम करना मेरी गलती नहीं थी। तुम्हारे साथ भाग न पाना मेरी कमजोरी थी।

—रागिनी

इरा ने पत्र विवान को दिया।

“हरिया काका की हत्या,” विवान बोला। “तो मामला केवल रागिनी बुआ की मौत का नहीं है।”

इरा ने कमरे में चारों ओर देखा। उसे अचानक वही फुसफुसाहट सुनाई दी—

“तीसरा फूल…”

वह मुड़ी। टूटा आईना हल्का-सा कांप रहा था।

आईने में रागिनी दिखाई दी। इस बार उसका घूंघट उठा हुआ था। माथे पर चोट थी और होंठों से खून बह रहा था।

उसने आईने के भीतर से जोड़े की ओर संकेत किया।

फिर दृश्य गायब हो गया।

लाल जोड़े की सिलाई
इरा और विवान ने कमरे का दरवाजा बंद किया और पुश्तैनी जोड़ा भीतर ले आए।

घाघरे पर दर्जनों सुनहरे फूल बने थे। उन्होंने किनारे से गिनना शुरू किया।

तीसरे फूल की कढ़ाई अन्य फूलों से थोड़ी मोटी थी।

विवान ने सावधानी से कुछ टांके काटे।

कपड़े की दो परतों के बीच प्लास्टिक जैसा कठोर हिस्सा दिखाई दिया। उसमें तीन छोटी तस्वीरें और एक पुरानी फिल्म की पट्टी थी।

पहली तस्वीर में महेंद्र और देवेंद्र पुराने गोदाम के बाहर खड़े थे। उनके पास कुछ हथियार रखे थे।

दूसरी तस्वीर में एक आदमी जमीन पर पड़ा था। चेहरा हरिया काका का था, जिन्हें परिवार ने वर्षों पहले गांव छोड़कर चले जाने वाला बताया था।

तीसरी तस्वीर सबसे भयानक थी।

उसमें हवेली की छत पर रागिनी, महेंद्र और देवेंद्र दिखाई दे रहे थे। तस्वीर शायद किसी स्वचालित कैमरे से ली गई थी। महेंद्र ने रागिनी की बांह पकड़ रखी थी और देवेंद्र उसके सामने खड़ा था।

तस्वीर के कोने में तारीख थी—रागिनी की मृत्यु वाली रात।

इरा ने कहा, “लेकिन यह तस्वीर किसने ली?”

विवान ने फिल्म की पट्टी रोशनी में देखी। उसमें लगातार कई दृश्य थे। संभव है रागिनी ने कैमरा पहले से छिपाकर रखा हो।

एक फ्रेम में देवेंद्र उसे धक्का देता दिखाई दिया।

दूसरे में महेंद्र जोड़ा खींच रहा था।

अंतिम फ्रेम में रागिनी छत के किनारे से गिरती दिखाई दी।

इरा के हाथ कांपने लगे।

“उन्होंने उन्हें मार दिया।”

विवान ने तस्वीरें अपने फोन में सुरक्षित कर लीं।

उसी समय कमरे का दरवाजा बाहर से बंद हो गया।

महेंद्र की आवाज आई—

“इरा, तुम्हें शादी की तैयारी करनी चाहिए थी। मरे हुए लोगों की कहानियां नहीं खोजनी चाहिए थीं।”

इरा ने दरवाजा खोलने की कोशिश की।

“चाचा, दरवाजा खोलिए।”

महेंद्र हंसा।

“तुम्हारी बुआ भी यही गलती कर बैठी थी। उसे लगा था कुछ तस्वीरों से पूरा परिवार मिटा देगी।”

विवान ने खिड़की देखी। वह तीसरी मंजिल पर थी और नीचे पत्थर का आंगन था।

कमरे के बाहर से धुआं भीतर आने लगा।

महेंद्र ने कमरे में आग लगा दी थी।

शादी के दिन उठता धुआं
नीचे आंगन में संगीत बज रहा था। किसी को पता नहीं था कि तीसरी मंजिल के बंद कमरे में आग फैल रही है।

विवान ने लकड़ी की कुर्सी से दरवाजा तोड़ने की कोशिश की। पुरानी लकड़ी मजबूत थी।

इरा की आंखों में धुएं से पानी आने लगा।

“हम यहां से नहीं निकल पाएंगे,” उसने कहा।

“हम निकलेंगे।”

विवान ने खिड़की के बाहर देखा। पास में बरगद की मोटी शाखा दीवार तक आई हुई थी।

“तुम शाखा तक पहुंच सकती हो?”

“नीचे बहुत ऊंचाई है।”

“मैं पहले जाऊंगा।”

तभी कमरे की अलमारी अपने आप खिसक गई।

उसके पीछे एक संकरा लकड़ी का दरवाजा दिखाई दिया।

इरा ने आश्चर्य से कहा, “यह पहले नहीं था।”

दरवाजा खुला और भीतर अंधेरी सीढ़ियां दिखाई दीं।

सीढ़ियों के ऊपर लाल जोड़े में रागिनी की परछाईं खड़ी थी।

उसने धीरे से कहा, “जल्दी…”

इरा और विवान गुप्त सीढ़ियों से नीचे उतर गए। रास्ता हवेली के पुराने पूजा-कक्ष में खुला।

जैसे ही वे बाहर आए, ऊपर की मंजिल से आग की लपटें उठने लगीं।

लोगों में अफरा-तफरी मच गई।

महेंद्र भीड़ में खड़ा चिल्ला रहा था, “शायद बिजली के तार से आग लगी है!”

इरा लाल जोड़ा हाथ में लिए आंगन के बीच पहुंची।

उसने ऊंची आवाज में कहा, “आग बिजली से नहीं लगी। मेरे चाचा ने लगाई है।”

सभी रिश्तेदार चुप हो गए।

राजेंद्र प्रताप ने कठोर स्वर में कहा, “इरा, शादी के दिन यह कैसी बात कर रही हो?”

इरा ने तस्वीरें उनके सामने रखीं।

“यह रागिनी बुआ की मृत्यु का सच है।”

महेंद्र ने तस्वीरें छीनने की कोशिश की, लेकिन विवान उसके सामने आ गया।

“हमने प्रतियां सुरक्षित कर ली हैं।”

महेंद्र ने कहा, “ये नकली तस्वीरें हैं। आजकल कुछ भी बनाया जा सकता है।”

दादी आगे आईं।

“तस्वीरें झूठी नहीं हैं।”

राजेंद्र ने अपनी मां की ओर देखा।

दादी बोलीं, “मैं बीस वर्ष से चुप हूं। मेरी चुप्पी ने मेरी बेटी को न्याय से दूर रखा। अब मैं नहीं डरूंगी।”

उन्होंने सबके सामने बताया कि रागिनी को कैसे धमकाया गया था और मृत्यु से पहले उसने महेंद्र और देवेंद्र का नाम लिया था।

महेंद्र का चेहरा बदल गया।

“आपकी उम्र हो गई है, मां। आपको भ्रम हो रहा है।”

दादी ने उसे थप्पड़ मार दिया।

“भ्रम मुझे नहीं, तुम्हें था कि खून को लाल कपड़े में छिपाकर अपराध मिट जाएगा।”

दूल्हे का गायब होना
हवेली में पुलिस बुला ली गई। लेकिन तभी पता चला कि विवाह के लिए आया दूल्हा विवान कहीं दिखाई नहीं दे रहा था।

इरा ने सोचा वह पुलिस से बात करने गया होगा। उसका फोन भी बंद था।

कुछ देर बाद इरा के मोबाइल पर अनजान नंबर से संदेश आया—

“अगर अपने दूल्हे को जीवित देखना चाहती हो, तो तस्वीरें लेकर पुराने गोदाम पहुंचो। अकेली।”

संदेश के साथ विवान की तस्वीर थी। उसके हाथ बंधे थे और माथे से खून बह रहा था।

इरा समझ गई कि महेंद्र अकेला नहीं था।

देवेंद्र अब भी जीवित था।

रागिनी की हत्या के कुछ वर्षों बाद देवेंद्र विदेश चला गया था। परिवार में बताया गया था कि उसने वहीं नया जीवन बना लिया। लेकिन संभव है वह गुप्त रूप से वापस आ चुका था।

इरा ने पुलिस को बताए बिना जाने का निर्णय नहीं किया। उसने अधिकारी को संदेश दिखाया। योजना बनाई गई कि वह अकेली दिखाई देगी, जबकि पुलिस दूर से निगरानी करेगी।

दादी ने लाल जोड़ा उसके हाथ में दिया।

“इसे पहनकर मत जाओ।”

इरा ने कहा, “आज यह जोड़ा डर का प्रतीक नहीं रहेगा।”

उसने वही लाल जोड़ा पहना।

लेकिन इस बार वह दुल्हन बनने के लिए नहीं, बीस वर्ष पुराने अपराध का अंत करने जा रही थी।

पुराने गोदाम में दूसरी दुल्हन
गोदाम गांव से बाहर सूखे खेतों के पास था। वर्षों पहले वहां अनाज रखा जाता था। अब उसकी छत टूट चुकी थी।

इरा अंदर पहुंची तो विवान कुर्सी से बंधा दिखाई दिया।

उसके पीछे पिस्तौल लिए एक वृद्ध आदमी खड़ा था।

वह देवेंद्र था।

चेहरे पर उम्र के निशान थे, लेकिन रागिनी की तस्वीरों से उसकी पहचान साफ थी।

महेंद्र भी वहां पहुंच चुका था। वह पुलिस से पूछताछ से बचकर पीछे के रास्ते भाग आया था।

देवेंद्र ने कहा, “जोड़ा जमीन पर रखो।”

इरा ने पूछा, “आपने रागिनी बुआ को क्यों मारा?”

“उसने अपना स्थान भूल गई थी।”

“उसका स्थान क्या था? आपकी पत्नी बनकर अपराध छिपाना?”

देवेंद्र की आंखों में क्रोध भर गया।

“उस समय परिवार की इज्जत सबसे बड़ी थी।”

इरा ने कहा, “आपने परिवार की इज्जत नहीं बचाई। आपने अपनी लालच बचाई।”

महेंद्र चिल्लाया, “बहुत बोल रही है। तस्वीरें दे।”

इरा ने जोड़ा नीचे रखा।

“मूल तस्वीरें इसमें नहीं हैं।”

देवेंद्र ने विवान की कनपटी पर पिस्तौल रख दी।

“तो अभी बताओ कहां हैं।”

विवान ने कहा, “इरा, इन्हें कुछ मत बताना।”

महेंद्र ने उसके चेहरे पर मुक्का मारा।

इरा की आंखों में आंसू आ गए, लेकिन उसने स्वयं को संभाला।

“पहले उसे छोड़िए।”

देवेंद्र हंसा।

“तुम भी रागिनी जैसी हो। उसे भी लगा था प्रेम उसे बचा लेगा।”

“नहीं,” इरा ने कहा, “प्रेम उसे नहीं बचा पाया, क्योंकि उसका अपना परिवार उसके विरुद्ध खड़ा था। लेकिन इस बार परिवार का अपराध छिपेगा नहीं।”

अचानक गोदाम का दरवाजा तेज हवा से बंद हो गया।

ऊपर लटका बल्ब झूलने लगा।

जमीन पर रखा लाल जोड़ा अपने आप फैल गया।

उस पर लगा पुराना खून गीला दिखाई देने लगा।

गोदाम में पायल की आवाज गूंजी।

देवेंद्र का चेहरा पीला पड़ गया।

“यह संभव नहीं…”

उसके पीछे लाल जोड़े में एक दुल्हन खड़ी थी।

रागिनी।

उसका चेहरा वैसा ही था जैसा मृत्यु की रात रहा होगा। माथे पर चोट, गर्दन पर उंगलियों के निशान और आंखों में वर्षों की पीड़ा।

महेंद्र डरकर पीछे हट गया।

“दीदी…”

रागिनी की आवाज चारों ओर से सुनाई दी—

“तुमने मुझे बहन कहने का अधिकार उसी रात खो दिया था।”

दीवारों पर दृश्य उभरने लगे।

रागिनी छत पर खड़ी थी। देवेंद्र उससे तस्वीरें मांग रहा था। महेंद्र उसका रास्ता रोक रहा था।

रागिनी कह रही थी, “मैं सबको बता दूंगी कि हरिया काका को तुमने मारा।”

देवेंद्र ने उसका गला पकड़ा।

महेंद्र ने कहा, “तस्वीरें दे दो, रागिनी। परिवार बर्बाद हो जाएगा।”

रागिनी ने उत्तर दिया, “अपराधी परिवार की इज्जत नहीं होते।”

फिर देवेंद्र ने उसे धक्का दिया।

वह छत से नीचे गिरी, लेकिन तुरंत नहीं मरी।

रागिनी आंगन में घायल पड़ी सहायता मांग रही थी।

महेंद्र उसके पास पहुंचा।

वह चाहती तो उसे अस्पताल ले जा सकता था।

लेकिन देवेंद्र ने कहा, “अगर यह बच गई तो हम सब जेल जाएंगे।”

महेंद्र ने अपनी बहन की नब्ज जांची और फिर उसके चेहरे पर लाल घूंघट डाल दिया।

वह उसे मरने के लिए छोड़ गया।

वर्तमान में महेंद्र जमीन पर गिरकर रोने लगा।

“मैं डर गया था, दीदी।”

रागिनी की आत्मा उसके सामने खड़ी थी।

“मैं भी डरी थी। लेकिन मैंने तुम्हें मरने के लिए नहीं छोड़ा होता।”

देवेंद्र ने घबराकर परछाईं पर गोली चला दी। गोली उसके आर-पार होकर महेंद्र के कंधे में लगी।

महेंद्र चीखकर गिर पड़ा।

इरा ने अवसर देखकर विवान की ओर दौड़ लगाई। उसने उसके हाथ खोलने शुरू किए।

देवेंद्र ने पिस्तौल इरा की ओर कर दी।

“तुम भी उसी के पास जाओगी।”

गोली चलने से पहले रागिनी की परछाईं उसके सामने आ गई।

देवेंद्र का हाथ अचानक मुड़ गया। पिस्तौल जमीन पर गिर गई।

गोदाम के बाहर पुलिस की गाड़ियां पहुंच गईं।

देवेंद्र भागने के लिए पीछे के दरवाजे की ओर दौड़ा, लेकिन फर्श का पुराना हिस्सा टूट गया। वह नीचे बने गहरे अनाज के गड्ढे में गिर गया।

वह घायल हुआ, लेकिन जीवित था।

पुलिस ने उसे बाहर निकालकर गिरफ्तार कर लिया।

महेंद्र ने भी उसी रात अपराध स्वीकार कर लिया।

लाल जोड़े की वैज्ञानिक जांच
जांच में जोड़े के खून का डीएनए रागिनी के सुरक्षित पुराने बालों के नमूने से मेल खा गया। फिल्म और तस्वीरों को विशेषज्ञों ने असली साबित किया।

पुराने गोदाम के नीचे खुदाई की गई तो हरिया काका का कंकाल मिला। उनके सिर पर चोट के निशान थे।

महेंद्र ने स्वीकार किया कि हरिया ने अवैध हथियारों का सामान देख लिया था। देवेंद्र ने उन्हें मार दिया और शव गोदाम में दबा दिया।

रागिनी ने घटना की तस्वीरें ले ली थीं। इसी कारण उसकी हत्या की गई।

पुलिस के कुछ सेवानिवृत्त अधिकारियों के विरुद्ध भी जांच शुरू हुई, जिन्होंने धन लेकर आत्महत्या की झूठी रिपोर्ट बनाई थी।

रागिनी की मृत्यु के प्रमाणपत्र में पहली बार कारण बदला गया—

हत्या।

दादी ने नई रिपोर्ट हाथ में लेकर कहा, “बीस वर्ष बाद मेरी बेटी को उसका सच मिला।”

इरा के पिता राजेंद्र टूट चुके थे।

उन्होंने स्वीकार किया कि रागिनी ने शादी से पहले उनसे सहायता मांगी थी, लेकिन उन्होंने परिवार की प्रतिष्ठा और रिश्ते के दबाव में उसकी बात नहीं मानी।

“मैंने उसे मारा नहीं,” उन्होंने रोते हुए कहा, “लेकिन मेरी चुप्पी ने हत्यारों को साहस दिया।”

इरा ने कहा, “सच देर से स्वीकार करना भी जरूरी है, पापा। लेकिन इससे पहले की गलती मिटती नहीं। हमें उसे याद रखकर बदलना होगा।”

अधूरी शादी
मर्डर केस सामने आने के कारण इरा और विवान की शादी रोक दी गई थी।

कई रिश्तेदारों ने कहा कि इतने बड़े अपशकुन के बाद कुछ महीनों तक विवाह नहीं होना चाहिए।

दादी ने पहली बार परिवार की परंपराओं के विरुद्ध आवाज उठाई।

“अपशकुन विवाह नहीं था। अपशकुन हमारी बीस वर्ष की चुप्पी थी।”

एक सप्ताह बाद इरा और विवान ने उसी हवेली के आंगन में सादगी से विवाह करने का निर्णय लिया।

इरा ने पूछा, “क्या मुझे वही लाल जोड़ा पहनना चाहिए?”

दादी कुछ देर उसे देखती रहीं।

“निर्णय तुम्हारा होगा। परंपरा के नाम पर कोई तुम्हें मजबूर नहीं करेगा।”

इरा ने पुश्तैनी जोड़े को अपने सामने फैलाया।

उसमें लगा पुराना खून अब भी दिखाई देता था। वैज्ञानिक जांच के लिए कढ़ाई का कुछ हिस्सा काटा गया था।

इरा ने कहा, “मैं इसे वैसे नहीं पहनूंगी जैसे रागिनी बुआ को पहनाया गया था।”

उसने एक स्थानीय कारीगर से जोड़े का नया रूप तैयार कराया। पुराने कपड़े के सुरक्षित हिस्सों को नए लाल जोड़े में लगाया गया। खून वाला टुकड़ा अलग करके कांच के भीतर संरक्षित किया गया।

उसके नीचे लिखा गया—

“यह धब्बा अपमान नहीं, एक स्त्री की गवाही है।”

शादी के दिन इरा ने नया लाल जोड़ा पहना।

उसके घूंघट के किनारे रागिनी के पुराने जोड़े का सुनहरा कपड़ा लगा था। लेकिन बाकी डिजाइन इरा ने स्वयं चुना था।

विवान ने मंडप में उसे देखकर कहा, “तुम बहुत सुंदर लग रही हो।”

इरा मुस्कराई।

“इस बार जोड़े में कोई रहस्य नहीं है।”

“रहस्य हो तो भी मुझे पहले बता देना।”

“और तुम मेरा पीछा नहीं करोगे?”

“केवल सात फेरे लेते समय।”

मंडप में पहली बार कई दिनों बाद हंसी सुनाई दी।

दादी ने इरा के सिर पर हाथ रखा।

“आज यह जोड़ा किसी की मृत्यु का नहीं, न्याय का प्रतीक बनेगा।”

रागिनी का अंतिम आशीर्वाद
विवाह की रस्में पूरी होने के बाद इरा कुछ देर के लिए तीसरी मंजिल के कमरे में गई।

वह कमरा अब खुला था। खिड़कियों से सुबह की रोशनी भीतर आ रही थी। धूल साफ कर दी गई थी और रागिनी की तस्वीर दीवार पर सम्मान से लगाई गई थी।

इरा ने तस्वीर के सामने दीपक जलाया।

“आपकी वजह से सच सामने आया,” उसने कहा।

पीछे आईने में हल्की लाल रोशनी दिखाई दी।

इरा मुड़ी।

रागिनी आईने में खड़ी थी।

लेकिन इस बार उसके माथे पर चोट नहीं थी। चेहरा शांत था। उसने लाल दुल्हन का जोड़ा पहना था, लेकिन उस पर खून का कोई निशान नहीं था।

उसने मुस्कराकर इरा के सिर पर हाथ रखने जैसा संकेत किया।

“अब मेरा जोड़ा तुम्हारा नहीं,” उसकी धीमी आवाज सुनाई दी, “तुम्हारी जिंदगी तुम्हारी है।”

इरा की आंखों से आंसू बह निकले।

“आप आलोक से मिल पाईं?”

रागिनी की मुस्कान गहरी हो गई।

आईने में उसके पास एक युवक की धुंधली आकृति दिखाई दी।

शायद वह आलोक था।

परिवार को बाद में पता चला कि रागिनी की मृत्यु के कुछ महीनों बाद आलोक भी संदिग्ध सड़क दुर्घटना में मारा गया था। संभव है उसने जांच जारी रखने की कोशिश की हो।

आईने में दोनों आकृतियां एक-दूसरे का हाथ पकड़े पीछे हटने लगीं।

कुछ क्षण बाद आईना सामान्य हो गया।

कमरे में चमेली की सुगंध फैल गई।

इरा ने महसूस किया कि वर्षों से हवेली पर छाया बोझ हल्का हो चुका था।

बीस वर्ष बाद मिला न्याय
अदालत ने देवेंद्र और महेंद्र को हत्या, आपराधिक साजिश, प्रमाण छिपाने और अपहरण के अपराध में दोषी माना।

निर्णय सुनाते समय न्यायाधीश ने कहा कि परिवार की प्रतिष्ठा किसी व्यक्ति के जीवन और न्याय से बड़ी नहीं हो सकती।

हवेली के एक हिस्से को बाद में महिलाओं के लिए कानूनी सहायता केंद्र में बदल दिया गया। उसका नाम रखा गया—

रागिनी न्याय केंद्र।

वहां उन महिलाओं को निःशुल्क सहायता दी जाती थी, जिनकी आवाज परिवार की इज्जत, सामाजिक दबाव या सत्ता के भय में दबा दी जाती थी।

लाल जोड़े का खून वाला टुकड़ा केंद्र के प्रवेश कक्ष में रखा गया।

बहुत से लोग उसे देखकर असहज होते थे।

इरा उनसे कहती, “इसे डरावनी वस्तु की तरह मत देखिए। यह प्रमाण है कि खून चाहे कितने वर्षों तक कपड़े, परंपरा और झूठ के नीचे छिपाया जाए, एक दिन उसका रंग सच बोल देता है।”

विवान और इरा ने हवेली की मरम्मत कराई, लेकिन तीसरी मंजिल के कमरे को पूरी तरह आधुनिक नहीं बनाया।

वहां रागिनी की किताबें, पत्र और तस्वीरें सुरक्षित रखी गईं।

एक शाम विवान ने पूछा, “क्या तुम्हें अब भी आईने में रागिनी बुआ दिखाई देती हैं?”

इरा ने कहा, “नहीं।”

“तुम्हें उनकी याद आती है?”

“हां। लेकिन अब डर नहीं लगता।”

“क्यों?”

इरा ने नीचे आंगन में खेलती बच्चियों को देखा।

“क्योंकि अधूरी आत्माएं केवल बदला नहीं चाहतीं। वे चाहती हैं कि उनकी कहानी दोहराई न जाए।”

विवान ने उसका हाथ पकड़ लिया।

दीवार पर सूर्य की अंतिम किरण पड़ रही थी। लाल रोशनी कुछ क्षण के लिए पुराने जोड़े पर चमकी।

वह जोड़ा कभी परिवार की परंपरा कहलाता था। फिर हत्या का प्रमाण बना। अंत में वह बदलाव का प्रतीक हो गया।

बीस वर्ष तक परिवार ने रागिनी की मृत्यु को आत्महत्या कहकर छिपाया था।

लेकिन खून सूख सकता है, मिटता नहीं।

कपड़ा पुराना हो सकता है, गवाही नहीं।

और जब इरा ने उसी लाल रंग को भय के बजाय साहस के साथ पहना, तो एक मृत दुल्हन की कहानी पहली बार दुख पर नहीं, न्याय पर समाप्त हुई।

उस रात हवेली की छत पर पायल की आवाज अंतिम बार सुनाई दी।

दादी ने खिड़की खोलकर बाहर देखा।

चांदनी में लाल जोड़े पहने एक युवती आंगन से मुख्य द्वार की ओर जा रही थी। द्वार के पास एक युवक उसका इंतजार कर रहा था।

दोनों ने पीछे मुड़कर हवेली को देखा।

फिर हाथ पकड़कर धुंध में गायब हो गए।

अगली सुबह रागिनी की तस्वीर के सामने रखे दीपक के पास एक ताजा चमेली का फूल मिला।

हवेली के बगीचे में चमेली का कोई पौधा नहीं था।

इरा ने फूल उठाकर रागिनी के पुराने प्रेमपत्र पर रख दिया।

पत्र की अंतिम पंक्ति अब भी साफ दिखाई दे रही थी—

“तुमसे प्रेम करना मेरी गलती नहीं थी।”

इरा ने उसके नीचे अपने हाथ से एक नई पंक्ति लिखी—

“तुम्हारी आवाज सुनने में बीस वर्ष लग गए, लेकिन अब कोई उसे फिर नहीं दबा सकेगा।”

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