मेरी पत्नी हर रात किसी अनजान आदमी को मेरी तस्वीर भेजती थी

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मेरी पत्नी हर रात किसी अनजान आदमी को मेरी तस्वीर भेजती थी

मेरी पत्नी हर रात किसी अनजान आदमी को मेरी तस्वीर भेजती थी

मेरी पत्नी हर रात किसी अनजान आदमी को मेरी तस्वीर भेजती थी
रात के एक बजकर तेरह मिनट पर विराज की आंख अचानक खुली।

कमरे में अंधेरा था, लेकिन उसके चेहरे पर मोबाइल की हल्की सफेद रोशनी पड़ रही थी। उसने आंखें पूरी तरह खोले बिना सामने देखा। उसकी पत्नी तृषा बिस्तर के किनारे बैठी थी। वह अपना मोबाइल उसकी ओर किए हुए थी।

कैमरे की धीमी-सी आवाज आई।

तृषा ने उसकी तस्वीर खींच ली थी।

विराज चुपचाप सोने का अभिनय करता रहा। उसने पलकों के बीच से देखा कि तृषा ने तस्वीर किसी व्यक्ति को भेजी। संपर्क के नाम की जगह केवल एक अक्षर लिखा था—“M”।

कुछ ही सेकंड में उत्तर आया—

“आज भी उसे कुछ याद नहीं आया?”

तृषा ने लिखा—

“नहीं। वह अभी भी खुद को विराज ही समझता है।”

विराज की सांस जैसे उसके सीने में अटक गई।

वह अभी भी खुद को विराज समझता है?

इस वाक्य का क्या अर्थ था?

क्या तृषा उसे किसी और व्यक्ति के नाम से जानती थी? क्या वह किसी अनजान आदमी के साथ मिलकर उसे धोखा दे रही थी? या फिर उसकी पूरी जिंदगी ही किसी ऐसे झूठ पर खड़ी थी, जिसके बारे में केवल उसकी पत्नी जानती थी?

तृषा ने अगला संदेश पढ़ा—

“कल उसकी गर्दन के पीछे बने निशान की साफ तस्वीर भेजना। उसके बाद मैं तुम्हें सच बताऊंगा।”

विराज ने तुरंत आंखें बंद कर लीं।

तृषा ने मोबाइल बंद किया, उसके पास लेट गई और हमेशा की तरह अपना हाथ उसकी छाती पर रख दिया।

उस स्पर्श में वही अपनापन था, जिसने पिछले दो वर्षों में विराज को यह विश्वास दिलाया था कि वह दुनिया का सबसे भाग्यशाली पति है।

लेकिन उस रात उसे पहली बार अपनी पत्नी का हाथ प्रेम नहीं, किसी जांच का हिस्सा लगा।

प्रेम से भरा हुआ घर
विराज और तृषा की शादी को दो वर्ष हो चुके थे। वे गुरुग्राम की एक आवासीय सोसाइटी में रहते थे। विराज एक वास्तुकार था और तृषा एक स्कूल में मनोविज्ञान परामर्शदाता के रूप में काम करती थी।

उनकी मुलाकात जयपुर में आयोजित एक कला प्रदर्शनी में हुई थी। विराज वहां पुराने भवनों की तस्वीरों का संग्रह देखने गया था। तृषा अपनी मित्र के साथ आई थी।

पहली बातचीत एक टूटी हुई हवेली की तस्वीर के सामने हुई थी।

तृषा ने तस्वीर देखकर कहा था, “कुछ इमारतें टूटने के बाद भी सुंदर रहती हैं।”

विराज ने उत्तर दिया, “क्योंकि उनकी दरारों में उनकी कहानी दिखाई देती है।”

तृषा उसकी ओर देखकर मुस्कराई थी। “आप इमारतों की बात कर रहे हैं या लोगों की?”

विराज ने कहा था, “शायद दोनों की।”

उस छोटी-सी बातचीत के बाद दोनों ने कॉफी पी। फिर फोन नंबर साझा किए। कुछ महीनों की मुलाकातों के बाद प्रेम हुआ और एक वर्ष के भीतर विवाह हो गया।

तृषा ने विराज के अतीत के बारे में बहुत अधिक प्रश्न नहीं किए थे। वह जानती थी कि विराज को पांच वर्ष की उम्र में एक अनाथालय के बाहर पाया गया था। कुछ समय बाद दिल्ली के अवस्थी परिवार ने उसे गोद ले लिया।

विराज को पांच वर्ष से पहले का अपना जीवन याद नहीं था।

डॉक्टरों ने कहा था कि बचपन में किसी दुर्घटना या मानसिक आघात के कारण उसकी स्मृतियां मिट गई होंगी। उसके दत्तक माता-पिता ने उसे इतना प्रेम दिया कि उसने कभी अपने वास्तविक परिवार को खोजने पर जोर नहीं दिया।

तृषा ने भी विवाह से पहले कहा था, “परिवार केवल वह नहीं होता, जहां जन्म होता है। परिवार वह भी होता है, जहां हमें स्वीकार किया जाता है।”

उस समय विराज को लगा था कि उसे ऐसी पत्नी मिली है, जो उसके अधूरे अतीत से नहीं, उसके वर्तमान से प्रेम करती है।

लेकिन अब उसे संदेह होने लगा था कि तृषा उसके अतीत के बारे में उससे कहीं अधिक जानती थी।

अगली सुबह तृषा ने सामान्य व्यवहार किया। उसने नाश्ते में विराज की पसंद के आलू के परांठे बनाए और जाते समय उसके माथे को चूमा।

“आज कार्यालय से देर मत करना,” उसने कहा। “मैंने तुम्हारे लिए कुछ खास बनाने की योजना बनाई है।”

विराज ने उसकी आंखों में देखते हुए पूछा, “तुम रात को ठीक से सोईं?”

तृषा एक पल के लिए रुकी।

“हां। क्यों?”

“मुझे लगा तुम रात को उठी थीं।”

“पानी पीने के लिए उठी थी।”

उसने बिना पलक झपकाए झूठ बोला।

विराज ने मुस्कराने की कोशिश की। “शायद मैंने सपना देखा होगा।”

तृषा चली गई, लेकिन उसके चेहरे पर कुछ क्षण के लिए भय दिखाई दिया था।

मोबाइल में छिपी तस्वीरें
उस शाम तृषा स्नानघर में थी और उसका मोबाइल मेज पर रखा था। स्क्रीन पर एक संदेश दिखाई दिया—

M: आज रात निशान की तस्वीर चाहिए। देर मत करना। हमारे पास समय कम है।

विराज ने मोबाइल उठाया। उस पर पासवर्ड लगा था। उसे तृषा का पासवर्ड नहीं पता था, लेकिन तभी उसके मन में उनकी शादी की तारीख आई।

पासवर्ड खुल गया।

विराज को अपने इस काम पर शर्म महसूस हुई। उसने कभी तृषा का मोबाइल जांचने की कोशिश नहीं की थी। लेकिन अब उसे लग रहा था कि उसकी जिंदगी खतरे में हो सकती है।

उसने “M” की बातचीत खोली।

पिछले तीन महीनों से तृषा हर रात विराज की तस्वीर भेज रही थी। कभी सोते हुए, कभी भोजन करते हुए, कभी बालकनी में खड़े हुए। कुछ तस्वीरें इतनी सामान्य थीं कि कोई भी उन्हें पारिवारिक यादें समझ सकता था।

लेकिन संदेश सामान्य नहीं थे।

“क्या वह पुराने गीत पर प्रतिक्रिया देता है?”

“क्या उसने कभी प्रतापगढ़ का नाम लिया?”

“क्या उसे लाल कमरा याद आया?”

“उसकी बाईं हथेली की तस्वीर भेजो।”

“क्या उसके पास अब भी पीतल का वह लॉकेट है?”

तृषा हर प्रश्न का उत्तर देती थी।

“उसे कुछ याद नहीं।”

“वह प्रतापगढ़ कभी नहीं गया।”

“लाल कमरे की बात सुनकर उसके सिर में दर्द हुआ था।”

“लॉकेट उसके पुराने संदूक में है।”

अंतिम संदेश पढ़कर विराज का शरीर ठंडा पड़ गया।

वह पीतल का लॉकेट उसे अनाथालय के बाहर मिलने के समय उसके गले में मिला था। उस पर दो छोटे अक्षर बने थे—“वी.आर.”

उसके दत्तक माता-पिता ने उसे वह लॉकेट अठारहवें जन्मदिन पर दिया था। विराज ने उसे एक पुराने संदूक में सुरक्षित रखा था। उसने उसके बारे में केवल तृषा को बताया था।

स्नानघर में पानी बंद होने की आवाज आई।

विराज ने मोबाइल वहीं रख दिया और कमरे से बाहर निकल गया।

तृषा जब बाहर आई तो विराज खिड़की के पास खड़ा था।

“क्या हुआ?” उसने पूछा।

“सिर में थोड़ा दर्द है।”

“दवा दूं?”

“नहीं।”

तृषा उसके पास आई और उसकी कनपटी दबाने लगी।

“तुम पिछले कुछ दिनों से परेशान लग रहे हो।”

विराज उसके स्पर्श से दूर हट गया।

तृषा ने हैरानी से पूछा, “मैंने कुछ गलत किया?”

विराज उसे उसी समय सब बताना चाहता था। लेकिन उसने स्वयं को रोक लिया।

“बस काम का दबाव है।”

तृषा ने उसे ध्यान से देखा। शायद उसे विश्वास नहीं हुआ, लेकिन उसने कोई प्रश्न नहीं किया।

उस रात विराज ने सोने का अभिनय किया।

एक बजकर तेरह मिनट पर तृषा फिर उठी। उसने धीरे से विराज की गर्दन के पीछे से बाल हटाए और वहां बने अर्धचंद्राकार निशान की तस्वीर ली।

विराज को वह निशान बचपन से था। उसके दत्तक माता-पिता कहते थे कि जब वह अनाथालय के पास मिला था, तब वहां जला हुआ घाव था।

तृषा ने तस्वीर भेजी।

कुछ देर बाद उत्तर आया—

“यही लड़का है। तुम्हारा पति वास्तव में विराज अवस्थी नहीं है।”

तृषा का हाथ कांप गया।

उसने लिखा—

“फिर वह कौन है?”

उत्तर आया—

“प्रतापगढ़ हत्याकांड का वह बच्चा, जिसे अठारह वर्ष पहले मृत मान लिया गया था।”

प्रतापगढ़ हत्याकांड
अगली सुबह विराज कार्यालय नहीं गया। तृषा के स्कूल जाने के बाद उसने इंटरनेट पर “प्रतापगढ़ हत्याकांड” खोजा।

कई पुराने समाचार सामने आए।

अठारह वर्ष पहले प्रतापगढ़ के पास स्थित एक बड़ी हवेली में एक दंपती की हत्या हुई थी। मृतकों के नाम थे—विक्रम राठौड़ और रेखा राठौड़।

विक्रम राठौड़ एक बड़ी खनन कंपनी में वरिष्ठ लेखा अधिकारी थे। पुलिस के अनुसार, उनके घर में लूट के उद्देश्य से हमला हुआ था। विक्रम और उनकी पत्नी की मृत्यु हो गई, जबकि उनका पांच वर्षीय बेटा विहान राठौड़ लापता हो गया।

मामले में परिवार के चालक शंभूनाथ त्रिपाठी को गिरफ्तार किया गया था। पुलिस ने दावा किया कि शंभूनाथ ने धन के लालच में हत्या की और बच्चे को भी मारकर नदी में फेंक दिया।

बच्चे का शव कभी नहीं मिला।

शंभूनाथ अदालत में स्वयं को निर्दोष बताते रहे, लेकिन उन्हें आजीवन कारावास मिला। जेल में सात वर्ष बाद उनकी मृत्यु हो गई।

विराज ने पुराने अखबार में विहान की तस्वीर देखी।

उसके हाथ कांपने लगे।

तस्वीर धुंधली थी, लेकिन बच्चे की आंखें, माथा और चेहरे की बनावट बिल्कुल उसकी बचपन की तस्वीरों जैसी थी।

समाचार के एक हिस्से में लिखा था—

“लापता बच्चे विहान की गर्दन के पीछे जन्म से अर्धचंद्राकार गहरा निशान था।”

विराज ने तुरंत अपनी गर्दन छुई।

वह निशान जन्म का नहीं, जले हुए घाव का माना जाता था।

क्या वास्तव में उसका नाम विहान था?

क्या उसके वास्तविक माता-पिता की हत्या हो चुकी थी?

और सबसे बड़ा प्रश्न—तृषा इस मामले से कैसे जुड़ी थी?

उसने शंभूनाथ त्रिपाठी का नाम खोजा। एक पुरानी तस्वीर में शंभूनाथ अपनी पत्नी और दो छोटी बेटियों के साथ खड़े थे।

छोटी बेटी का नाम था—तृषा त्रिपाठी।

विराज की सांस रुक गई।

उसकी पत्नी उस व्यक्ति की बेटी थी, जिसे उसके माता-पिता की हत्या के अपराध में सजा मिली थी।

पत्नी का गुप्त मिलन
उस शाम तृषा ने कहा कि उसे स्कूल की एक जरूरी बैठक में जाना है। विराज ने सिर दर्द का बहाना बनाकर घर पर रहने की बात कही।

तृषा के निकलते ही वह उसके पीछे चल पड़ा।

वह एक टैक्सी से शहर के पुराने हिस्से में पहुंची और एक बंद पड़े सिनेमा भवन के सामने उतरी। वहां से वह पैदल एक छोटे कैफे में गई।

कैफे के कोने में एक साठ वर्ष का व्यक्ति उसका इंतजार कर रहा था। उसके बाल सफेद थे और दाईं आंख के ऊपर लंबा निशान था।

तृषा उसके सामने बैठ गई।

विराज बाहर शीशे की दीवार के पीछे छिपकर उन्हें देखने लगा।

वृद्ध ने तृषा को एक फाइल दी।

“तस्वीर से पुष्टि हो गई है,” उसने कहा। “तुम्हारा पति ही विहान राठौड़ है।”

तृषा की आवाज कांप गई। “तो मेरे पिता निर्दोष थे?”

“तुम्हारे पिता हत्यारे नहीं थे। उन्होंने बच्चे को बचाया था।”

“फिर पुलिस ने उन्हें गिरफ्तार क्यों किया?”

“क्योंकि असली हत्यारा बहुत शक्तिशाली था।”

“कौन था वह?”

वृद्ध आगे झुका। “यह नाम फोन पर या खुली जगह में नहीं लिया जा सकता।”

“मैं तीन महीने से आपकी हर बात मान रही हूं। मैंने अपने पति से झूठ बोला। उसकी तस्वीरें भेजीं। उसे पुराने गीत सुनाए। प्रतापगढ़ का नाम लिया। अब आप कह रहे हैं कि मुझे सच जानने का अधिकार नहीं?”

वृद्ध ने धीमे स्वर में कहा, “सच तुम्हारे पति के लॉकेट में छिपा है।”

विराज का दिल तेजी से धड़कने लगा।

तृषा ने पूछा, “लॉकेट में क्या है?”

“विक्रम राठौड़ ने हत्या से पहले कुछ ऐसा छिपाया था, जिससे खनन घोटाले के सारे प्रमाण सामने आ सकते हैं। हत्यारे ने उसी के लिए पूरा परिवार खत्म किया।”

“लेकिन लॉकेट बहुत छोटा है।”

“उसमें एक सूक्ष्म मेमोरी चिप हो सकती है।”

तृषा ने वृद्ध को घूरा।

“आपको यह सब कैसे पता?”

वृद्ध ने उत्तर नहीं दिया।

“आज रात लॉकेट लेकर प्रतापगढ़ पहुंचो,” उसने कहा। “अपने पति को मत बताना। उसकी स्मृति वापस आई तो वह भावनात्मक रूप से अस्थिर हो सकता है।”

“मैं उसे अकेला छोड़कर नहीं जाऊंगी।”

“अगर तुमने उसे बताया तो उसकी जान खतरे में पड़ जाएगी।”

तृषा उठी और कैफे से बाहर निकल गई।

विराज एक खंभे के पीछे छिप गया। तृषा उसके पास से गुजर गई।

वृद्ध कुछ मिनट बाद बाहर आया। उसने फोन पर किसी से कहा—

“लड़की जाल में फंस चुकी है। आज रात लॉकेट हमारे पास होगा। उसके बाद पति-पत्नी दोनों की जरूरत नहीं रहेगी।”

विराज के पैरों तले जमीन खिसक गई।

तृषा जिस व्यक्ति पर विश्वास कर रही थी, वही उसे मौत के जाल में ले जा रहा था।

आमने-सामने
विराज तृषा से पहले घर पहुंच गया। उसने पुराने संदूक से पीतल का लॉकेट निकाला और अपनी जेब में रख लिया।

रात को तृषा लौटी तो वह कपड़े बदलकर बैग तैयार करने लगी।

विराज दरवाजे के सामने खड़ा हो गया।

“कहां जा रही हो?”

तृषा चौंक गई।

“स्कूल की एक छात्रा की तबीयत खराब है।”

“क्या वह छात्रा प्रतापगढ़ में रहती है?”

तृषा का चेहरा सफेद पड़ गया।

विराज ने मोबाइल उसकी ओर बढ़ाया। स्क्रीन पर कैफे में बैठे तृषा और वृद्ध की तस्वीर थी।

“कौन है वह आदमी?”

तृषा के होंठ कांपने लगे।

“तुमने मेरा पीछा किया?”

“और तुम तीन महीने से सोते समय मेरी तस्वीरें किसी अनजान आदमी को भेज रही हो।”

“विराज, मैं सब समझा सकती हूं।”

“मेरा नाम विराज है या विहान?”

तृषा की आंखों में आंसू आ गए।

“तुमने समाचार देख लिया?”

“तुम्हें कब से पता था?”

“पक्का आज ही हुआ।”

“लेकिन तुम्हें तीन महीने से संदेह था।”

“हां।”

विराज की आवाज टूटने लगी।

“तुमने मुझसे शादी क्यों की? क्या तुम शुरू से जानती थीं कि मैं उस परिवार का बच्चा हूं, जिसकी हत्या के आरोप में तुम्हारे पिता जेल गए?”

“नहीं!” तृषा ने तुरंत कहा। “जब मैंने तुमसे शादी की, मुझे कुछ पता नहीं था।”

“फिर पता कैसे चला?”

तृषा ने गहरी सांस ली।

“हमारी पहली शादी की सालगिरह पर तुम्हारी मां ने मुझे तुम्हारे बचपन का संदूक दिया था। उसमें लॉकेट और अनाथालय के दस्तावेज थे। दस्तावेज में लिखा था कि तुम प्रतापगढ़ से कुछ किलोमीटर दूर मिले थे।”

“इससे क्या साबित होता था?”

“कुछ नहीं। लेकिन लॉकेट पर वी और आर लिखा था। मैंने बचपन से विहान राठौड़ की कहानी सुनी थी। मेरे पिता जेल से हर पत्र में लिखते थे कि उन्होंने एक बच्चे को बचाया था। उस बच्चे के गले में पीतल का लॉकेट था।”

विराज स्तब्ध रह गया।

“तुम्हारे पिता ने मुझे बचाया था?”

तृषा ने सिर हिलाया।

“उन्होंने लिखा था कि हत्या वाली रात हवेली से धुआं निकल रहा था। वे पीछे के दरवाजे से अंदर गए। उन्हें पांच वर्ष का बच्चा मिला, जो सदमे में बोल नहीं पा रहा था। मेरे पिता उसे गाड़ी में बैठाकर पुलिस के पास ले जाना चाहते थे।”

“फिर क्या हुआ?”

“रास्ते में पुलिस की जीप ने उनका पीछा किया। पिता समझ गए कि पुलिस भी हत्यारों से मिली हुई है। उन्होंने तुम्हें जंगल के पास एक धार्मिक आश्रम में छोड़ दिया और सहायता लाने गए। उन्हें वहीं गिरफ्तार कर लिया गया।”

“लेकिन मैं अनाथालय के बाहर कैसे पहुंचा?”

“आश्रम बंद हो गया था। शायद वहां के किसी व्यक्ति ने तुम्हें शहर के अनाथालय तक पहुंचाया।”

विराज का क्रोध कुछ कम हुआ, लेकिन चोट अब भी थी।

“तुमने मुझे क्यों नहीं बताया?”

“मेरे पास केवल पिता के पत्र थे। कोई प्रमाण नहीं था। मुझे डर था कि अगर मैं गलत हुई तो तुम्हारी पूरी जिंदगी को झूठा बना दूंगी।”

“और तस्वीरें?”

“मैंने महेश राणा से संपर्क किया। वह उस मामले का जांच अधिकारी था। उसने कहा कि वह मेरे पिता की बेगुनाही साबित करना चाहता है। उसने पहचान की पुष्टि के लिए तस्वीरें मांगीं।”

विराज को कैफे में वृद्ध की फोन पर कही बात याद आई।

“महेश तुम्हारी सहायता नहीं कर रहा।”

“क्या?”

“मैंने उसे फोन पर सुना। वह लॉकेट मिलने के बाद हम दोनों को मारना चाहता है।”

तृषा पीछे हट गई।

“यह संभव नहीं। वह पुलिस अधिकारी था।”

“उसी ने तुम्हारे पिता को गिरफ्तार किया था।”

तृषा के चेहरे पर भय उतर आया। उसने मानो पहली बार उस स्पष्ट संबंध को देखा।

विराज ने जेब से लॉकेट निकाला।

“वह इसे चाहता है।”

“इसे खोलना होगा।”

दोनों ने लॉकेट को ध्यान से देखा। वह साधारण पीतल का बना था। उसके बीच का हिस्सा हिलता नहीं था।

तृषा एक छोटा पेचकस लाई। उन्होंने किनारे पर दबाव डाला तो लॉकेट दो हिस्सों में खुल गया।

अंदर एक पुरानी पारिवारिक तस्वीर थी। तस्वीर में विक्रम, रेखा और पांच वर्ष का विहान खड़े थे।

तस्वीर के पीछे पतली चांदी जैसी पट्टी लगी थी।

विराज ने उसे बाहर निकाला।

वह एक सूक्ष्म मेमोरी चिप थी।

लाल कमरे की स्मृति
चिप को पढ़ने के लिए विशेष उपकरण चाहिए था। विराज का एक तकनीकी मित्र मदद कर सकता था, लेकिन रात हो चुकी थी।

तभी तृषा के मोबाइल पर महेश का संदेश आया—

“लॉकेट मिल गया?”

तृषा ने विराज की ओर देखा।

“उसे शक हो जाएगा।”

विराज ने कहा, “उसे लिखो कि मिल गया है।”

तृषा ने संदेश भेजा।

तुरंत उत्तर आया—

“आज रात दो बजे प्रतापगढ़ की पुरानी हवेली पहुंचो। अकेली आना।”

विराज ने कहा, “हम पुलिस को बताएंगे।”

तृषा ने सिर हिलाया। “किस पुलिस को? अगर महेश के पुराने संबंध अभी भी सक्रिय हैं, तो वह भाग जाएगा।”

“फिर पत्रकार?”

तृषा ने अपनी बड़ी बहन नंदिनी को फोन किया, जो एक समाचार चैनल में काम करती थी। उसने उसे पूरा सच नहीं बताया, लेकिन प्रतापगढ़ पहुंचने और पुलिस की विश्वसनीय टीम को सूचना देने के लिए कहा।

रात ग्यारह बजे दोनों कार से प्रतापगढ़ के लिए निकल पड़े।

रास्ते में विराज चुप था।

तृषा ने उसका हाथ पकड़ना चाहा, लेकिन उसने हाथ पीछे कर लिया।

“तुम मुझसे नाराज हो,” उसने कहा।

“तुमने मेरे हर प्रश्न का उत्तर अकेले खोजा। मेरी तस्वीरें भेजीं। मेरे व्यवहार की रिपोर्ट दी। क्या तुम्हें एक बार भी नहीं लगा कि मैं सच सुनने का अधिकार रखता हूं?”

“हर रात तस्वीर भेजते समय मुझे अपराधबोध होता था।”

“फिर भी भेजती रहीं।”

“क्योंकि महेश कहता था कि अगर तुम सच में विहान हुए, तो हत्यारे तुम्हें खोज रहे होंगे। उसने कहा कि तस्वीरों से वह तुम्हारी सुरक्षा पर नजर रखेगा।”

“तुमने एक अनजान आदमी पर मुझसे अधिक विश्वास किया।”

तृषा की आंखें भर आईं।

“मैंने उस आदमी पर विश्वास नहीं किया था। मैंने अपने पिता की बेगुनाही साबित करने की संभावना पर विश्वास किया था।”

“और उस संभावना के सामने हमारा रिश्ता छोटा पड़ गया?”

“नहीं, विराज। मैं तुम्हें खोने से डर गई थी।”

विराज ने सड़क की ओर देखते हुए कहा, “कभी-कभी किसी को बचाने की कोशिश में हम उसे सबसे अधिक चोट पहुंचा देते हैं।”

कुछ देर बाद तृषा बोली, “तुमने भी मेरा पीछा किया और मेरा मोबाइल देखा।”

विराज ने उसकी ओर देखा।

“हां। मैंने भी तुम्हारे विश्वास को तोड़ा।”

“तो हम दोनों गलत थे।”

“लेकिन तुम्हारा झूठ तीन महीने चला।”

“और तुम्हारा शक एक रात में इतना बड़ा हो गया कि तुमने मान लिया मैं किसी दूसरे आदमी से प्रेम करती हूं।”

विराज ने कोई उत्तर नहीं दिया।

तृषा ने धीरे से कहा, “शायद हमारा प्रेम कमजोर नहीं था। हमारी बातचीत कमजोर थी।”

यह वाक्य कार में लंबे समय तक गूंजता रहा।

प्रतापगढ़ की हवेली
रात के एक बजकर पचास मिनट पर वे पुरानी राठौड़ हवेली पहुंचे।

हवेली वर्षों से बंद थी। मुख्य द्वार टूटा हुआ था। दीवारों पर काई और जंगली बेलें चढ़ी थीं। ऊपर की खिड़कियां अंधेरी आंखों जैसी दिखाई दे रही थीं।

तृषा ने कहा, “महेश ने मुझे अकेले आने को कहा था। तुम कार में रहो।”

“अब हम एक-दूसरे से कुछ नहीं छिपाएंगे।”

विराज उसके साथ अंदर गया।

हवेली में कदम रखते ही उसके सिर में तेज दर्द उठा। उसे कुछ धुंधले दृश्य दिखाई दिए—

एक महिला सीढ़ियों से भाग रही थी।

कोई पुरुष चिल्ला रहा था।

फर्श पर टूटा हुआ कांच था।

एक बच्चा लाल रंग के कमरे में अलमारी के पीछे छिपा था।

विराज दीवार पकड़कर रुक गया।

“क्या हुआ?” तृषा ने पूछा।

“मैं यहां पहले था।”

“तुम्हें याद आ रहा है?”

“एक लाल कमरा था।”

तृषा ने टॉर्च चारों ओर घुमाई। गलियारे के अंत में एक दरवाजा दिखाई दिया, जिस पर पुराना लाल रंग लगा था।

दोनों कमरे में पहुंचे।

अंदर जली हुई लकड़ी और टूटे फर्नीचर के अवशेष थे। विराज का सिर घूमने लगा।

उसे अपनी मां की आवाज सुनाई दी—

“विहान, अलमारी के पीछे छिप जाओ। चाहे कुछ भी हो, बाहर मत आना।”

फिर एक गोली चली थी।

विराज जमीन पर बैठ गया।

“वह मेरी मां थीं,” उसने रोते हुए कहा। “उन्होंने मुझे छिपाया था।”

तृषा उसके पास घुटनों के बल बैठ गई।

“तुम्हें सब एक साथ याद करने की जरूरत नहीं।”

“मैंने उन्हें मरते देखा था।”

तृषा ने उसे गले लगा लिया।

उसी समय पीछे से आवाज आई—

“और यही कारण था कि तुम्हें भी मर जाना चाहिए था।”

महेश राणा दरवाजे पर खड़ा था। उसके हाथ में पिस्तौल थी।

उसके साथ दो आदमी और थे।

“लॉकेट मुझे दे दो,” उसने कहा।

तृषा विराज के सामने खड़ी हो गई।

“मेरे पिता निर्दोष थे।”

महेश हंस पड़ा।

“तुम्हारे पिता बेवकूफ थे। अगर वह बच्चे को वहीं छोड़ देते, तो आराम से जीवित रहते।”

“हत्याएं आपने की थीं?”

“मैंने अकेले नहीं कीं। विक्रम राठौड़ की कंपनी के मालिक ने करोड़ों का अवैध खनन किया था। विक्रम ने सारे खातों की प्रतियां बनाकर शिकायत की तैयारी कर ली थी।”

विराज ने पूछा, “मेरे माता-पिता को किसने मारा?”

“कंपनी के मालिक का बेटा और उसके आदमी आए थे। मैं केवल प्रमाण लेने और मामला संभालने के लिए यहां था।”

“आपने उन्हें रोकने के बजाय उनकी सहायता की।”

महेश ने कंधे उचकाए।

“मुझे इसके बदले इतना धन मिला कि मेरी सात पीढ़ियां जी सकती थीं।”

तृषा की आंखों में क्रोध भर गया।

“आपने मेरे पिता को फंसा दिया।”

“किसी न किसी को दोषी बनाना जरूरी था। चालक सबसे आसान लक्ष्य था।”

विराज ने पूछा, “आप इतने वर्षों बाद लॉकेट क्यों खोज रहे हैं?”

“क्योंकि कंपनी का पुराना मालिक मर चुका है। उसका बेटा अब राजनीति में प्रवेश कर रहा है। उसे डर है कि चिप में मौजूद खाते और रिकॉर्ड सामने आ गए तो उसका सब कुछ समाप्त हो जाएगा।”

तृषा ने कहा, “चिप हमारे पास नहीं है।”

महेश ने पिस्तौल उसकी ओर कर दी।

“मैं तीन महीने से तुम्हारी भेजी तस्वीरें देख रहा हूं। मुझे पता है तुम झूठ बोलते समय दाहिनी भौं ऊपर करती हो।”

विराज ने आगे बढ़कर कहा, “उसे छोड़ दीजिए। चिप मेरे पास है।”

उसने जेब से एक छोटी चिप निकाली।

महेश ने अपने आदमी को उसे लेने का संकेत किया।

जैसे ही आदमी आगे बढ़ा, तृषा ने जमीन पर पड़ा लकड़ी का टुकड़ा उसकी टांग पर मारा। विराज ने दूसरे आदमी को धक्का दिया।

महेश ने गोली चलाई।

गोली विराज के कंधे को छूती हुई दीवार में जा लगी।

तृषा चीखी, “विराज!”

महेश ने उसे पकड़कर पिस्तौल उसके सिर पर रख दी।

“चिप जमीन पर रखो।”

विराज ने असली चिप निकालकर फर्श पर रख दी।

महेश ने उसे उठाया।

“अठारह वर्ष से यह छोटी-सी चीज मेरी नींद खराब कर रही थी।”

विराज ने कहा, “अब आपकी नींद हमेशा के लिए खत्म होगी।”

महेश हंसा। “तुम्हें लगता है पुलिस आने वाली है?”

तृषा ने पहली बार मुस्कराते हुए कहा, “पुलिस ही नहीं।”

महेश का चेहरा बदल गया।

तृषा की कमीज के बटन में लगा छोटा कैमरा पूरी बातचीत सीधा नंदिनी के समाचार चैनल तक भेज रहा था। नंदिनी ने लाइव प्रसारण शुरू नहीं किया था, लेकिन वीडियो रिकॉर्ड होकर कई सुरक्षित सर्वरों पर पहुंच चुका था।

बाहर गाड़ियों की आवाज सुनाई दी।

महेश ने तृषा को धक्का दिया और पीछे के दरवाजे की ओर भागा।

विराज घायल होने के बावजूद उसके पीछे दौड़ा।

महेश सीढ़ियों से छत पर पहुंच गया। बारिश शुरू हो चुकी थी। छत की पुरानी दीवार के नीचे गहरी ढलान थी।

महेश ने पलटकर गोली चलाने की कोशिश की, लेकिन उसका पैर फिसल गया। वह किनारे से लटक गया।

विराज उसके पास पहुंचा।

महेश ने सहायता के लिए हाथ बढ़ाया।

“मुझे बचा लो।”

विराज के सामने अपने माता-पिता के रक्त से भरे चेहरे घूम गए। यही व्यक्ति उनकी हत्या छिपाने, उसे मरवाने और एक निर्दोष आदमी को जेल भेजने के लिए जिम्मेदार था।

वह चाहता तो महेश का हाथ छोड़ सकता था।

लेकिन उसने आगे बढ़कर उसकी कलाई पकड़ ली।

तृषा और पुलिस अधिकारी भी छत पर पहुंच गए। उन्होंने महेश को ऊपर खींच लिया और गिरफ्तार कर लिया।

महेश ने आश्चर्य से विराज को देखा।

“तुमने मुझे क्यों बचाया?”

विराज ने कहा, “क्योंकि मैं आपके जैसा बनकर अपने माता-पिता को न्याय नहीं दे सकता।”

तस्वीरों का वास्तविक अर्थ
मेमोरी चिप में अवैध खनन, रिश्वत और हत्या की योजना से जुड़े दस्तावेज थे। उसमें विक्रम राठौड़ की एक वीडियो रिकॉर्डिंग भी थी।

वीडियो में विराज के पिता कैमरे की ओर देख रहे थे।

“अगर यह रिकॉर्डिंग मेरे बेटे विहान तक पहुंचे, तो मैं चाहता हूं कि वह जाने कि उसके पिता ने धन के लिए अपनी जान जोखिम में नहीं डाली। मैंने यह सब इसलिए किया क्योंकि जिस भूमि से हम कमाते हैं, उसे नष्ट करने का अधिकार किसी को नहीं है।”

वीडियो के अंत में उसकी मां रेखा भी दिखाई दीं। उन्होंने छोटे विहान को गोद में उठाया हुआ था।

“तुम बड़े होकर जो भी बनो,” उन्होंने कहा, “डर को अपना निर्णय मत लेने देना।”

विराज वीडियो देखते हुए रो पड़ा। तृषा उसके पास बैठी रही।

महेश राणा और उसके सहयोगियों के विरुद्ध हत्या, प्रमाण नष्ट करने और आपराधिक साजिश का मामला चला। तृषा के पिता शंभूनाथ को मृत्यु के बाद अदालत ने निर्दोष घोषित किया।

प्रतापगढ़ की हवेली को बाद में अवैध खनन के विरुद्ध काम करने वाले एक जनहित केंद्र में बदल दिया गया।

लेकिन पुराने अपराध का सच सामने आने के बाद भी विराज और तृषा के बीच सब तुरंत सामान्य नहीं हुआ।

एक रात तृषा ने अपना मोबाइल उसके सामने रख दिया।

“आज से इसका पासवर्ड तुम्हें पता होगा।”

विराज ने मोबाइल उसकी ओर वापस कर दिया।

“मुझे तुम्हारा पासवर्ड नहीं चाहिए।”

“तुम मुझ पर फिर विश्वास कर पाओगे?”

विराज कुछ देर चुप रहा।

“विश्वास कोई स्विच नहीं है, जिसे एक बार दबाया और रोशनी लौट आई। हमें इसे फिर बनाना होगा।”

तृषा की आंखें झुक गईं।

“मैं तैयार हूं।”

“एक शर्त पर।”

“क्या?”

“अब चाहे सच कितना भी कठिन हो, हम एक-दूसरे के बारे में किसी तीसरे व्यक्ति से पहले एक-दूसरे से बात करेंगे।”

तृषा ने सिर हिलाया।

“और मेरी भी एक शर्त है।”

“बताओ।”

“जब तुम्हें शक हो, तो मेरे सोने के बाद मेरा मोबाइल मत देखना। मुझे जगा देना।”

विराज के चेहरे पर हल्की मुस्कान आई।

“ठीक है।”

तृषा ने पूछा, “तुमने सच में सोचा था कि मेरा किसी दूसरे आदमी से संबंध है?”

“तुम हर रात उसे मेरी तस्वीर भेजती थीं।”

“तो तुम्हें लगा मेरा प्रेमी तुम्हारी तस्वीरें देखना चाहता है?”

विराज पहली बार कई दिनों बाद हंसा।

“उस समय यह बात मुझे बहुत तार्किक लगी थी।”

“तुम वास्तुकार हो। जासूस बनने की कोशिश मत करना।”

“और तुम मनोवैज्ञानिक हो। गुप्त जांच अधिकारी बनने की कोशिश मत करना।”

दोनों की हंसी में अब भी दर्द था, लेकिन उसी दर्द के बीच रिश्ता दोबारा सांस लेने लगा था।

आखिरी तस्वीर
छह महीने बाद तृषा और विराज प्रतापगढ़ की उसी हवेली की छत पर खड़े थे। भवन की मरम्मत शुरू हो चुकी थी। सुबह का सूर्य पहाड़ियों के पीछे से निकल रहा था।

तृषा ने मोबाइल निकाला और विराज की तस्वीर लेने लगी।

विराज ने तुरंत पूछा, “किसे भेज रही हो?”

तृषा ने गंभीर चेहरा बनाकर कहा, “एक अनजान आदमी को।”

विराज ने उसकी ओर देखा।

तृषा हंस पड़ी।

“डरो मत। यह तस्वीर तुम्हारी मां को भेज रही हूं।”

विराज की दत्तक मां ने पिछले महीनों में उसका बहुत साथ दिया था। उन्होंने कहा था कि विहान उसका जन्म का नाम हो सकता है, लेकिन उनके लिए वह हमेशा उनका बेटा विराज रहेगा।

विराज ने तृषा के हाथ से मोबाइल लिया।

“आज केवल मेरी तस्वीर क्यों?”

उसने कैमरा सामने किया और तृषा को अपने पास खींच लिया।

दोनों ने एक साथ तस्वीर ली।

तस्वीर में पीछे वह हवेली थी, जहां उनके परिवारों की जिंदगी टूट गई थी। लेकिन अब उसकी टूटी दीवारों पर सुबह की रोशनी पड़ रही थी।

तृषा ने पूछा, “इसे किसे भेजोगे?”

विराज ने कहा, “किसी को नहीं। कुछ तस्वीरें प्रमाण के लिए नहीं, याद रखने के लिए होती हैं।”

तृषा ने अपना सिर उसके कंधे पर रख दिया।

“क्या तुम्हें लगता है तुम्हारे माता-पिता हमें देख रहे होंगे?”

“शायद।”

“और मेरे पिता?”

“वह भी।”

कुछ क्षण बाद विराज ने धीमे स्वर में कहा, “तुमने जो किया, उससे मुझे बहुत चोट पहुंची थी।”

“मुझे पता है।”

“लेकिन अब मैं समझता हूं कि तुम मुझे धोखा नहीं दे रही थीं। तुम अपने पिता का सच और मेरी पहचान दोनों बचाने की कोशिश कर रही थीं।”

तृषा ने कहा, “फिर भी मुझे तुमसे झूठ नहीं बोलना चाहिए था।”

“और मुझे तुम्हारे प्रेम पर इतनी जल्दी संदेह नहीं करना चाहिए था।”

“तो गलती किसकी थी?”

विराज ने उसकी ओर देखकर कहा, “पुराने हत्यारों की, जिन्होंने हमारे परिवारों से सच छीन लिया। लेकिन उस सच को एक-दूसरे से छिपाने की गलती हमारी थी।”

तृषा ने उसका हाथ पकड़ लिया।

नीचे मजदूर हवेली की टूटी ईंटें हटाकर नई दीवार तैयार कर रहे थे।

विराज ने उन्हें देखते हुए कहा, “पुरानी दीवार पर केवल नया रंग लगाने से दरार नहीं मिटती। पहले कमजोर हिस्सा हटाना पड़ता है। फिर नई ईंटें लगानी पड़ती हैं।”

तृषा मुस्कराई।

“तुम इमारत की बात कर रहे हो या हमारे रिश्ते की?”

विराज को उनकी पहली मुलाकात याद आ गई।

उसने कहा, “शायद दोनों की।”

तृषा ने मोबाइल में उनकी तस्वीर देखी। उसने तस्वीर किसी अनजान आदमी को नहीं भेजी।

उसने उसे अपने और विराज के साझा एल्बम में सुरक्षित किया और नीचे लिखा—

“जिस दिन हमने एक-दूसरे की जांच करना छोड़ा और सच में एक-दूसरे को समझना शुरू किया।”

उस रात विराज की आंख एक बजकर तेरह मिनट पर अपने आप खुली।

तृषा उसके पास गहरी नींद में सो रही थी। उसका मोबाइल मेज पर पड़ा था।

कुछ महीने पहले इसी समय उसकी तस्वीर चोरी से खींची जाती थी। इसी समय उसके विवाह में संदेह ने जन्म लिया था।

विराज ने तृषा के चेहरे को देखा।

उसने मोबाइल उठाया, लेकिन जांचने के लिए नहीं।

उसने अलार्म बंद किया, तृषा के ऊपर चादर ठीक की और फिर उसके पास लेट गया।

तृषा ने नींद में उसका हाथ पकड़ लिया।

विराज ने आंखें बंद कर लीं।

पुराने मर्डर केस का सच अदालत तक पहुंच चुका था। हत्यारा जेल में था। दोनों परिवारों के नाम से झूठ का दाग हट गया था।

लेकिन विराज जानता था कि सबसे कठिन मुकदमा अदालत में नहीं चला था।

सबसे कठिन मुकदमा उसके मन में चला था—जहां उसकी पत्नी पर शक, अपनी पहचान का भय और अतीत का दर्द आमने-सामने खड़े थे।

उस मुकदमे का फैसला किसी प्रमाण ने नहीं, एक कठिन स्वीकारोक्ति ने किया था—

प्रेम में रहस्य हो सकते हैं, भय हो सकते हैं और गलतियां भी हो सकती हैं। लेकिन जहां सच बोलने का साहस और क्षमा करने का धैर्य बचा रहता है, वहां टूटा हुआ विश्वास फिर से बनाया जा सकता है।

ठीक उसी हवेली की तरह, जिसकी दरारों में अब हत्या की कहानी नहीं, न्याय की नई शुरुआत लिखी जा रही थी।

इस कहानी को Google Discover के लिए मेटा विवरण, टैग और आकर्षक थंबनेल शीर्षक के साथ भी प्रकाशित किया जा सकता है।

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